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Saturday, February 6, 2016

रो लो पुरुषो , जी भर के रो लो

बड़ा कमज़ोर होता है 
बुक्का फाड़कर रोता हुआ आदमी

मज़बूत आदमी बड़ी ईर्ष्या रखते हैं इस कमज़ोर आदमी से
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सुनो लड़की 
किसी पुरुष को बेहद चाहती हो ?
तो एक काम ज़रूर करना

उसे अपने सामने फूट फूट कर रो सकने की सहजता देना
...................................................
दुनिया वालो
दो लोगों को कभी मत टोकना
एक दुनिया के सामने दोहरी होकर हंसती हुई स्त्री को 
दूसरा बिलख बिलख कर रोते हुए आदमी को

ये उस सहजता के दुर्लभ दृश्य हैं 
जिसका दम घोंट दिया गया है 
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ओ मेरे पुरुष मित्र
याद है जब जन्म के बाद नहीं रोये थे 
तब नर्स ने जबरन रुलाया था यह कहते हुए कि 
" रोना बहुत ज़रूरी है इसके जीने के लिए "

बड़े होकर ये बात भूल कैसे गए दोस्त ?
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रो लो पुरुषो , जी भर के रो लो
ताकि तुम जान सको कि 
छाती पर से पत्थर का हटना क्या होता है

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ओ मेरे प्रेम
आखिर में अगर कुछ याद रह जाएगा तो 
वह तुम्हारी बाहों में मचलती पेशियों की मछलियाँ नहीं होंगी

वो तुम्हारी आँख में छलछलाया एक कतरा समन्दर होगा
......................................
ओ पुरुष
स्त्री जब बिखरे तो उसे फूलों सा सहेज लेना

ओ स्त्री 
पुरूष को टूट कर बिखरने के लिए ज़मीन देना

Sunday, December 13, 2015

हर पहर प्रेम

(श्रवण )
आज सवेरे जब तुम्हे देख रही थी अपलक ,
परिंदों को दाना डालते हुए ,
छत पर दो गौरैया , तीन कबूतर और चार गिलहरियों से घिरे ,
उन्हें प्यार से टेर लगाकर बुलाते हुए तुम,

अचानक एक गहरी और शांत आवाज़ में तब्दील हो गए थे 
और मैं लगभग ध्यान मग्न

संसार के सारे स्वर मौन हुए और
तुम गूंजने लगे मेरे देह और मन के ब्रम्हांड में एक नाद की तरह 
काटते रहे चक्कर मेरी नाभि के इर्द गिर्द

मैं उस पल में एक योगिनी थी और तुम 
ओम... ओम...ओम

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( स्वाद)
आज दोपहर मौसम की पहली बारिश और बस ...
तुमने देखा मुझे ऐसी तलब भरी निगाहों से 
मानो मैं चाय की एक प्याली हूँ

ओह ...उत्तेजना से थरथरायी प्याली और 
टूट कर बिखर गयी एक गर्म आगोश में

और ठीक उस वक्त जब तुम ले रहे थे बागान की सबसे कोमल पत्तियों की चुस्कियां
मैं तलबगार हुई एक अनचीन्हे नशे की और
तुम उस क्षण बने मेरे लिए अंगूर का महकता बाग़

ढेर से रसीले अंगूर मैंने कुचले , चखे और
डूबकर बनायी दुनिया की सबसे बेहतरीन शराब

अब आँखें बंद कर घूँट घूँट चखती हूँ तुम्हे 
नशा -ए -मुहब्बत बढ़ता जाता हर बूँद के साथ

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(स्पर्श)
पूरी ढल चुकी शाम के बाद बुझ चुके सूरज की राख 
जब उदासी बनकर जमा हो रही थी चेहरे और निगाहों पर

तुम बन गए थे एक रेशमी रूमाल
मेरी छलछलाई आँख को समेटते , उदासी की राख पोंछते

तुम उस पल एक मुलायम छुअन थे , 
हंस का एक उजला मुलायम पंख थे , किसी नवजात की नर्म हथेली थे

तुम स्वाति की पहली बूँद थे, बेचैन पपीहे पर बरस रहे थे ....
..........................................................
(दृश्य)

आधी रात नींद खुली और देखा 
तुम टेबल पर झुके कोई कविता बुन रहे थे 
लैम्प की उस पीली रौशनी में तुम बन गए
प्रकृति की एक विराट पेंटिंग

सोचते हुए ललाट पर चार गहरी सिलवटें
जैसे सूरज से निकलती पहली किरणें
जिसकी गुनगुनी गर्माहट में 
गेंहूं की बाली की तरह पकती थी कविता ,

प्रेमिल आँखों में देर से टिकी एक बूँद 
जो बाद में कविता की किसी पंक्ति में ही गुम हो गयी थी 
मद्धम लयबद्ध साँसों में महकती थी वो सुनहरी गेंहू की बाली

मैं देखती रही अडोल उस अलौकिक चित्र को 
फिर मैं उस चित्र पर झुकी और अपना नाम लिख दिया 
एक पीले चुम्बन से ....

..............................................................
मैं मेरी चार इन्द्रियों से चार पहर तुम्हे महसूसती हूँ
और पांचवी ?
(गंध)
जब जब सांस लेती हूँ 
तुम बन जाते हो तुम्हारी ही तुर्श महक 
जो फूटती है तुम्हारी देह से और 
समाती है मेरी रूह में......

Wednesday, November 18, 2015

और कमला मर गयी


कमला के आदमी ने कमला के गाल सुजाये
खींचा पटका और घर से निकाल दिया 
इसने देखा , उसने देखा , सबने देखा
मैंने भी देखा 

सबके कानों में एक साथ गांधीजी चिल्लाये 
" बुरा मत देखो "
हम सब अपनी आँखों पर हाथ रखकर घर लौट गए 

कमला रोती रही रातभर गली के कुत्तों के साथ
मोटी मोटी गालियां बकती रही अपने घर की देहरी के बाहर 
इसने , उसने , सबने सुनीं 
मैंने भी सुनीं 

गांधी जी फिर हमारे कानों में फुसफुसाए
" बुरा मत सुनो "
हम सब ने खिड़कियाँ बंद कीं और सो गए 

कमला फिर कभी नहीं दिखी 
दो दिन बाद एक अनजान औरत की मौत पुलिस फ़ाइल में दर्ज़ थी 
शिनाख्त पर कोई कमला निकली 

पुलिस मोहल्ले भर में पूछती फिरी 
" क्या हुआ था ? कमला के पति का चलन कैसा है ?"
मूर्ख हवलदार .. क्या जाने गांधी की शिक्षा 

हम किसी के लिए बुरा नहीं बोलते ... गांधी बुरा मान जाते हैं 
हमने अपने मुंह पर हाथ रख लिया 

जांच में कमला की मौत नामालूम वजहों से आत्महत्या निकली 

हमने अगले दिन गांधी प्रतिमा पर फूल चढ़ाये 
ऐनक और चरखे को कवर फ़ोटू बनाया 
तीन बंदरों को शुक्रिया कहा 
इस तरह हमने दो अक्टूबर मनाया

Thursday, September 17, 2015

विदा - 2

सबसे उदास और बदरंग मौसमों में मैंने चुने 

सबसे चटक रंग अपनी कुर्ती के लिए 
दुपट्टे में लगवाई गोटा किनारी और
आँखों में भर लिए नीलकंठ और नौरंगे के चमकीले रंग

एक ज़र्द और धूसर साँझ जब सीने से लिपट लिपट जाती तो
मैं भागकर सामने जनरल स्टोर जाती,
झटपट ले आती रंगबिरंगी जेम्स की गोलियां और
मेरी वाली ऑरेन्ज को उस सलेटी शाम के माथे पर सजा देती 
फिर पहनती अपनी ऑलिव ग्रीन फूलों वाली घेरदार स्कर्ट 
और मोज़िटो हाथ में लिये देर रात तक सुनती रहती
रेस्त्रां में गिटार थामे गाते उस नवयुवक को

जब रातें नाग बन आँखों पर कुंडली मारकर बैठ जातीं 
मैं मुल्तवी कर देती सोना और रात गुज़ार देती
चर्च में मिस्टर बीन के बराबर वाली कुर्सी पर बैठे हुए
नागों के पास नहीं है अच्छा हास्य बोध
आखिर थक कर वे वापस लौट ही जाया करते

पीली पड़ चुकी डायरी में कितनी बार रखे मैंने ताज़े फूल 
सूखी शाखों को हरियाया ओ ' हेनरी तरीके से 
लगभग ठहर चुके वक्त में मैं चली पागलों की तरह
ठहरने को खारिज करते हुए,
बंद पड़ी घड़ियों पर दिन में सिर्फ दो बार नज़र डाली
वक्त सही न था पर मैंने जब देखा सही देखा

मेरे भीतर का शहर जब जब उजड़ा 
मैं उन सुनसान सड़कों पर भागी पायलें पहनकर
घुंघरुओं के शोर से कुचला अकेलेपन की कातर चीखों को

जब माथे पर गहरी नींद सोया एक भूला बिसरा चुम्बन अंगड़ाई लेता
जब उन गुज़रे सालों की कोई बेरहम स्मृति किवाड़ खटखटाती
जब स्वप्न शत्रु की तरह पेश आने लगते 
तब मैं उन प्रेमिकाओं के बारे में सोचती जिन्हें जन्मों जन्मों तक श्राप मिला है विरह में होने का 
प्रेम में जीती मरतीं उन औरतों की गाढ़ी पीड़ा को 
मरहम बनाकर लेप दिया अपने एक नन्हे से दुःख पर

इस तरह मैंने सबसे बुरे दिनों में भी जुटाया
अपने हिस्से की ख़ुशी का एक एक मॉलिक्यूल

सिर्फ तुम जानते हो कि ये सारी मशक्कत थी
महज एक वादे को निभाने के लिए वरना 
उदास औंधे मुंह लेटकर रोते रहना कितना आसान था

और देखो .. मैं तुम्हे तब तक क्रूर मानती रही 
जब तक जान नहीं गयी कि 
दरअसल तुम मुझे क्या सिखाना चाहते थे

अब मैं सुख का बंदोबस्त नहीं करती 
सुख को चुनती हूँ ...

बात बस कुल इतनी सी कि 
विदा मुलाकातों की डोर का टूटना और 
दो आत्माओं के बीच स्मृतियों की कभी न खुलने वाली एक पक्की गाँठ का लगना है....

और अब कौन जानता है यह मुझसे बेहतर कि 
हर विदा ब्रेकअप नहीं होती....

Thursday, August 20, 2015

ये होती है बारिश

.
बारिश का होना केवल काले बादलों से बूंदों का गिरना थोड़े ही है 
बूँदें बारिश नहीं होतीं
वे तो बारिश लाती हैं

बताऊँ ? क्या होते हैं बारिश के मायने ...
धड़कनों का मोर बन जाना है बारिश
बदन का मुस्कराहट बन जाना है बारिश
आँखों का जुगनू बन जाना है बारिश 
बाहों का झप्पी बन जाना है बारिश

सड़कों का संतूर बन जाना है बारिश 
पहाड़ों को कहवे की तलब उठना है बारिश 
नदियों की गुल्लक भर जाना है बारिश 
जंगलों का किलकारी बन जाना है बारिश

रांझों का जोगी हो जाना है बारिश
हीरों का नटनी हो जाना है बारिश 
खुदा के पेहरन का कच्चा हरा रंग छूट जाना है बारिश
रातों का झींगुर हो जाना है बारिश

धरती का खुशबू हो जाना है बारिश 
सूरज का एक झपकी मार लेना है बारिश 
रेनकोट के भीतर तरबतर हो जाना है बारिश 
यादों की इक सूखी पत्ती का हरिया जाना है बारिश

आसमान का टिपटिप हो जाना है बारिश 
शहरों का छप छप हो जाना है बारिश 
मौसम का रिमझिम हो जाना है बारिश 
रागों का घन घन हो जाना है बारिश

नज्मों के चेहरों पर बूंदों का झिलमिलाना है बारिश 
सीले ख़्वाबों का सुलग उठना है बारिश
मन का सबसे कच्चा कोना रिसने लगना है बारिश 
बूढ़ी पृथ्वी के जोड़ों में इक कसक है बारिश

पुराने एल्बम पलटना है बारिश 
ड्राफ्ट्स में सहेजा एक ख़त दसियों बार पढना है बारिश 
गुलज़ार , पंचम और ब्लैक कॉफ़ी है बारिश 
छतरी ठेले से टिका भुट्टे खाना है बारिश और

तुम्हारा हौले से मेरा माथा चूम लेना है बारिश .....

Thursday, July 2, 2015

विदा -1

कब किसी ने सलीका बताया कि कैसे ली जाती है विदा
प्रेम करने के सौ तरीकों वाली किताब भी नहीं बताती
कि विदा प्रेम का ज़रूरी हिस्सा है
साथी को खुश रखने के नुस्खे तो सहेलियों ने भी कान में फूंके थे
माँ भी यदा कदा सिखा ही देती समझौते करने के गुर

लेकिन विदा और मृत्यु के बावत कोई बात नहीं करता
जबकि दोनों प्रेम और जीवन का अंतिम अध्याय लिखती हैं

इस तरह विदा लेना और देना मुझे आया ही नहीं
गले लगकर रोना बड़ा आसान और प्रचलित तरीका है
पर मुकम्मल तो वो भी न लगा 
गाली बक कर दो तमाचों के साथ भी विदा ली जा सकती है
मगर वह इंसानी तरीका नहीं

क्या होता वो सलीका कि विदाई की गरिमा बनी रहती
तमाम शिकवों के बावज़ूद ?

जैसे पेड़ करते हैं अपने पत्तों को विदा 
जैसे रास्ता मुसाफिर को और 
जैसे चिड़िया अपने बच्चों को

मुझे न पेड़ होना आया , न रास्ता होना 
और न चिड़िया होना

खामोशी से किसी को सुलाकर उससे हाथ छुड़ा लेना एक और तरीका है
पर यह तो ज़ुल्म ठहरा 
यशोधरा की खाली छूटी हथेली आंसुओं से भरी देखी थी मैंने
और खामोश होंठों पर एक उदास शिकवा " सखी वे मुझसे कहकर जाते "

वादा करके न लौटना एक और तरीका हो सकता है
मगर यह क्रूरता की पराकाष्ठा है और 
जन्म देता है एक कभी न मिटने वाले अविश्वास को

हांलाकि दोनों तरीकों के मूल में विदा के दुःख को कम करना होता होगा शायद
मैं इस विदा को टालती रही एक मुकम्मल तरीके के इंतज़ार में 
और इस बीच एक सुबह देहरी पर रखा पाया 
एक गुड बाय का ग्रीटिंग कार्ड

विदाई का एक बदमज़ा तरीका आर्चीज वाले भी बेच रहे थे
सच तो ये कि विदा करना कोई किताब नहीं सिखा सकती
कोई समझाइश विदा को आसान और सहज नहीं बनाती

हर विदाई छाती पर एक पत्थर धर जाती
हर विदा के साथ नसें ऐंठ जातीं , आँखें एक बेचैन काला बादल हो जातीं
हर विदाई के साथ कुछ दरकता जाता
हर विदा के साथ कुछ मरता जाता

कितना टालूं इस विदा को कि
अब वक्त बार बार चेतावनी अलार्म दे रहा
"टाइम ओवर लड़की .. तुमसे न हो पायेगा"

हाँ ... मुझसे सचमुच न हो पायेगा
कि मरना ही होगा एक बार फिर
ओ गुलज़ार .. जानते हो
सांस लेने की तरह मरना भी एक आदत है

पर अब भी मैं जीवन की आखिरी विदा से पहले
पेड़ ,रास्ता या चिड़िया होने के इंतज़ार में हूँ...

Friday, May 8, 2015

कभी ऐसे भी करना प्रेम


जब भी देखो किसी चिड़िया को चहकते , फुदकते 
बस उसी को देखना एकटक 
यूं नहीं कि पढ़ते , लिखते, मोबाईल पे बात करते एक उड़ती निगाह डाली 
और मुस्कुरा दिए

सारा काम परे रख ...देखना बस उस चिड़िया को 
आँख में भर लेना उसे उसके पूरे चिड़ियापन के साथ 
जीना उस पल को सिर्फ उस चिड़िया के साथ

और ऐसे ही करना प्रेम 
जब भी करना

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सारे ब्रांड उतार कर देहरी पर छोड़ देना
क्लच को एक झटका देना और सुबह दस बजे से कसे जूड़े को खोल देना 
निकाल देना साड़ी के पल्ले की सारी पिनें

आना नीली बद्दी वाली हवाई चप्पल सी बेफिक्री लिए 
हमेशा अपने प्रेमी के पास 
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आज उसे चाँद की बिंदी न लगाना 
आँचल में सितारे भी न टांकना 
उसकी देह के लिए नयी उपमाएं तो बिलकुल न खोजना

मार्च एंड के बोझ की मारी वो 
जब लौटे ऑफिस से 
प्यार से लिटा लेना अपनी गोद में
मलना बालों में जैतून के तेल को अपनी पोरों से 
और बच्चों सी गहरी नींद सुला देना 
बस्स ...
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जब लड़ना तो आसमान सर पे उठा लेना 
कहना उसे 
" जल्दी टिकट कटा ले बे ऊपर का "

और जब उसके इंतज़ार का काँटा 
दस मिनिट भी ऊपर होने लगे तो 
वो दस मिनिट दस युगों की तरह गुजारना 
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उसे यूं ही बाहों में मत भर लेना 
सुनो ..आज एक काम करना

खाने की मेज़ पर प्लेटें सजा देना 
काट कर रखना खीरा और टमाटर 
झटपट बना देना सब्ज़ पुलाव और पुदीने कैरी की चटनी

और जब वो नहाकर ऊपर बाल बांधती हुई 
जाने लगे रसोईघर में

उसे बाहों में भरकर 
बेतहाशा चूम लेना 
और उसकी आँखों से सुख बरसा देना

Thursday, February 5, 2015

पिता सोते नहीं

एक दिन
पहाड़ की गोद से मचलकर एक नदी फिसल कर भागी 
पर्वत मुस्कुराकर आवाज़ देता रहा 
नदी एक हिरनी की तरह कुलांच भरती रही


पहाड़ जागता हुआ सचेत खड़ा है एक पिता की तरह 

नदी मैदानों में सितोलिया खेल रही है 
घाटियों से गुज़रते हुए कोई अलबेली धुन गुनगुना रही है 
कभी बेसुध हो नाच रही है तो कभी शहरो से गप्पें हांक रही है 
कभी पलटकर पहाड़ को जीभ चिढ़ा रही है


पहाड़ बस मुस्कुराये जाता है

एक नन्ही बिटिया को पिता की ऊँगली थामे मेले में घूमते देखा था आसमान ने 
और चाँद ने बलाएँ लेकर दुआएं बिखेरी थीं अंतरिक्ष में
नदी की दायीं बांह में बंधा है पहाड़ी मिटटी का तावीज़
और बालों में टँकी है एक मेले से खरीदी हेयरपिन


नदिया दौड़े जाती है आँखें मीचे 
अपने किनारों के कांधों पर चढ़कर 
और रात को 
थक कर सो जाती है सीने पर दोनों हाथ समेटे


पहाड़ सदियों से सोया नहीं है 
उसके बाएं हाथ की ऊँगली में अटका है 
नदी की फ्रिल वाली फ्रॉक का रेशमी बेल्ट


पहाड़ मोह में नहीं , पुत्री के प्रेम में है
आज़ादी उसका नदी को दिया सबसे बड़ा उपहार है


पिता की गोद से फिसलकर भी 
कौन बिटिया ओझल होती है भला 
अगर सिर्फ आँखें बंद कर लेना सोना नहीं तो 
पिता कभी सोते नहीं


बिटिया को देते हैं दो सफ़ेद पंख 
और बस करते हैं परवाह आखिरी सांस तक

..................................(जागते पहाड़ , बहती नदिया )

Tuesday, December 2, 2014

तोते

चारदीवारी एक आज़ाद कैद की माफिक है 
या यूं कहिये दस बाय दस का तोते का पिंजरा 
तोते खुश हैं , सेहतमंद हैं और वफादार भी 
तोतों के पंख सलामत भी हैं 
और जानदार भी

तोते अपनी किस्मत सराहते हैं 
दूसरे तोतों के दो बालिश्त बराबर पिंजरे देख

बस ..उनकी उड़ने की इच्छा का हरण किया गया है 
बेहद चतुराई से

उड़ने वाले तोतों को देख जो कभी लालच आये 
पिंजरे के तोतों में तो ,
वे तमाम कहानियां सुनाते हैं कि 
कैसे शिकारी बाज़ नोच डालते हैं उन्हें 
और यह भी कि तोते सिर्फ दहलीज के भीतर महफूज़ हैं

चारदीवारी आज़ादी के मानी नहीं समझाती 
तोतों को सिखाये जाने वाले तमाम लफ़्ज़ों में गायब है 
" आसमान " और "उड़ान"

उन्हें यकीन है 
तोतों की अगली पीढियों से नहीं छुपाना पड़ेगा "आसमान " को 
ये शब्द खुद ब खुद गायब हो जाएगा उनके दिमागों से 
इंसानी पूंछ की तरह

तब उन्हें रटाया जाएगा "आसमान "
और इसका उच्चारण करते हुए वे देखेंगे 
एक बड़ी खाली जगह 
जैसे हम देखते हैं अन्तरिक्ष 
जहां जाने की ज़रुरत नहीं
सिर्फ ज्ञान ही काफी है

हर " रिओ " को नहीं मिलते ये बताने वाले कि 
" रिओ " तुम उड़ सकते हो

Monday, November 24, 2014

गर्विता


आपकी इज्ज़त आपके कर्मों में बसी 

आपने दान किया ..आपकी इज़्ज़त बढ़ी 
आपने जग जीता ..आपकी इज़्ज़त बढ़ी 
आपने आविष्कार किये ..आपकी इज़्ज़त बढ़ी 

फिर मेरी इज़्ज़त आपने मेरी नाभि के नीचे क्यों बसाई ?

मेरे जग जीतने से मेरी इज़्ज़त नहीं बढ़ी 
अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने से मुझे मान नहीं मिला 
पर मेरे एक रात प्रेम करने से मेरी इज़्ज़त ख़त्म हो गयी 
मुझ पर एक शैतान का हमला मेरी इज़्ज़त लूट गया 

मैं हैरत में हूँ 
मेरे एक ज़रूरी अंग को आपने कैसे मेरी इज्ज़त का निर्णायक बनाया ?
किसने आपको मेरी आबरू का ठेकेदार बनाया ?

अगर बनाया तो बनाया 
आप बुद्धिहीन नहीं ..बहुत शातिर थे
मैं जान और समझ गयी हूँ आपके इस शातिराना खेल को
मुझे साज़िशन गुलाम बनाया गया है 

अब मैं अपनी इज़्ज़त को अपनी जाँघों के बीच से निकालकर फेंकती हूँ 
मेरा कौमार्य मेरी आज़ादी है ..न कि मेरी आबरू 

मुझ पर एक हमला मुझे शर्मिन्दा नहीं करेगा अब 
ना ही मेरी इज़्ज़त छीन सकेगा 
मैं उठकर आपकी आँखों में डालकर ऑंखें 
हिसाब लूंगी अपने ऊपर हुए हमले का 

शर्मिन्दा होगा ये समाज और ये सरकार 
शर्मिंदा होंगे आप 
मैं गर्विता हूँ और रहूंगी 
हज़ार बार हुए हमलों के बावजूद