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Tuesday, December 2, 2014
तोते
चारदीवारी एक आज़ाद कैद की माफिक है
या यूं कहिये दस बाय दस का तोते का पिंजरा
तोते खुश हैं , सेहतमंद हैं और वफादार भी
तोतों के पंख सलामत भी हैं
और जानदार भी
तोते अपनी किस्मत सराहते हैं
दूसरे तोतों के दो बालिश्त बराबर पिंजरे देख
बस ..उनकी उड़ने की इच्छा का हरण किया गया है
बेहद चतुराई से
उड़ने वाले तोतों को देख जो कभी लालच आये
पिंजरे के तोतों में तो ,
वे तमाम कहानियां सुनाते हैं कि
कैसे शिकारी बाज़ नोच डालते हैं उन्हें
और यह भी कि तोते सिर्फ दहलीज के भीतर महफूज़ हैं
चारदीवारी आज़ादी के मानी नहीं समझाती
तोतों को सिखाये जाने वाले तमाम लफ़्ज़ों में गायब है
" आसमान " और "उड़ान"
उन्हें यकीन है
तोतों की अगली पीढियों से नहीं छुपाना पड़ेगा "आसमान " को
ये शब्द खुद ब खुद गायब हो जाएगा उनके दिमागों से
इंसानी पूंछ की तरह
तब उन्हें रटाया जाएगा "आसमान "
और इसका उच्चारण करते हुए वे देखेंगे
एक बड़ी खाली जगह
जैसे हम देखते हैं अन्तरिक्ष
जहां जाने की ज़रुरत नहीं
सिर्फ ज्ञान ही काफी है
हर " रिओ " को नहीं मिलते ये बताने वाले कि
" रिओ " तुम उड़ सकते हो
Sunday, November 30, 2014
प्रेम एक पालतू बिल्ली है
हवा में उछाले गए चुम्बन,
किसी को ज़ेहन में रखकर लिखी और
फिर फाड़ डाली गयी नज्में
कभी न कभी पते पर ज़रूर पहुँचते हैं.......
आंसुओं और नमक में क्या रिश्ता है
सिवाय इसके कि
दोनों जिंदगी में स्वाद बढाते हैं
पर आंसू कभी चुटकी भर नहीं मिलते
आखें किराए का इक मकान हैं
और ह्रदय आंसुओं का पुरखों वाला घर
पीड़ा प्रेम का स्थायी भाव है
प्रेम एक पालतू बिल्ली है
और दिल उसका मालिक
मालिक के चेहरे पर नाखूनों के अनगिन निशान हैं
बिल्ली मरती नहीं ... मालिक उसे भगाता नहीं
जब कोई लम्हा ठिठक जाता है तो
इक दास्तान में बदल जाता है
रुके हुए लम्हे कभी मरते नहीं
तुम्हारे इंतज़ार में रुका लम्हा आज भी धड़कता है
एक चील भी अपने घोंसले वाली डाली पर
किसी दूसरी चील को बैठने नहीं देती
मैं तो फिर भी इंसान हूँ....
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नज़्म
Monday, November 24, 2014
गर्विता
आपकी इज्ज़त आपके कर्मों में बसी
आपने दान किया ..आपकी इज़्ज़त बढ़ी
आपने जग जीता ..आपकी इज़्ज़त बढ़ी
आपने आविष्कार किये ..आपकी इज़्ज़त बढ़ी
फिर मेरी इज़्ज़त आपने मेरी नाभि के नीचे क्यों बसाई ?
मेरे जग जीतने से मेरी इज़्ज़त नहीं बढ़ी
अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने से मुझे मान नहीं मिला
पर मेरे एक रात प्रेम करने से मेरी इज़्ज़त ख़त्म हो गयी
मुझ पर एक शैतान का हमला मेरी इज़्ज़त लूट गया
मैं हैरत में हूँ
मेरे एक ज़रूरी अंग को आपने कैसे मेरी इज्ज़त का निर्णायक बनाया ?
किसने आपको मेरी आबरू का ठेकेदार बनाया ?
अगर बनाया तो बनाया
आप बुद्धिहीन नहीं ..बहुत शातिर थे
मैं जान और समझ गयी हूँ आपके इस शातिराना खेल को
मुझे साज़िशन गुलाम बनाया गया है
अब मैं अपनी इज़्ज़त को अपनी जाँघों के बीच से निकालकर फेंकती हूँ
मेरा कौमार्य मेरी आज़ादी है ..न कि मेरी आबरू
मुझ पर एक हमला मुझे शर्मिन्दा नहीं करेगा अब
ना ही मेरी इज़्ज़त छीन सकेगा
मैं उठकर आपकी आँखों में डालकर ऑंखें
हिसाब लूंगी अपने ऊपर हुए हमले का
शर्मिन्दा होगा ये समाज और ये सरकार
शर्मिंदा होंगे आप
मैं गर्विता हूँ और रहूंगी
हज़ार बार हुए हमलों के बावजूद
Thursday, May 19, 2011
वो किसी मुकम्मल ग़ज़ल में एक बे-बहर शेर की तरह था

वो अलग था,सबसे अलग
सारे भाई बहन जब परीक्षा की तैयारी में
हलकान हो रहे होते
वो छत पर आम की गुठली चूसता
माउथ ऑर्गन बजा रहा होता
जब स्कूल के दोस्त लड़कियों के नमक की बातें करते
वो गुड्डी, रिंकी, लाली और
चुनमुन के साथ नहर किनारे
साइकल रेस लगा रहा होता...
जब सारा मोहल्ला दुर्गा जी की झांकियां सजाने में
जन्माष्टमी के भजन गाने में और
गणेश जी का चंदा इकठ्ठा करने में पगलाया रहता
वो गली के पिछवाड़े
दो पिल्लों को अपने मुंह को
चाटने दे रहा होता
जब सब लड़के अपना रिजल्ट देखने
बोर्ड के आगे सर फुटौव्वल कर रहे होते
वो माँ के धोये निचोड़े कपडे
आँगन में डोरी पर फैला रहा होता
वो मुश्किल से सेकण्ड डिविज़न पास होता
वो गणित की किताब में मंटो को छुपाये रहता
पिता कहते कि वो अटपटे ढंग का लड़का था
माँ कुछ नहीं कहती
पर हैरानी से कभी उसे
कभी बाकी बच्चों को देखती रहती
एक दिन ग़ालिब ने कहा
वो किसी मुकम्मल ग़ज़ल में
एक बे-बहर शेर की तरह था
ऐसा शेर जिसमे शायर ने
अपने ख़याल नहीं बल्कि
अपने ख्वाब और रूह डाली थी...
और वही ग़ज़ल का
मतला भी था....
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नज़्म
Tuesday, June 1, 2010
कुछ बहके बहके से अल्फाज़....जाने किसके लिए

वो खामोश नज्में कहता था मेरे लिए
मैं बदन के रोम रोम से सुना करती थी
वो अपनी आँखों से सहलाता था मुझे
मैं घूँट घूँट उसके इश्क को पिया करती थी
वो कुछ अधूरी सी इबारत लिख गया था मेरी धडकनों पर
मैंने उन्हें अपना नाम पता बनाकर पूरा किया था
वो किसी लैला की बात किया करता था
मैंने लैला को अपने अन्दर सुलगते देखा था एक रोज़
एक रात उसने मेरी कुंवारी रूह को समेटा था
बाहर बरामदे में मोगरा ओस से भीग भीग गया था
वो एक रोज़ टांगा गया था मज़हब की सलीब पर
और सदियों से वो मेरे सीने पर क्रॉस बनकर झूल रहा है
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नज़्म
Thursday, May 13, 2010
ज़िन्दगी के सफ़र के अगले पड़ाव की ओर....
एक हफ्ते में सब कुछ बदल गया! सत्रह तारिख को ट्रांसफर ऑर्डर आया....कल यहाँ से रिलीव हो गयी और कल जाकर नयी जगह ज्वाइन करना है! डी.एस.पी. रेल भोपाल से अब सिटी एस. पी. विदिशा.......नयी जगह जाने की स्वाभाविक उत्कंठा और उत्साह भी है पर भोपाल छोड़ने का दुःख भी हो रहा है! भोपाल एक ऐसा शहर है की इससे प्यार हो ही जाता है! हर बार ट्रांसफर के समय ऐसी ही अजीब सी मन स्थिति हो जाती है! खैर अच्छी बात ये है की विदिशा भोपाल से केवल पचास किलो मीटर दूर है! आना जाना लगा रहेगा! और दूसरी अच्छी बात ये है की विदिशा जिले में मैं मैंने ट्रेनी डी.एस,पी. की तरह काम किया है आज से नौ साल पहले....तो जानी पहचानी जगह...जाने पहचाने लोगों के बीच दोबारा जाना अच्छा ही लगता है! अभी पैकिंग...शिफ्टिंग..का सारा काम बाकी है! शायद एक महीना लग जाये पूरी तरह सेट होने में! कुछ दिन पहले एक नज़्म लिखी थी! आज के लिए वही....शायद फिर कुछ दिनों तक नियमित आना न हो पाए......

वो मुझे मिला था
एक आवारा बादल की तरह
जो घर की छत पर कुछ पलों को
सुस्ताने रुक गया हो
ऐसे ही ठहर गया था वो
मेरे दरिया के मुहाने पर
मैंने अपनी रूह के पानी से भिगोया था उसे
बिना जाने ...ये पानी न जाने कहाँ बरसेगा
वो ऊपर अपने आसमान में टंगा था
और उसका अक्स मेरे अन्दर समाया था
वो ठहरा रहा...
रात उबासियाँ लेती रही
हम एक दुसरे की ज़मीन नापते रहे
जन्मों का हिसाब पलों में समेटते रहे
न वादों की पायल
न कसमों की जंजीर
बस इश्क की बिंदिया मेरे माथे झिलमिलाई थी
हम एक दुसरे के बदन में जागते रहे
चाँद का तिलिस्म टूटने तक
न जाने कहाँ बरसा होगा वो
न जाने क्या घटा इन पलों में
बस इतना जाना...उसके जाने के बाद
वो अपनी रूह मेरी ज़मीन पर बिछा कर चला गया था
जिस पर मेरा इश्क आराम करता है

वो मुझे मिला था
एक आवारा बादल की तरह
जो घर की छत पर कुछ पलों को
सुस्ताने रुक गया हो
ऐसे ही ठहर गया था वो
मेरे दरिया के मुहाने पर
मैंने अपनी रूह के पानी से भिगोया था उसे
बिना जाने ...ये पानी न जाने कहाँ बरसेगा
वो ऊपर अपने आसमान में टंगा था
और उसका अक्स मेरे अन्दर समाया था
वो ठहरा रहा...
रात उबासियाँ लेती रही
हम एक दुसरे की ज़मीन नापते रहे
जन्मों का हिसाब पलों में समेटते रहे
न वादों की पायल
न कसमों की जंजीर
बस इश्क की बिंदिया मेरे माथे झिलमिलाई थी
हम एक दुसरे के बदन में जागते रहे
चाँद का तिलिस्म टूटने तक
न जाने कहाँ बरसा होगा वो
न जाने क्या घटा इन पलों में
बस इतना जाना...उसके जाने के बाद
वो अपनी रूह मेरी ज़मीन पर बिछा कर चला गया था
जिस पर मेरा इश्क आराम करता है
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नज़्म
Tuesday, March 31, 2009
जब कोई महबूबा चांदनी ओढ़कर उतरती है तो कैसी लगती है....

सुबह मेहँदी महक रही थी बिस्तर पर
मैं तो रातरानी सिरहाने रखकर सोया था
होंठों पर गर्म साँसें अभी भी दहक रही थीं
और पलकों पर आज फिर एक मोती झिलमिलाया था
खुली खिड़की से जब झाँका था मैंने तो
आसमा के आखिरी कोने पर लहराता दिखा था
तुम्हारा रेशमी आँचल ,
जिसका एहसास रात भर मदहोश किये था
या खुदा...मुझे इल्म है
तुझे भी वो प्यारी थी मेरी तरह
और बुला बैठा तू उसे अपने पास
मगर....एक काम कर मेरा
उड़ा दे मेरी रातों की नींद
तड़पने दे मुझे तमाम उम्र
कम से कम एक बार तो देख सकू
जब कोई महबूबा चांदनी ओढ़कर उतरती है
तो कैसी लगती है....
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नज़्म
Friday, February 6, 2009
माँ...अब मैं बड़ा हो गया हूँ
मुर्गा मुर्गी प्यार से देखें,नन्हा चूजा खेल करे
कौन है जो आकर के मेरे,मात पिता का मेल करे
" दो कलियाँ " फिल्म का ये गाना सुनते ही मेरी एक दोस्त की आँखें भर आती थीं! और अच्छे खासे हंसते खेलते चेहरे पर गहन पीडा दिखाई देने लगती थी! उसके मम्मी पापा बचपन में ही एक दुसरे से अलग हो गए थे! वो अपनी मम्मी के पास रहकर ही बड़ी हुई! पापा के पास कभी छुट्टियों में जाना हुआ लेकिन पापा की दूसरी पत्नी की मौजूदगी के कारण अपने आपको एक मेहमान की तरह ही महसूस करती रही! हम लोग हमेशा बचते थे की उसके सामने अपने पापा के बारे में बात न करें क्योंकि ऐसे वक्त में उसे नज़र बचाकर आंसू पोंछते हमने देखा था! मेरी उम्र की मेरी दोस्त जिसके आज दो बच्चे हैं आज तक अपने अधूरे बचपन को नहीं भुला पायी! आज भी एक शिकायत भगवान् से और अपने माँ पिता से उसके दिल में गाँठ बनकर रहती है! माँ ने लाख चाहा की पिता की कमी महसूस न होने दे लेकिन अकेले अपनी जिम्मेदारी निभाती माँ कब गुस्सैल और चिडचिडी हो गयी उसे खुद पता न चला! अपनी उस दोस्त के लिए हमेशा मुझे भी उतना ही दुःख होता रहा! इसके बाद मन्नू भंडारी की किताब " आपका बंटी" पढ़ी! ऐसा लगा बंटी के रूप में अपनी दोस्त को ही देख रही हूँ! लगा जैसे सारा उपन्यास मेरी दोस्त की जुबानी सुन चुकी हूँ! बस केवल किरदार बदल गए हैं! इसके बाद जैसे सारे वो बच्चे जो माँ बाप के अलगाव की सजा भुगत रहे हैं.....बहुत दयनीय से लगने लगे!उसी वक्त जेहन में जो कुछ कौंधा ,कुछ यूं पन्ने पर आया!
माँ...अब मैं बड़ा हो गया हूँ
मैं जानता हूँ कि
तुझे बहुत फिक्र रहती है मेरी क्योकि
तुझे लगता है मैं छोटा हूँ अभी...
पर माँ..याद है तुझे
कल दीवार पर मैंने ही तो कील लगायी थी
तेरे ऑफिस से आने के पहले
मैंने अकेले ही बिस्तर की चादर बदली थी
कल ही तो दूध का पैकेट खरीद कर लाया था
और पैसे भी नहीं गिराए थे
माँ..मुझे पता है कि
पापा तुझसे झगडा करके चले गए हैं
और ये भी कि..
तू उन्हें बहुत याद करती है
याद तो मैं भी करता हूँ
पर मैं रोया तो तू कैसे चुप रहेगी
माँ,तू रोज़ मुझे अपनी गोद में सुलाती है
एक बार मेरी गोद में सर रखकर देख
एक बार मेरी बच्ची बनकर देख
तुझे अच्छा लगेगा माँ...
तुझे याद है न माँ
मैंने महीनों से कोई शरारत नहीं की है
स्कूल के किसी बच्चे से झगडा भी नही
याद कर माँ...मुझे नही भाता दूध
पर कितने दिनों से चुपचाप पी रहा हूं
मुझे ध्यान से देख माँ
मैं तुझसे कुछ कहना चाहता हूं
तुझे खुश रखना चाहता हूं
मैं अब छोटा नही रहा माँ
पूरे दस साल का हो गया हूं
मैं अब बड़ा हो गया हूं माँ.....
भगवान किसी बच्चे को दस साल की उम्र में बड़ा न बनाए....
कौन है जो आकर के मेरे,मात पिता का मेल करे
" दो कलियाँ " फिल्म का ये गाना सुनते ही मेरी एक दोस्त की आँखें भर आती थीं! और अच्छे खासे हंसते खेलते चेहरे पर गहन पीडा दिखाई देने लगती थी! उसके मम्मी पापा बचपन में ही एक दुसरे से अलग हो गए थे! वो अपनी मम्मी के पास रहकर ही बड़ी हुई! पापा के पास कभी छुट्टियों में जाना हुआ लेकिन पापा की दूसरी पत्नी की मौजूदगी के कारण अपने आपको एक मेहमान की तरह ही महसूस करती रही! हम लोग हमेशा बचते थे की उसके सामने अपने पापा के बारे में बात न करें क्योंकि ऐसे वक्त में उसे नज़र बचाकर आंसू पोंछते हमने देखा था! मेरी उम्र की मेरी दोस्त जिसके आज दो बच्चे हैं आज तक अपने अधूरे बचपन को नहीं भुला पायी! आज भी एक शिकायत भगवान् से और अपने माँ पिता से उसके दिल में गाँठ बनकर रहती है! माँ ने लाख चाहा की पिता की कमी महसूस न होने दे लेकिन अकेले अपनी जिम्मेदारी निभाती माँ कब गुस्सैल और चिडचिडी हो गयी उसे खुद पता न चला! अपनी उस दोस्त के लिए हमेशा मुझे भी उतना ही दुःख होता रहा! इसके बाद मन्नू भंडारी की किताब " आपका बंटी" पढ़ी! ऐसा लगा बंटी के रूप में अपनी दोस्त को ही देख रही हूँ! लगा जैसे सारा उपन्यास मेरी दोस्त की जुबानी सुन चुकी हूँ! बस केवल किरदार बदल गए हैं! इसके बाद जैसे सारे वो बच्चे जो माँ बाप के अलगाव की सजा भुगत रहे हैं.....बहुत दयनीय से लगने लगे!उसी वक्त जेहन में जो कुछ कौंधा ,कुछ यूं पन्ने पर आया!
माँ...अब मैं बड़ा हो गया हूँ
मैं जानता हूँ कि
तुझे बहुत फिक्र रहती है मेरी क्योकि
तुझे लगता है मैं छोटा हूँ अभी...
पर माँ..याद है तुझे
कल दीवार पर मैंने ही तो कील लगायी थी
तेरे ऑफिस से आने के पहले
मैंने अकेले ही बिस्तर की चादर बदली थी
कल ही तो दूध का पैकेट खरीद कर लाया था
और पैसे भी नहीं गिराए थे
माँ..मुझे पता है कि
पापा तुझसे झगडा करके चले गए हैं
और ये भी कि..
तू उन्हें बहुत याद करती है
याद तो मैं भी करता हूँ
पर मैं रोया तो तू कैसे चुप रहेगी
माँ,तू रोज़ मुझे अपनी गोद में सुलाती है
एक बार मेरी गोद में सर रखकर देख
एक बार मेरी बच्ची बनकर देख
तुझे अच्छा लगेगा माँ...
तुझे याद है न माँ
मैंने महीनों से कोई शरारत नहीं की है
स्कूल के किसी बच्चे से झगडा भी नही
याद कर माँ...मुझे नही भाता दूध
पर कितने दिनों से चुपचाप पी रहा हूं
मुझे ध्यान से देख माँ
मैं तुझसे कुछ कहना चाहता हूं
तुझे खुश रखना चाहता हूं
मैं अब छोटा नही रहा माँ
पूरे दस साल का हो गया हूं
मैं अब बड़ा हो गया हूं माँ.....
भगवान किसी बच्चे को दस साल की उम्र में बड़ा न बनाए....
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नज़्म
Sunday, November 16, 2008
तेरी याद का एक पौधा
अपने दिल के गुलशन में मैंने
रोपा था तेरी याद का एक पौधा
मोहब्बत की खाद
अश्कों के पानी से
सींच सींच कर पाला बड़े प्यार से
आज बड़ा हो गया है मेरा ये पौधा
देख,कितने फूल आये हैं इसमें
और तू बिखर गयी है
फिजा में खुशबू बन के.....

जाते जाते समेट ली थी
तुम्हारी आहट मैने
अपने आगोश में,
हर शब बाहें खोल के
ज़मीन पे डाल देती हूँ इस आहट को
तुम्हे पता है न..
.मुझे अँधेरे में अकेले डर लगता है!
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नज़्म
Saturday, October 11, 2008
ये रिश्ते भी कितने अजीब होते हैं
आज बरसों बाद तुम्हे देखा
अच्छे लग रहे थे काली टीशर्ट और जींस में
पर तुम्हे कह भी न पायी
बस...यादें खींच कर ले गयीं बीते दिनों में
अभी कल की ही तो बात थी
तुम शामिल थे मेरी ढलती शामों और
उनींदी रातों में
हमारी ख्वाहिशों ने साथ ही तो
मचलना सीखा था
याद है...
उस रात नंगे पाँव लॉन में टहलते हुए
तुम बेवजह ही हँसे थे
मेरे सरदारों वाले जोक्स पर , और
चाँद भी बादलों पर कोहनी टिकाये
खिलखिला दिया था...

आज भी याद है वो वीराना चर्च
जहां एक रोज़ हमने अपनी धड़कनें बदली थीं
और सलीब पर टंगा ईसा
हौले से मुस्कुराया था
एक डूबती शाम को
अच्छे लग रहे थे काली टीशर्ट और जींस में
पर तुम्हे कह भी न पायी
बस...यादें खींच कर ले गयीं बीते दिनों में
अभी कल की ही तो बात थी
तुम शामिल थे मेरी ढलती शामों और
उनींदी रातों में
हमारी ख्वाहिशों ने साथ ही तो
मचलना सीखा था
याद है...
उस रात नंगे पाँव लॉन में टहलते हुए
तुम बेवजह ही हँसे थे
मेरे सरदारों वाले जोक्स पर , और
चाँद भी बादलों पर कोहनी टिकाये
खिलखिला दिया था...

आज भी याद है वो वीराना चर्च
जहां एक रोज़ हमने अपनी धड़कनें बदली थीं
और सलीब पर टंगा ईसा
हौले से मुस्कुराया था
एक डूबती शाम को
चिनार के तले
तुमने अपने लबों से सुलगाया था
मेरे सर्द लबों को
सूखी पत्तियां चरमराकर जल उठी थीं
और तुम कह उठे थे जज्बाती होकर
हमारा ये रिश्ता
पाक है एक इबादत की तरह
मासूम है किसी दुधमुंहे बच्चे की हंसी जैसा
और सच्चा है माँ की दुआओं जितना
और आज....
क्योंकि कोई और बैठती है
तुम्हारी कार की फ्रन्ट सीट पर
सिर्फ इसी लिए हमारा रिश्ता
बन गया एक नाजायज़ रिश्ता
ये रिश्ते भी कितने अजीब होते हैं ना...?
तुमने अपने लबों से सुलगाया था
मेरे सर्द लबों को
सूखी पत्तियां चरमराकर जल उठी थीं
और तुम कह उठे थे जज्बाती होकर
हमारा ये रिश्ता
पाक है एक इबादत की तरह
मासूम है किसी दुधमुंहे बच्चे की हंसी जैसा
और सच्चा है माँ की दुआओं जितना
और आज....
क्योंकि कोई और बैठती है
तुम्हारी कार की फ्रन्ट सीट पर
सिर्फ इसी लिए हमारा रिश्ता
बन गया एक नाजायज़ रिश्ता
ये रिश्ते भी कितने अजीब होते हैं ना...?
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नज़्म
Sunday, September 14, 2008
शायद खुशियाँ सबको अच्छी नहीं लगतीं....
अभी हाल ही में राज भाटिया जी का लेख देखा....आदतों का गुलाम होने के विषय में! कल ही घर में काम करने वाली बाई ने बताया की उसकी बेटी बहुत परेशान है...पति कुछ नहीं करता , दिन भर शराब पीता है और मारपीट करता है! कई बार सोचती हूँ...कितने लोग सिगरेट, शराब, ड्रग्स ,तम्बाकू, गुटके की चपेट में हैं...इनके नुकसानों को जानते बूझते भी नहीं छोड़ पा रहे हैं...सबसे ज्यादा घर बरबाद होते हुए मैंने देखे हैं शराब की आदत से!कितनी औरतें दिन भर कमाती हैं और शराबी पति एक झटके में उस मेहनत को बोतल में भरकर पी जाता है....उसके बाद गाली गलोज , पिटाई का देर रात तक चलने वाला सिलसिला! पति शराब पीकर सोया हुआ है और पत्नी आंसू पीकर जागती रहती है! बच्चे भी सहमकर माँ से चिपक जाते हैं....कुछ साल बीतते हैं , पति कई बीमारियों का शिकार होकर हड्डियों का ढांचा बन चूका है! लेकिन घर की स्थिति नहीं बदलती है! अब बेटे ने बाप की जगह ले ली है!बोतल की खनखनाहट अभी भी घर में गूंजती है.....ये तो हुई निचले तबके के घरों की बात जो अशिक्षित हैं! उन परिवारों का क्या जो सिर्फ फैशन समझकर या स्वयं को हाई सोसायटी दिखाने के लिए जानते बूझते इस जहर को शरीर में उतार रहे हैं!कभी उन बच्चों से पूछिए जिनका पिता शराब के नशे में झूमता हुआ घर में कदम रखता है.....क्या एक लड़खडाता हुआ पिता अपने बच्चे के क़दमों को फिसलने से रोक पायेगा?! एक शौक के रूप में शुरू हुई आदत किस कदर इंसान को शिकंजे में ले लेती है!ये तब पता चलता है जब स्थिति भयावह हो जाती है......कई परिवारों का पैसा, मान सम्मान मिटटी में मिलते मैंने अपनी आँखों से देखा है!जाने कब और कैसे ख़त्म होगी इस दुनिया से नशे की लत......? ऐसे ही किसी शराबी पति से दुखी महिला से मिलने के बाद खराब मन से कभी एक कविता लिखी थी....
तीन सहमे, डरे, सिमटे हुए बच्चे
कसकर पकडे
एकदूसरे का हाथ
घर के कोने में बैठे हैं...
माँ भी अपना सूजा बदन लिए
दर्द से कराहती
आँखों में
दर्द,बेबसी,अपमान और
शर्म के आंसू लिए
औंधे मुंह पड़ी है
मोहल्ले के लोगों को
कुछ देर के लिए
अपनी जिंदगी को भूलकर
मौका मिल गया है हँसने का
आखिर देखना चाहते हैं सभी
मुफ्त का तमाशा
और...
बच्चों का पिता
नशे में चूर
दिन भर की कमाई
शराब के नाम कर आया है और
फर्श पर पड़ा है
खून उगलता हुआ
और... ख़ुशी के मारे
पास ही नाच रही है
शराब की एक बोतल
आधी भरी...
गुरूर से कहती हुई
तू खुश है मुझे पीकर
और मैं बहुत खुश हूँ
तेरा जिस्म,दौलत,सम्मान
और परिवार की खुशियाँ पीकर....
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नज़्म
Tuesday, September 9, 2008
एक सिफारिश छोटी सी...

सुनो मांओ
बाहर रिमझिम बरसात हो रही है
मत बांधो अपने नन्हे मुन्नों को
घर के अन्दर किताबों,वीडियोगेम और कार्टूनों में
तुमने शायद देखा नहीं
तुम्हारे नन्हे की आँखें खिड़की के बाहर टिकी हुई हैं
क्या तुम्हे उसकी आँखों की प्यास नज़र नहीं आती?
उसे निकलने दो घर के बाहर
खेलने दो गीली मिटटी में
भीग लेने दो जी भर कर
यकीन मानो,
ये मिटटी उसे नुकसान नहीं पहुंचायेगी
उसे देखने दो
बारिश में भीगता पिल्ला
कैसे अपने रोंये खड़े करके कांप रहा है
शायद वह उसे किसी सूखी जगह पर रख दे
उसे सुनने दो
बूंदों का मीठा संगीत
शायद ये संगीत उसकी आत्मा में
सरगम बनकर उतर जाए
उसे छूने दो
भीगे हुए रंगबिरंगे फूलों को
शायद फूलों की कोमलता
उसके ह्रदय को भी कोमल बना दे
उसे जानने दो
मिटटी में एक इंच नीचे ही
केंचुए भी रहते हैं
जो हमारे दोस्त हैं
शायद वह केंचुओं से डरना छोड़ दे
उसे महसूस करने दो
मिटटी की सौंधी महक
शायद वह जान पाए
इससे अच्छा कोई इत्र नहीं बना
और जब वह उछल रहे हों
पानी के छींटे उडाते हुए
चुपके से उनका एक फोटो खींच लो
सहेज लो इन पलों को अपनी स्म्रतियों में
शायद ये सबसे अनमोल तस्वीर होगी
उसके लिए भी और तुम्हारे लिए भी...
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नज़्म
Sunday, August 24, 2008
क्यों नहीं लिखते एक ऐसी नज़्म..

एक मुट्ठी धूप, चन्द कतरे रात के
एक बूढा आसमान और
उस पर टंगे चाँद को
समेटते हो अपने जेहन में और
रच देते हो एक नज़्म
कभी मेरे घर आकर देखो
यहाँ भी है एक बूढा बाप
शायद एक आध मुट्ठी अनाज भी मिल जाये
चन्द कतरे आंसुओं के
टूटी खाट के सिरहाने पड़े हैं
और एक चाँद यहाँ भी है जो
अक्सर भूखा सोता है
क्यों नहीं लिखते एक नज़्म
उधडी और फटी जिंदगियों पर..
मोहब्बत और बेवफाई पर
रंग दिए हैं तुमने ढेरों कागज़
आँखें भर आती हैं लोगों की
जब पढ़ते हैं तुम्हारी दर्द में डूबी नज़्म
कभी आओ इधर भी और देखो
मेरी माँ पड़ी है बिस्तर पर खून उगलती
मांग रही है दिन रात मौत की दुआ
पर कमबख्त वो भी नहीं फटकती इधर
क्यों नहीं लिखते एक नज़्म
मौत की इस बेवफाई पर...
तुम जानते हो ,
कोई नहीं देखना चाहता
चाँद ,तारों की हसीन दुनिया के परे
जब फूल और तितली पर बन सकती है
एक उम्दा नज़्म तो फिर
क्यों कोई नाली में भिनकते मक्खी मच्छर
और फटी एडियों पर लिखे कोई कविता
पर तुम लिखो....
कोई पढ़े या न पढ़े
पर तुम्हे मिल जायेगा कोई न कोई पुरस्कार
आखिर निर्णायकों का ज़रूरी है
संवेदनशील होना भी...
अक्सर भूखा सोता है
क्यों नहीं लिखते एक नज़्म
उधडी और फटी जिंदगियों पर..
मोहब्बत और बेवफाई पर
रंग दिए हैं तुमने ढेरों कागज़
आँखें भर आती हैं लोगों की
जब पढ़ते हैं तुम्हारी दर्द में डूबी नज़्म
कभी आओ इधर भी और देखो
मेरी माँ पड़ी है बिस्तर पर खून उगलती
मांग रही है दिन रात मौत की दुआ
पर कमबख्त वो भी नहीं फटकती इधर
क्यों नहीं लिखते एक नज़्म
मौत की इस बेवफाई पर...
तुम जानते हो ,
कोई नहीं देखना चाहता
चाँद ,तारों की हसीन दुनिया के परे
जब फूल और तितली पर बन सकती है
एक उम्दा नज़्म तो फिर
क्यों कोई नाली में भिनकते मक्खी मच्छर
और फटी एडियों पर लिखे कोई कविता
पर तुम लिखो....
कोई पढ़े या न पढ़े
पर तुम्हे मिल जायेगा कोई न कोई पुरस्कार
आखिर निर्णायकों का ज़रूरी है
संवेदनशील होना भी...
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नज़्म
Monday, July 28, 2008
'ए खुदा...बचपन को तो बख्श

रात के वीराने में उसकी किलकारी
जैसे किसी ने साँझ ढले
राग यमन छेड़ दिया हो
उसकी वो नन्ही-नन्ही अधखुली मुट्ठियाँ
नींद में मुस्कुराते होंठ
बार-बार बनता-बिगड़ता चेहरा
मोहपाश में बाँध रहे थे
विडम्बना यह कि वो फरिश्ता
नरम बिछौना, पालना या
माँ की गोद में नहीं
बल्कि कचरे के ढेर पर सो रहा था
इंसानों को कहाँ फुरसत थी,
उसकी रखवाली
मोहल्ले का 'मोती' कर रहा था
ए खुदा!
हम बड़े ही बहुत हैं
तेरे इम्तिहानों से गुजरने के लिए
कम से कम बचपन को तो बख्श...
जैसे किसी ने साँझ ढले
राग यमन छेड़ दिया हो
उसकी वो नन्ही-नन्ही अधखुली मुट्ठियाँ
नींद में मुस्कुराते होंठ
बार-बार बनता-बिगड़ता चेहरा
मोहपाश में बाँध रहे थे
विडम्बना यह कि वो फरिश्ता
नरम बिछौना, पालना या
माँ की गोद में नहीं
बल्कि कचरे के ढेर पर सो रहा था
इंसानों को कहाँ फुरसत थी,
उसकी रखवाली
मोहल्ले का 'मोती' कर रहा था
ए खुदा!
हम बड़े ही बहुत हैं
तेरे इम्तिहानों से गुजरने के लिए
कम से कम बचपन को तो बख्श...
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Saturday, July 12, 2008
एक मेहनतकश बच्चे की दास्ताँ

आज पहली बार कुछ करार आया है
गरीब के बच्चे पे मुझे प्यार आया है
मुफलिसी ने जितना सताया है उसको
उससे ज्यादा तो वो आज मुस्कुराया है
हाथों में जिसके सजनी थी कलम और किताब
वक़्त ने उस हाथ में बोझा थमाया है
सहमा सा बैठा है छोटे भाई को लिए
बाप उसका आज फिर से पी के आया है
बिखरे उलझे बाल, चेहरे पे चढी धूल
मासूमियत का कोई क्या बिगाड़ पाया है
खामोश निगाहों से दुकानों को ताकता
उफ़,नन्हें से दिल में कितना धीरज समाया है
करके जूते पॉलिश सुबह से शाम तक
माँ के लिए कुछ चूड़ियाँ खरीद लाया है
उन छोटे से बच्चे की गैरत को है सलाम
अभी अभी जो भीख को ठुकरा के आया है
धरती का बिछौना ,अम्बर की है चादर
थक हार कर कुदरत की गोद में समाया है
ढाबों,स्टेशनों और हर चौराहे पर
हर जगह उसी को,बस उसी को पाया है
घुमड़ रहा जेहन में बस एक ही सवाल
साठ साल बाद क्या यही भारत पाया है?
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नज़्म
Wednesday, July 9, 2008
Saturday, June 28, 2008
ये भी तो इबादत है....है न?
लोग अक्सर मुझे नास्तिक कहते हैं....क्या ये इबादत नहीं है?
आज की सुबह वाकई जादुई थी
ठंडी हवा ने हौले से
सहलाया मेरे सर को
उठी तो देखा
हर फूल,हर पत्ते पर
चमक रहे थे ओस के मोती
खिलखिलाता हुआ सूरज
छत की मुंडेर पर गाती चिड़िया
मुझे सुप्रभात कह रहे थे...
मैंने खुदा को शुक्रिया कहा
और चाहा कि आज का दिन
बिताऊ खुदा की इबादत में
फिर मैंने...
दूध वाले को एक प्याला चाय पिलाई
एक गुलाब दिया अपनी माँ को
माली काका को भेजा
टिकिट देकर फिल्म देखने
कचरा बीनते एक बच्चे को
खिलाया पिज्जा हट का पिज्जा
गली में घूमते एक नन्हें से पिल्ले को
नहला दिया गरम पानी से
शाम को जब ऊपर निगाह डाली
खुदा बादलों के पीछे से
मुस्कुरा रहा था
शायद खुदा ने मेरी इबादत कुबूल कर ली...
आज की सुबह वाकई जादुई थी
ठंडी हवा ने हौले से
सहलाया मेरे सर को
उठी तो देखा
हर फूल,हर पत्ते पर
चमक रहे थे ओस के मोती
खिलखिलाता हुआ सूरज
छत की मुंडेर पर गाती चिड़िया
मुझे सुप्रभात कह रहे थे...
मैंने खुदा को शुक्रिया कहा
और चाहा कि आज का दिन
बिताऊ खुदा की इबादत में
फिर मैंने...
दूध वाले को एक प्याला चाय पिलाई
एक गुलाब दिया अपनी माँ को
माली काका को भेजा
टिकिट देकर फिल्म देखने
कचरा बीनते एक बच्चे को
खिलाया पिज्जा हट का पिज्जा
गली में घूमते एक नन्हें से पिल्ले को
नहला दिया गरम पानी से
शाम को जब ऊपर निगाह डाली
खुदा बादलों के पीछे से
मुस्कुरा रहा था
शायद खुदा ने मेरी इबादत कुबूल कर ली...
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Tuesday, June 17, 2008
उदास,सहमा, नन्हा सा बच्चा

एक गरीब नन्हा सा बच्चा
टूटा हुआ,उदास,सहमा सा
बैठा है सर झुकाए
हथेलियों से अपना मुंह छिपाए
पिता ने बचपन में ही साथ छोड़ दिया
माँ ने भी कल जिंदगी से मुंह मोड़ लिया
कहाँ जाए ,क्या करे,
कुछ समझ नहीं आता है
जिंदगी की कड़ी धूप.कोई साया नहीं पाता है
खोया इन्ही विचारों में, आंसू पोंछता वो
चल दिया रोटी की तलाश में
चिलचिलाती धूप में एक बादल का टुकडा
लगातार चल रहा था उसके ऊपर
उसके मन से आवाज़ आई
ओह माँ, इसे तुमने भेजा है ना
आंसू भरी आँखों से ऊपर देखा उसने
बादल से भी एक बूँद गिरी और
आंसू से मिलकर गाल पर लुढ़क गयी....
टूटा हुआ,उदास,सहमा सा
बैठा है सर झुकाए
हथेलियों से अपना मुंह छिपाए
पिता ने बचपन में ही साथ छोड़ दिया
माँ ने भी कल जिंदगी से मुंह मोड़ लिया
कहाँ जाए ,क्या करे,
कुछ समझ नहीं आता है
जिंदगी की कड़ी धूप.कोई साया नहीं पाता है
खोया इन्ही विचारों में, आंसू पोंछता वो
चल दिया रोटी की तलाश में
चिलचिलाती धूप में एक बादल का टुकडा
लगातार चल रहा था उसके ऊपर
उसके मन से आवाज़ आई
ओह माँ, इसे तुमने भेजा है ना
आंसू भरी आँखों से ऊपर देखा उसने
बादल से भी एक बूँद गिरी और
आंसू से मिलकर गाल पर लुढ़क गयी....
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नज़्म
Thursday, June 5, 2008
Wednesday, May 28, 2008

एक उदास शाम
मैं बैठा समंदर किनारे
अपनी भीगी पलकें लिए
उफक पर डूबता हुआ सूरज
जैसे मेरी खुशियाँ भी
साथ लेकर डूब रहा हो
घोर निराशा,घोर अन्धकार
मैं कर रहा था सिर्फ
अपनी मौत का इंतज़ार
समंदर की लहरें
मानो हँस रहीं थीं
मेरे दर्द पर
यकीन था मुझे कि
खुशियाँ मुंह मोड़ चुकी हैं मुझसे
और रौशनी बिछड़ चुकी है
तभी एक मखमली स्पर्श ने
चौंकाया मुझे
एक नन्हा बच्चा आकर
लटक गया मुझसे
मैं भूल गया अपने ग़म
कुछ पल को
हमने रेत का घर बनाया
सीप इकट्ठी कीं
और जी भर के भीगे
उन मचलती लहरों में
और उसी पल उफक पर डूबते हुए
सूरज ने मुझसे कहा
चाहे बंद हो दरवाज़ा,लेकिन
रौशनी की तरह
ख़ुशी को भी
अन्दर आने के लिए
सिर्फ एक दरार ही काफी है...
मैं बैठा समंदर किनारे
अपनी भीगी पलकें लिए
उफक पर डूबता हुआ सूरज
जैसे मेरी खुशियाँ भी
साथ लेकर डूब रहा हो
घोर निराशा,घोर अन्धकार
मैं कर रहा था सिर्फ
अपनी मौत का इंतज़ार
समंदर की लहरें
मानो हँस रहीं थीं
मेरे दर्द पर
यकीन था मुझे कि
खुशियाँ मुंह मोड़ चुकी हैं मुझसे
और रौशनी बिछड़ चुकी है
तभी एक मखमली स्पर्श ने
चौंकाया मुझे
एक नन्हा बच्चा आकर
लटक गया मुझसे
मैं भूल गया अपने ग़म
कुछ पल को
हमने रेत का घर बनाया
सीप इकट्ठी कीं
और जी भर के भीगे
उन मचलती लहरों में
और उसी पल उफक पर डूबते हुए
सूरज ने मुझसे कहा
चाहे बंद हो दरवाज़ा,लेकिन
रौशनी की तरह
ख़ुशी को भी
अन्दर आने के लिए
सिर्फ एक दरार ही काफी है...
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