Thursday, April 3, 2008

ग़म की फितरत

ग़म की फितरत मुझे सताने की
मेरी भी जिद उसे हराने की

छुपा न पाओगे आँखों की नमी
छोड़ो कोशिश ये मुस्कुराने की

दिल तुम्हारा है सच्चे मोती सा
क्या ज़रूरत तुम्हे खजाने की

टूट कर चाहना फिर मर जाना
यही तकदीर है परवाने की

सीने की कब्र में मुर्दा दिल है
न करो जिद मुझे जिलाने की

खेत छूटे, न रोज़गार मिला
ये सजा है शहर में आने की

मुफलिसी में तुझे पुकारा है
ठानी है तुझको आजमाने की



मेरा महबूब

मेरा महबूब ज़माने से जुदा लगता है
नज़रों से कातिल और दिल से खुदा लगता है

उन्स का नूर झिलमिलाता है चेहरे पर
आज सूरज भी मुझे बुझा बुझा लगता है

यारो पूछो न मुझसे अब तो खैरियत मेरी
दिल तो पहले गया अब होश गुमा लगता है

महकी महकी सी चांदनी है,रात महकी है
चश्मे शब को तूने हाथों से छुआ लगता है

मेरे जीने का सबब है तेरे होंठों की हंसी
तेरा हर लफ्ज़ मुझे शहद घुला लगता है





एक बच्चे की जुबानी....

आज मुझे अदालत में फैसला करना है
मम्मी या पापा, साथ किसके रहना है

पापा के खिलोने या मम्मी की लोरी
दोनों में से मुझे किसी एक को चुनना है

मुझ पर क्या बीत रही कोई न सोचे
मेरी तकलीफों से किसी को क्या करना है

मम्मी पापा दोनों ने ही वादा ले लिया है
अब मुझको किसी एक के वादे से मुकरना है

दोनों के बिना ही मैं जी नहीं सकता
कैसे कहूं,किसकी उंगली को पकड़ना है

ना जाने क्यों ऐसा मेरे साथ ही हुआ
घर पे जाके आज तो भगवान् से लड़ना है

चाहे कोई जीते या चाहे कोई हारे
सज़ा तो हर हाल में बस मुझको भुगतना है

कोई भी मुझ से ये क्यों पूछता नहीं
मेरी क्या मर्जी है,मेरी क्या तमन्ना है

चाहे कुछ बोलू या खामोश रहूँ मैं
हर हाल में मुझको दो हिस्सों में बँटना है