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Wednesday, April 15, 2015

एक मुकम्मल सी मुलाक़ात हुई थी उनसे

उसे जैसे इस लम्हे में होना ही था मेरे साथ ! अगर हम दोनों दुनिया के अलग अलग छोरों पर भी होते तब भी इस लम्हे में आकर हमें मिलना ही था ! और उस वक्त में मैं ,मैं नहीं कोई और थी !यूं जैसे कोई जादूगर एक छड़ी घुमा रहा था और मैं उसके मन्तरों में बंधती जा रही थी !यूं जैसे दुनिया की बेहतरीन शराबें मेरे हलक से उतरती जा रही थीं !यूं जैसे कि उस पल में मैं एक चुम्बक बन गयी थी और उसके रक्त का सारा लोहा मुझे खींचे जा रहा था! उसके करीब होना किसी और जनम से ही तय था !एक बादल मुझ पर बरसने आया था ! देह सिमटने की बजाय खुलने लगी थी ,खिलने लगी थी ! हाथ थामते ही धड़कनें एक दूसरे को पहचान गयीं थीं ! वक्त का गुज़रना सज़ा ऐ मौत के फरमान से ज्यादा क्रूर हो चला था ! उस पल में मैं पूरी तरह बस उसी पल में थी ! न एक पल आगे ,न एक पल पीछे !

वो अजनबी चन्द घंटों के लिए यूं मेरे पास आया और चला गया जैसे एक खुशबू भरा रेशमी स्कार्फ हाथों में धीरे धीरे फिसलते हुए उड़ जाए और हथेलियों को महका जाए हमेशा के लिए! नाम ,पता,जात, शहर सब बेमानी सवाल थे ! कसमें ,वादे ,शिकवे कुछ भी तो न था उन पलों में ! न दोबारा मिलने की ख्वाहिश और न बिछड़ने का ग़म ! बस देह से आत्मा तक ख़ुशी ही तो थी थिरकती हुई ! हर सवाल का बस एक ही जवाब था कि वो अजनबी नहीं , बेहद अपना है ! उससे पहचान इतनी पुरानी है कि उसके आगे सबसे पुराने रिश्ते भी नए थे ! अगर वो उस क्षण मेरा हाथ थाम कहता कि "चलो " तो मैं बिन कुछ पूछे उसके साथ चल पड़ती ! अगर अवचेतन को मैं ज़रा सा भी अपने बस में कर पायी होती तो मुझे पता होता कि इसके पहले किस सदी में हम यूं हाथों में हाथ डाले ऐसे ही बैठे थे !

उसके स्पर्शों के फूल मेरे काँधे ,गर्दन , माथे और होंठों पर अब भी खिले हुए हैं ! और उसकी हथेली की गर्माहट रूह को अब तक महसूस हो रही है ! उसकी आँखें मेरे साथ चली आई हैं ! सामने बैठी मुझे एकटक देखे जा रही हैं ! उसकी मुस्कराहट याद कर मेरे गाल लाल हो उठते हैं !वो जो घट रहा था उन पलों में ,वो सबसे सुन्दर था ,सबसे सच्चा था !

मुझे यकीन है वो मुझे फिर मिलेगा ! ठीक वैसे ही जैसे आज अचानक मेरे सामने आकर बैठ गया था ... बेइरादा ,बेमक़सद ! सिर्फ ये बताने के लिए कि "मैं हूँ , कहीं नहीं गया" ! शायद फिर किसी लम्हे में हम दोनों दुनिया के अलग अलग कोनो से भागते हुए आएंगे और गले लग जाएंगे ! फिर एक रात खामोशियों में अपना सफ़र तय करेगी ! फिर किसी के सीने पर मेरा सर ऐसे ही टिका होगा और दो मजबूत बाहें मेरे इर्दगिर्द लिपटी होंगी !

रूमानी शब्द इस एहसास के लिए बहुत छोटा है ! ये एक रूहानी एहसास था ! सदा के लिए ... सदा सदा के लिए!

Tuesday, May 4, 2010

वक्त का यूं मनमानी करना भी भला लगता है.....

मैं अक्सर सोचती हूँ.....
कई बार वक्त गुज़र कर भी क्यों नहीं गुज़रता....ढीट बनकर खड़ा रहता है! और कैसे कहे कोई इसे चले जाने को! वक्त से तकरार करना जैसे खुद को ही पराजित करना है! कई बार सोचती हूँ..मैं इस नामुराद के मुंह लगती ही क्यों हूँ मगर यादों का पुलिंदा उठाये यही तो चला आता है बार बार! जतन करके बिसारी हुई सारी यादें एक एक करके करीने से जेहन में सजाने लग पड़ता है! जैसे कोई पिट पिट के ढीट हो गया बच्चा...".हुह "
:जिस काम को मना करो वही करना है! ऐसा लगता है मानो घर का सारा इंटीरियर ही बदल गया! जहां मैं कुछ सदाबहार गाने....ख़ुशी में लिपटे हुए लिफ़ाफ़े....जिंदगी की शोर शराबे भरी रेल पेल....घर में ताज़ा रखे हुए रजनीगंधा की महक और एक स्माइली सहेज कर रखती हूँ....वहीं अचानक ये वक्त आ धमकता है और एक एक सामान फेंककर सजा देता है... कुछ पुराने ख़त जिनकी स्याही भी मिट चली है.., एक पुराने स्कूटर पर बैठे हुए दुनिया से बेपरवाह दो लोग....,झील किनारे की एक बेंच...,एक पुराना की रिंग....कुछ बिना नाम लिखे हुए ग्रीटिंग कार्ड्स और आंसुओं में गहरे डूबती हुई अनगिनत रातें! देखो तो कमबख्त ने पीछे धकेल धकेल कर कहाँ पहुंचा दिया है! जैसे ये वक्त कभी बीता ही न हो! मैं महसूस करती हूँ ...मेरी रगों में मेरे अलावा कोई और जाना पहचाना भी दौड़ने लगा है! मेरी साँसों के साथ एक सांस और सुनाई देने लगी है और किसी के छूने की सिहरन मुझे थरथरा देती है! यादों की मिठास और आंसुओं का नमक जैसे जिंदगी का जायका ही बदलकर रख देता है पर मुझे नहीं चाहिए ये स्वाद.....कभी जूने पुराने सामान को भी कोई सहेज कर रखता है भला? वक्त अभी भी ठीक मेरे सामने ठोड़ी पर हाथ टिकाये बैठा है और मुस्कुराता हुआ मुझे अपने साथ बहते हुए देख रहा है!

तभी अचानक किसी पल ऐसा लगने लगता है की यही सामान जिसे कबाड़ मानकर स्टोर की राह दिखाई थी! वही असली कमाई है मेरी! दो गर्म बूँद लुढ़क चली हैं मेरे गालों पर ! मैं वक्त को बाहों में समेट लेती हूँ और पूछती हूँ..
" क्या कभी इसी तरह उसके जेहन को भी इन्ही चीज़ों से सजा दिया करते हो?"

Saturday, March 27, 2010

कई खूबसूरत सुबहें समेट रखी हैं मैंने.....

आहा...एक और बेहद खूबसूरत सुबह! चेहरे पे मुस्कराहट वही बरसों पुरानी पर वजह हर रोज़ नयी! रोज़ की तरह आज भी निकली हूँ सुबह सैर करने.....पार्क की एक बैंच पर बैठती हूँ योगा करने पर....मन नहीं लगता! आज मन कहीं और अटका हुआ है.....एक क्रिकेट बॉल में ! पार्क में दो जगह क्रिकेट मैच चल रहा है! एक जगह १४ -१५ साल की उम्र के बच्चे खेल रहे हैं , दूसरी जगह ९-१० साल के बच्चे खेल रहे हैं! आँखें कभी इस तरफ जाती हैं तो कभी दूसरी तरफ! क्या करूँ...बहुत मन हो रहा है बैटिंग करने का! सोचती हूँ...काहे को इत्ती बड़ी हो गयी! क्या बिगड़ जाता इस भगवान का अगर इस दुनिया में एक लड़की बड़ी नहीं होती?


सिक्सर........अचानक जोर का शोर उठा है छोटे बच्चों वाले ग्रुप से! भाड़ में गया योगा....थोड़ी देर खेल ही देखती हूँ इनका! उठकर चल देती हूँ.....सामने एक सबसे छोटा बच्चा दिखाई दे रहा है....अपना सर झटक कर बौलिंग करने दौड़ पड़ा है.....छुटका तेज़ बॉल डालता है!
सामने वाला आउट हो गया है....अपना बैट लेकर जा रहा है! यही सही मौका है....कूद पड़ो बेटा मैदान में!मैं बीच में ही उसे रोकती हूँ.." मुझे खिलाओगे थोड़ी देर?" वो सबकी तरफ देखता है फिर कहता है " हाँ हाँ...आ जाओ , क्या करोगी?" मैं तडाक से कहती हूँ " बैटिंग..."
ठीक है कर लो.....अब उसका छोटा सा बैट मेरे हाथों में आ गया है! एक लड़का थोडा नाखुश है...शायद उसी का टर्न था बैटिंग का! मैं बैटिंग करने खड़ी होती हूँ.....बैट को ज़मीन पर ठोकती हूँ! "बॉल ज़रा धीरे डालना....." मैं पहली बॉल पर आउट नहीं होना चाहती हूँ! बौलर बहुत क्यूट है....धीरे से टप्पे वाली बॉल डाली है उसने. मैं खुश हूँ....पक्का baundry पार करा दूंगी ! बॉल करीब आती है...बैट टकराता है और बॉल ऊपर उठ जाती है! पर वो छुटका बड़ी आसानी से कैच ले लेता है....उसने फिर अपना सर झटका है! अरे यार....आउट हो गयी! छुटका हंस रहा है! ठीक है बैट एक लड़के को थमाकर जाने लगती हूँ....तभी एक आवाज़ आती है " दीदी...फील्डिंग भी करनी पड़ती है!" देखती हूँ...वही छुटका था! " छोकरा चालू है.....मैं सोचती हूँ ! हाँ हाँ ...क्यों नहीं! मैं फील्डिंग करने खड़ी हो गयी हूँ....फिर बौलिंग का भी नंबर आया ! आधे घंटे बाद मेरी सबसे दोस्ती हो गयी है! और मुझे लग रहा है....जैसे मैं ही उनकी लीडर हूँ! बच्चे मेरी बात मान रहे हैं! उन्हें लग रहा है...मुझे क्रिकेट अच्छे से आता है...!

खेल ख़तम होता है....मैं घर वापस आती हूँ! धोबन आकर पूछती है " क्या बात है दीदी....अकेले अकेले हंस रही हो"?
" बस ऐसे ही ...सब कुछ अच्छा अच्छा लग रहा है" मैं जवाब देती हूँ और फिर मुस्कुराने लगती हूँ! मैंने ऊपर आसमान में ठेंगा दिखाया है " तुम बुड्ढा किये बिना नहीं मानोगे , कर लो पर मेरा क्या बिगाड़ लोगे"

Thursday, March 11, 2010

एक सर्द ख़ामोशी....अंतहीन...


चारों तरफ एक बेचैन सी ख़ामोशी पसरी हुई है...! मुझे डर लगने लगा है इस सन्नाटे से! बार बार पसीना पोंछता हूँ! कोई दूर ले जाओ इस ख़ामोशी को....जो कानों के अन्दर से घुसकर मेरे पूरे शरीर में रेंगने लगी है! मेरे कान तरस गए हैं शोर को! इस सन्नाटे में मुझे मेरा ज़मीर की आवाज़ बहुत साफ़ सुनाई देती हैं! मैं नहीं सुनना चाहता हूँ इसकी बकवास! झिंझोड़े डाल रहा है कोई मेरे अन्दर से मुझको! उफ़ कितना सर्द होता है ये सन्नाटा....मेरी रगों में खून जमा जा रहा है!

बेबसी में मैं देख रहा हूँ इधर उधर....हर आने जाने वाले से बात करने की गुहार करता हूँ! सब मुझे देखते हैं...उनके हिलते हुए होंठ दिखाई पड़ते हैं मुझे,..मेरे कानों को क्यों नहीं सुनाई देते! मुझ तक आने के पहले ही बर्फ बनकर ज़मीन पर गिरते जाते हैं! चारों और बर्फ ही बर्फ फैलती जाती है!

..कौन सी होगी वो आंच जो इस सर्द ख़ामोशी को पिघला देगी....क्या एक शापित की तरह मुझे जन्मों तक इंतज़ार करना होगा! दोनों हथेलियों को आपस में जोर से रगड़ता हूँ....बदले में मुझे एक चीखती हुई हंसी सुनाई देती है! ख़ामोशी हंस रही है मुझ पर!हंसी की आवाज़ तेज़ होती जा रही है....और तेज़! रेलवे स्टेशन की और भागता हूँ मैं बदहवास सा! ट्रेन ने सीटी दी है...मैं पास जाता हूँ उसे सुनने! पर सीटी में भी एक भयानक अट्टहास सुनाई देता है! मैं हार चूका हूँ! घटने के बल बैठकर मौत को बुला रहा हूँ! रोना चाहता हूँ जार जार मगर आंसू बर्फ बन कर आँखों के अन्दर ही कहीं चुभ रहे हैं!

पता नहीं कैसे मैं खुद को कब्रिस्तान में बैठा पाता हूँ! पीछे मुड़कर देखता हूँ....ख़ामोशी जलती निगाहों से देखती ठीक मेरे पीछे खड़ी है! मैं हाथ जोड़ रहा हूँ...अपना सर ज़मीन पर पटक रहा हूँ पागलों की तरह! ख़ामोशी का अक्स बदलता है...एक परछाई उभर रही है जो बहुत अजीब निगाहों से मुझे देख रही है! एक सुकून है उन निगाहों में...!

ये सुकून भरी निगाहें इतनी जानी पहचानी क्यों लगती हैं मुझको.....पहले कहाँ देखा है इन्हें? अचानक सब दिखाई पड़ने लगता है मुझको......कभी ये सुकून मेरी ही निगाहों में था और मेरी जगह हाथ जोडती, सर पटकती मेरे जवाब का इंतज़ार करती वो....! थककर खामोश हो गयी थी !

वही ख़ामोशी चीरे दे रही है मुझे..... दीमक की तरह कुतरे जा रही है! आह...वो कौन सी ऊष्मा होगी जो इस सन्नाटे को पिघला कर मेरे जिस्म से बाहर निकाल देगी! शायद पछतावे की....हाँ यकीनन! पर ख़ामोशी के इस हिम खंड को पिघलने में शायद सदियाँ लग जायेंगी........

Sunday, January 3, 2010

साल का पहला दिन...पपड़ी चाट सा



नए साल का पहला दिन....मिले जुले से एहसासों का एक अनोखा पैकेज लेकर आया ! शुक्र है इस बार मैंने नहीं सोचा था की साल के पहले दिन जल्दी उठकर घूमने जाउंगी...इसलिए " shit...शुरुआत ही संकल्प टूटने से हुई" वाला गिल्ट फील नहीं हुआ! ऑफिस पहुँचने तक सब कुछ एकदम रूटीन ही था....कुछ नया नहीं! ऑफिस पहुंचकर बैठी...सारा स्टाफ आकर बधाई दे रहा है....ये भी तो नॉर्मल सा ही है...ऐसा ही तो होता है हर बार!नया क्या है इसमें.....रोज़ की तरह कागजों पर साइन करना....कभी कभी सोचती हूँ अगर एक साइन करने का एक रुपया मिलता तो दिन भर में कितने हो जाते.....फ़िज़ूल बातों में दिमाग को उलझाना भी कभी कभी भला लगता है! पर हाँ...एक बात अलग हो रही है.... एक बाबू मुझे याद दिलाता है " मैडम ...आप तारीख में २००९ ही लिख रही हैं" ओह हाँ...पुरानी आदतें कहाँ इतनी आसानी से पीछा छोडती हैं .हाथ automatically अभ्यस्त है , अब ध्यान रखकर लिखना पड़ेगा! " अब ध्यान रखूंगी..." मैं बाबू से कहती हूँ! बाबू समझाता है.." ऐसा होता है मैडम...३-४ दिन लगेंगे अभी "
नहीं नहीं...अब गलती नहीं होगी....तुम अपनी फाइलें यहाँ रख जाओ, मैं साइन कर दूंगी" बाबू फ़ाइल रखकर जा चूका है! मैं पूरा ध्यान रखकर तारीख लिख रही हूँ " 1-1-2010 "
मैं खुश हूँ....मैंने सही तारीख लिखी हैं...बाबू को बुलाकर फाइलें सौंप दी हैं! मैं जताना नहीं भूलती की अब मैंने गलती नहीं की है! वो जाता है....दो मिनिट बाद ही लौटकर आता है...हाथ में वही फाइलें हैं! लगता है गलती हो ही गयी! " क्या फिर तारीख गलत हो गयी गुप्ता जी...."
गुप्ता जी मुस्कुराते हैं....." नहीं मैडम तारीख तो सही हैं ..पर आपने सारे कागजों पर केवल तारीख ही डाली है ...साइन कहीं नहीं किये!" आसपास गौर बाबू और सुमित्रा मैडम भी खड़े हैं....तीनों अपनी हंसी छुपाने के चक्कर में होंठ दबाते हैं! मैं कागज़ लेती हूँ....सचमुच साला होशियारी दिखाने के चक्कर में बेवकूफी कर बैठी! मुझे हंसी रोकने के लिए होंठ दबाने की ज़रूरत नहीं.....बहुत जोर से हंस पड़ती हूँ....उन तीनों के भी दबे होंठ खुल गए हैं! हम सब ठहाका लगाते हैं! मैं सोचती हूँ....नए साल के पहले दिन ये बेवकूफी भी बुरी नहीं....कुछ तो अलग हुआ है रूटीन से!

दोपहर एक बजे.....मोबाइल की घंटी बजती है! मेरी एक जूनियर का फोन है जबलपुर से......न्यू इयर विश कर रही है....इसमें क्या ख़ास है...सभी तो यही करते हैं! लेकिन न्यू इयर विश करने के बाद वो जो कह रही है...वो बहुत बहुत ख़ास है! उसने मुझे मेरी अठारह साल पुरानी दोस्त ऋचा नेमा का फोन नंबर दिया है...और बताया है की ऋचा मुझे बहुत याद करती है! उसने फोन रखा है और ऋचा का फोन आ गया है.....मैं उसे बताती हूँ की दो पोस्ट पहले ही मैंने अपने खोये हुए दोस्तों के बारे में एक पोस्ट लिखी थी और उसमे ऋचा नेमा का भी ज़िक्र था! इतनी जल्दी वो मुझे मिल जायेगी...सोचा नहीं था! अब मैं बहुत बहुत खुश हूँ..... इससे खूबसूरत नए साल की शुरुआत नहीं हो सकती थी!

शाम सात बजे....शीला मुझे फोन करती है! हमने तय किया था की एक तारीख को अनाथाश्रम जायेंगे! पहली बार जा रहे हैं वहाँ...पता नहीं कितने बच्चे हैं...किस उम्र के हैं? क्या लेकर जाएँ...थोड़ी दुविधा है..फिर हम चौकलेट्स खरीदते हैं! आश्रम पहुंचकर बच्चों को देखते हैं! एक मकान में २६ बच्चे हैं....एक दिन के बच्चे से लेकर पांच साल तक के बच्चे हैं! दस पालनों में दो महीने तक के बच्चे हैं...सभी सो रहे हैं! हम सिर्फ उनका पालना हिलाते हैं! वहाँ की केयर टेकर बताती है " ये बच्चा कोई एक बैग में भरकर कोई दरवाजे पर छोड़ गया था" हमारा दिल धक् से रह जाता है....कहीं मर जाता तो? उसी कमरे में एक डबल बैड पर पांच छै बच्चे खेल रहे हैं...करीब एक सवा साल के! शीला वहाँ मैडम से बात कर रही है..मैं कूदकर बच्चों के पास पहुँच जाती हूँ! इनके साथ खेलने ही तो आई हूँ मैं यहाँ पर! बच्चे बहुत फ्रेंडली हैं....एक बच्चे को गोद में उठाकर उछालती हूँ! वो खिलखिला उठता है! अब सारे बच्चे गोद में आने के लिए मचल रहे हैं...उन्हें भी ये उछालने वाला खेल भा गया है! मुझे विश्वास नहीं होता ...मेरी गोद में तीन बच्चे चढ़े हुए हैं...सारे के सारे हलके फुल्के हैं!मैं बहुत बहुत बहुत खुश हूँ! पहले कभी क्यों नहीं आई यहाँ पर.....? आठ बज गए हैं..बच्चों के सोने का टाइम हो गया है! " आपको कभी आना हो तो दोपहर चार बजे आइये...बच्चों का खेलने का समय होता है" केयर टेकर हमें बताती है! बच्चों को बाय करके हम निकलते हैं! " चटाक....एक आवाज़ सुनकर हम पीछे पलटते हैं! " अब सो जाओ चुपचाप...कुछ देर पहले का खिलखिलाता बच्चा गाल सहलाता हुआ बिस्तर के तरफ जा रहा था! मन में कहीं कुछ गहरे तक चटक गया है! मन से दुआ निकलती है...." काश जल्दी से कोई इस बच्चों को यहाँ से गोद लेकर चला जाए!"

दिन ख़त्म हो रहा है....एक दिन जी लिया है.. एक पूरे जीवन की तरह! ऐसा ही तो जीवन होता है...! पपड़ी चाट की तरह........थोडा खट्टा , थोडा मीठा but always yummy....देखकर मुंह में पानी आ ही जाता है! ! और क्या चाहिए आज के दिन इससे ज्यादा! happy new year to all.....enjoy like anything.

Monday, November 16, 2009

जी चुरा ले गया वो टूटे दांत वाला लड़का....

आज की सुबह कुछ ख़ास थी! एक तो हलके कोहरे में डूबी हुई सड़कें जो रात भर बारिश के बाद धुली धुली और खूबसूरत नज़र आ रही थी! दूसरे एक ऐसा वाकया जिसने इस सुहानी सुबह को और भी सुहाना बना दिया! आज सुबह सुबह उठने में बहुत आलस आ रहा था....मगर इतनी सुन्दर सुबह में घूमने का लालच नहीं छोड़ पाई! और अच्छा ही हुआ वरना ऐसी सुबहें तो बहुत आतीं मगर वो टूटे दांत वाला लड़का शायद फिर दोबारा नहीं मिल पता! रोज़ की ही तरह मोबाइल का हैडफोन कानों में लगाए सुबह सुबह के पुराने गानों को सुनते हुए मैं वॉक पर निकली! " याद किया दिल ने कहाँ हो तुम...प्यार से पुकार लो जहां हो तुम..." गाना इस रूमानी सुबह को और भी रूमानी बना रहा था! थोड़ी दूर चलने पर देखा कि एक छोटा लड़का अपनी साइकल की उतरी हुई चेन चढाने की कोशिश कर रहा था! थोडा पास गयी तो देखा कि उसकी साइकल में स्टैंड नहीं था....एक हाथ से साइकल संभाले हुए वो किसी तरह दूसरे हाथ से चेन चढाने का प्रयास कर रहा था!जब मैं उसके पास पहुंची, तब भी वो अपनी चेन और साइकल से ही जूझ रहा था!

मैंने उसके पास जाकर पूछा " मैं पकड़ लूं तेरी साइकल?"
उसने बिना किसी झिझक के कहा " पकड़ लो ना"
मैंने उसकी साइकल थामी...वो दोनों हाथों से जल्दी जल्दी चेन चढाने लगा! मैंने इस बीच ध्यान से उसे देखा! करीब आठ-नौ बरस का वो बच्चा, नीली पेंट और काली टीशर्ट पहने था! गरीब घर का था ! शायद कबाड़ बीनने निकला है, उसकी साइकल के हैंडल पर लटकी कई खाली पौलिथिन देखकर मैंने अंदाजा लगाया! " हो गया"....कहते हुए वो खड़ा हुआ और मुझे देखकर मुस्कुराया! उसके मुस्कराहट के भीतर सामने का टूटा हुआ दांत बड़ा क्यूट लगा मुझे! एक दम से मन में आया कि इस दांत टूटने की उम्र में कबाड़ बीन रहा है ये नन्हा बच्चा! मैं भी मुस्कुराई, पूछा " कहाँ जा रहे हो?"
" काम पर... " बच्चा बोला और एक बार फिर वही सुन्दर सी मुस्कराहट बिखेरकर चला गया! मैं भी अपने रास्ते आगे बढ़ गयी!

अगला गाना था " दीवाना हुआ बादल..." सचमुच क्या खूबसूरत सुबह थी! चार कदम ही चली थी, इतने में देखा वो बच्चा वापस घूम कर मेरी तरफ आ रहा था! कुछ ही सेकण्ड में साइकल मेरे पास लाकर उसने रोकी, मैंने प्रश्नवाचक निगाहों से उसकी ओर देखा! वो मुस्कुराया और मुझसे पूछा " दीदी...मैं आपको कहीं छोड़ दूं?" अब मैं भी अपनी मुस्कराहट ना रोक सकी ! उसकी इस बात पर मुझे उस पर इतना लाड आया की मन किया उसके दोनों गाल पकड़कर बूगी वूगी वुश कर दूं और उसके जोर की एक पप्पी दे दूं! लेकिन मैंने ऐसा किया नहीं! पता नहीं छोटी छोटी इच्छाएं पूरा करने से हमें हमारे अन्दर से ही कौन रोक देता है? मैं बोली " नहीं...मैं तो पैदल ही घूम रही हूँ?"
" अच्छा...." उसकी मुस्कराहट के पीछे टूटा दांत फिर झिलमिलाया और साइकल घुमा कर वो चला गया!

मैं तब तक उसे देखती रही जब तक वो आँखों से ओझल नहीं हो गया! कहाँ से आई उस नन्हे से बच्चे में इतनी समझ? नहीं नहीं...ये समझ नहीं, ये तो उसकी संवेदनशीलता और प्यारा सा दिल था जो उसने शुक्रिया कहने के लिए मेरी मदद करनी चाही! उसका ये प्यारा सा अंदाज़ मेरे दिल में बस गया! शायद अगली बार किसी को शुक्रिया कहने से पहले इस बच्चे को मैं याद करुँगी जिसने मुझे बहुत प्यारा ढंग सिखा दिया कृतज्ञता जाहिर करने का! उस छुटके को मेरा सलाम जो मुझे एक यादगार सुहानी सुबह दे गया! ! भगवन उसे हमेशा इतना ही नेक बनाये रखे और संघर्ष की आँधियों में बिखरने से बचाए!

पर बात यहीं ख़त्म नहीं होती है! मैंने अपने एक दोस्त को सुबह का सारा वाकया बताया! उसने गौर से सुना और बोला " मैं होता तो थोड़ी दूर उसकी साइकल पर बैठकर ज़रूर जाता!" उसकी इस बात ने एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया! सही तो है...मैंने क्यों नहीं सोचा ये! अगर मैं अगले चौराहे तक उसकी साइकल पर बैठकर चली जाती तो वो बच्चा कितना खुश हो जाता! उसने मुझे कितना खुश किया बदले में मैं भी उसे उतना ही खुश कर सकती थी! ख़ुशी के बदले सिर्फ ख़ुशी ही तो दी जा सकती है ! है ना?....खैर अगली बार से याद रखूंगी!

Wednesday, September 30, 2009

वो जो बिछडे हैं कब मिले हैं फ़राज़ ......


फिर किसी राहगुज़र पर शायद...
वो कभी मिल सकें मगर शायद.........


आज ये ग़ज़ल मुझे न जाने किस दुनिया में ले गयी! सारे वो चेहरे जिनके साथ कभी न कभी जिंदगी के बहुत खूबसूरत पल बिताये हैं, अचानक से जेहन में कौंध गए! जिन दोस्तों के बिना शायद ये जिंदगी ऐसी न होती जैसी आज है! आज भी जब दोस्ती की बात चलती है तो ये सब बहुत याद आते हैं मगर आज इस दुनिया की भीड़ में न जाने कहाँ गुम हो चुके हैं! न कोई पता...न ठिकाना! न ये पता की आज ये क्या कर रहे हैं!लेकिन यादों में उसी तरह ताज़ा हैं जैसे बरसों पहले थे! माधवी, ऋचा, जीतू ,मंजूषा ....आज तुम सब बहुत याद आ रहे हो! कहाँ हो यार तुम सब? वापस आ जाओ तो शायद फिर से लाइफ रिवाइंड हो जाए!

माधवी....तुम मेरी पहली पक्की सहेली थी! मुरैना के स्कूल में हमने एक साथ पहली क्लास में एडमिशन लिया था! तुम मेरी पहली दोस्त बनी थीं! आज तुमसे अलग हुए शायद पच्चीस साल हो गए ....अब शायद सामने भी आ जोगी तो नहीं पहचान पाऊँगी! मुझे अभी तक तुम्हारा चौथी कक्षा वाला चेहरा याद है! और तुम्हारे चिडिया के घोंसले जैसे घने घने बाल...हम सब तुम्हे चिढाया करते थे लेकिन दरअसल तुम्हारे बाल हम सबसे अच्छे थे ...! आज भी जब कभी मुरैना जाना होता है तो तुम्हारी दुकान " कुमार रेडियोज़" को ढूंढती हूँ जहां ये पहले हुआ करती थी! पर शायद इतने सालों में तुम्हारी दुकान भी बदल गयी होगी! कभी सोचती हूँ की अचानक कभी तुम अपनी दूकान के बाहर दो बच्चों के साथ खड़ी नज़र आ जोगी....हो सकता है तुम्हारी बेटी आज बिलकुल वैसी ही हो जैसी तुम क्लास फोर्थ में थीं!

और ऋचा तुम कहाँ चली गयीं यार? तुम मंडला में अपने बारहवी क्लास के ग्रुप की सबसे क्यूट लड़की और मेरी बहुत प्यारी दोस्त! तुम्हे याद है हब सब फ्रेंड्स अक्सर एक साथ होते थे तो कहते थे कि आज से पंद्रह साल बाद हम सब एक बार फिर इकट्ठे होंगे! लेकिन ये सब प्लान जो मासूमियत और बेफिक्री के आलम में बनते हैं....दुनियादारी में उलझकर हमें याद भी नहीं रहते! और लोगों का तो फिर भी मुझे पता है कि वो लोग कहाँ है मगर तुम्हारे बारे में कुछ पता नहीं है! तुम पढाई में बहुत तेज़ थीं , हो सकता है आज तुम किसी बहुत अच्छी जगह पर होगी! तुम्हारे साथ की गयी सारी शरारतों को आज भी मैं मुस्कराहट के साथ याद करती हूँ! आ जाओ यार...एक बार फिर से वो सारी शरारतें दोहराने का मन कर रहा है!

और जीतू....तुम तो ऐसे गायब हो गए यार कि ढूंढ ढूंढ कर हम थक गए तुम्हे! तुम मुझे उस वक्त मिले जब पढाई ख़त्म करके हम लोग कैरियर की चिंता में डूबे हुए थे! कम्पयूटर क्लास में हुई हमारी पहचान कितनी अच्छी दोस्ती में बदल गयी थी! मैं तो जल्द ही कम्पयूटर से ऊब गयी थी लेकिन तुम उसी में आगे बढ़ना चाहते थे!मैंने पी.एस.सी. की तैयारी की और तुम्हारे ख्वाब अपना काम शुरू करने का था! शाजापुर में बिताये हुए चार साल तुम्हारे ज़िक्र के बिना पूरे नहीं होंगे! दिन भर की थकान के बाद शाम को तुम्हारे साथ बैठ के हँसना बहुत सुकून भरा लगता था! मैं और गड्डू जब भी एक साथ होते हैं...तुझे ज़रूर याद करते हैं! मेरा नंबर तो वही है यार....कभी कॉन्टेक्ट करने की कोशिश क्यों नहीं करते! अगर कंट्रोल रूम से भी मांगोगे तो मेरा नंबर मिल जाएगा! अचानक तुम्हारा इस तरह गायब होना हमें नहीं भय! बस अब जल्दी से वापस आ जाओ....

तुम सब दोस्तों को मैंने कितना ढूँढा.....ऑरकुट पर तलाशा इस उम्मीद के साथ की यहाँ तो तुम हंड्रेड परसेंट मिल ही जाओगे! मगर कितने आउट डेटेड हो यार! यहाँ भी नहीं हो! अब ब्लॉग तो क्या ही पढ़ते होगे तुम लोग! पर मैं भी उम्मीद कहाँ छोड़ने वाली हूँ! पता है...जब कभी रेलवे स्टेशन पर जाती हूँ चैकिंग करने तो आँखें भीड़ में इधर उधर कुछ खोजती रहती हैं! शायद कभी अचानक तुममे से कोई मिल जाए....और " अरे तू..." कहते हुए हम गले लग जाएँ!

वो जो बिछडे हैं कब मिले हैं फ़राज़ ......
फिर भी तू इंतज़ार कर शायद.....

Tuesday, August 25, 2009

हाज़िर हूँ......ब्रेक के बाद

तीन महीने का अच्छा खासा ब्रेक हो गया ब्लोगिंग से! मुझे याद आता है वो दिन जब डेढ़ साल पहले ब्लॉग लिखना शुरू किया था...एकदिन में दो दो पोस्ट लिख लेती थी! भले ही पोस्ट तीन दिन बाद करती थी! दिमाग में तूफ़ान मेल की तरह विचार आते थे! मुझे लगता था...ये एक ऐसी चीज़ मिल गयी जिससे मैं कभी बोर नहीं हो सकती! हांलाकि मेरी बहन ने मुझे कहा था की तू कुछ दिनों में इससे भी बोर हो जायेगी! तब मैंने बड़े विश्वास से कहा था की नहीं लिखना तो मेरे पसंद का काम है....इससे बोर होने का सवाल ही नहीं उठता! उसने कंधे उचकाये थे और वहाँ से चली गयी थी! लगभग एक साल तक लिखने का जोश पहले दिन जैसा ही बना रहा! फिर विचारों की गति भी मंद पड़ी और लिखने का अन्तराल भी बढ़ गया! मैंने सोचा....व्यस्तता के कारण इतना लिखना नहीं हो पा रहा है! मैंने अपनी लास्ट पोस्ट मई के किसी दिन लिखी थी! उसके बाद कुछ नहीं लिख सकी!खुद भी यही समझती रही और दूसरों को भी यही बताती रही की आजकल बहुत व्यस्त चल रही हूँ इसलिए नहीं लिख पा रही हूँ.....फिर एक दिन मैंने महसूस किया की दो दिन की छुट्टी पूरी निकल गयी और मेरे मन में ब्लॉग खोलने का विचार तक नहीं आया!


ऐसा क्यों हुआ...पता नहीं! उसके बाद व्यस्तता कम हुई...फिर भी कुछ लिखने का मन ही नहीं हुआ! और विचारों ने तो शायद अब दिमाग का रास्ता ही भुला दिया है! शायद मैं बोर हो चुकी थी! पिछले एक हफ्ते से मन बना रही हूँ लिखने का...तब जाकर आज लिख रही हूँ!


कई लोगों को नियमित ब्लॉग लिखते देखती हूँ तो अब बड़ा सुखद आश्चर्य होता है! भगवान ने ऐसा जूनून मुझे क्यों नहीं दिया! किसी भी चीज़ से जल्दी उकता जाती हूँ मैं...मन हमेशा कुछ नया करना चाहता है! शायद इसीलिए मैं किसी चीज़ में परफेक्ट नहीं बन पायी! बहुत कुछ सीखा ...पर सब थोडा थोडा! उसके बाद फिर एक नयी चीज़ की तलाश! मेरी एक दोस्त कहती है....खुदा का शुक्र है की तू रिश्तों से बोर नहीं होती वरना मेरा तो पत्ता कट चूका होता! सचमुच इश्वर का शुक्र है आज भी सेवेन्थ क्लास की सहेली मेरी उतनी ही पक्की सहेली है....हाँ अब संख्या में इजाफा हो चूका है!
आज फिर से लिखने की इच्छा वैसे ही जोर पकड़ रही है...जैसे डेढ़ साल पहले पकड़ती थी! सोचती हूँ ब्रेक लेना एक अच्छा तरीका है मेरे जैसे लोगों के लिए! जिससे बोर हो गए हो, उसे हमेशा के लिए बाय बाय कह देने से अच्छा है कुछ दिनों के लिए उससे दूर हो जाना! एक अन्तराल के बाद दोबारा शुरू करना भी नयापन ला देता है! मेरी एक कुलीग ने मुझे बताया था की उसके अपने पति से झगडे बढ़ने लगे थे! दोनों को एक दूसरे का चेहरा देखकर खीज आती थी! उकताकर उसने अपना ट्रांसफर किसी दूसरी जगह करवा लिया ! अब दोनों हफ्ते में एक बार मिल पाते थे! एक साल बाद उसी कुलीग ने सारा जोर लगाकर अपना ट्रांसफर वापस पति के शहर में करा लिया! अब दोनों बहुत खुश थे! तो ब्रेक ने यहाँ भी अपना काम बखूबी किया! खैर मैं भी हाज़िर हूँ ब्रेक के बाद....अगले ब्रेक तक के लिए!


चलते चलते एक बात और....बचपन से बड़ा शौक था की एक सुन्दर सी साइकल होती मेरे पास....पर महंगी होने के कारण हमेशा कम सुन्दर साइकल से काम चलाना पड़ा! पुराना शौक फिर से जगा और हमने लेडी बर्ड खरीद ली...आगे बास्केट वाली! आजकल सुबह सुबह गाना सुनते हुए चलाना बड़ा अच्छा लगरहा है! इसीलिए साइकल की ही फोटो डाल दी! आप भी देखो हमारी सुन्दर साइकल...

Tuesday, April 14, 2009

जिंदगी बेहद खूबसूरत है,चलिए इसे पहले से भी ज्यादा प्यार करें.....


"life is so beautiful that death has fallen in love with it।" कल ही एक नॉवेल पढ़ते वक्त ये पंक्तियाँ देखी! कितना सच है, जिंदगी की सुन्दरता की इससे सुन्दर व्याख्या मैंने नहीं पढ़ी थी! मेरे कई दोस्तों से कई बार जिंदगी की फिलॉसफी पर चर्चा होती है...कितनी अजीब बात है वही जिंदगी बहुत खूबसूरत लगती है जब हमारे साथ सब कुछ अच्छा अच्छा हो रहा होता है, हमारा दिल खुशियों से भरा होता है ! वही दोस्त जो अपने अच्छे वक्त में जिंदगी के एक एक पल का आनंद उठाना चाहता है ! कुछ महीनों बाद जब दुर्भाग्य वश अच्छे वक्त का चक्र ख़त्म होता है और जिंदगी अपना दूसरा चेहरा दिखाती है तब वही दोस्त जिंदगी को एक अभिशाप से ज्यादा कुछ नहीं मानता! परिवर्तन जिंदगी का नियम है या अच्छा और बुरा वक्त दोनों ही स्थायी नहीं हैं....ऐसी बातें चर्चा के दौरान करने वाला दोस्त सब भूल जाता है जब खुद कठिनाइयों से जूझ रहा होता है! और शायद हममे से ज्यादातर लोग इसी तरह की जिंदगी जीते हैं! अच्छे फेज़ को उत्साह के साथ जीते हैं तब हम क्यों याद नहीं रखते की ये फेज़ अस्थायी है और इसके बाद दूसरा फेज़ भी आएगा जो हमारी अंदरूनी शक्ति की असली परीक्षा होगी! कितने हैरत की बात है न की आर्थिक, शारीरिक और मानसिक परेशानियां हमें इतना हताश कर देती हैं की हमारे अन्दर से जीने की इच्छा ही ख़तम हो जाती है! मेरे खुद के अनुभव हैं की मानसिक अवसाद के दौर में गुस्सा, आंसू, चिडचिडापन आप पर हावी हो जाते हैं और लगता है की अब ये दौर शायद कभी ख़त्म न होगा...एक लम्बी अँधेरी सुरंग की तरह! पहले पढ़ी हुई सारी सकारात्मक बातें जैसे हवा हो जाती हैं! मुझे अच्छी तरह याद है कि जब मेरी कोई दोस्त परेशान होती थी तो मैं उसे इतनी सारी सकारात्मक बातें, जिंदगी को सुन्दर बनाने के तरीके और डिप्रेशन को दूर रखने के तरीके बताया करती थी जो कि मैंने किताबों में पढ़े हुए थे! शायद तब तक मैंने डिप्रेशन को जाना नहीं था! जिस दिन वो फेज़ मेरी जिंदगी में आया तब वो सारी बातें मैंने खुद से भी कही लेकिन खुद को बहुत लाचार पाया! और अगर किसी और ने मुझे समझाने कि कोशिश की तो लगा की ये सब तो मुझे पता है॥ये मुझे क्या बता रहा है!

पहले मुझे समझ नहीं आता था की बचपन से ही अगर मैं दोपहर में सो जाऊं और शाम को अँधेरा होने के बाद उठूँ तो क्यों एक अनजानी सी उदासी मुझे घेर लेती थी! हांलाकि ये दौर बहुत छोटा होता था...शायद दो घंटे या इससे कुछ ज्यादा का! आज भी ये होता है इसलिए जब भी मैं दिन में सोती हूँ तो इस अवसाद से बचने के लिए अलार्म लगा लेती हूँ ताकि अँधेरा होने से पहले उठ जाऊं! अगर कभी गलती से सोती रह गयी तो अब तक मैं जान चुकी हूँ की क्या करना है! तुंरत तैयार होकर मार्केट का एक राउंड लगा लेती हूँ! वहा आइसक्रीम का कोन हाथ में पकडे हुए लखनवी चिकन के कुरते या जंक ज्यूलरी की दुकाने देखते हुए याद भी नहीं रहता की थोडी देर पहले उदासी ने मुझे जकड रखा था! लेकिन मैंने एक बात विशेष तौर पर नोटिस की कि अवसाद चाहे कितनी भी कम देर का क्यों न हो...आपकी सोच को बदल कर रख देता है! आम तौर पर जिंदगी को पूरी तरह एन्जॉय करने वाली मैं अवसाद के उस दौर में कोई और ही बन जाती हूँ मानो मेरे अन्दर मुझसे छुपकर कोई और इंसान भी रहता है! जो समय समय पर अपनी उपस्थिति का एहसास दिला जाता है! निराशा के उस दौर में वे सारे लोग जो मुझे छोड़कर इस दुनिया से चले गए हैं....बहुत जोर से याद आने लगते हैं! एक अनजाना सा भय सताने लगता है कि कहीं अपना कोई कहीं चला न जाए! जीवन के मायने नए सिरे से तलाश करने लगती हूँ! शायद ये भी खुद को जानने समझने का एक मौका होता है! जब कई बार ऐसा मेरे साथ हुआ तो मैंने अवसाद के बारे में बहुत बहुत पढ़ा! तब जाना कि मौसम का हमारे मूड से कोई न कोई रिश्ता ज़रूर है! फरवरी महीने में विश्व में सबसे ज्यादा आत्म हत्याएं क्यों होती हैं? क्यों काले बादल से भरा दिन उदास कर देता है? यहाँ तक कि आज भी मार्च अप्रैल के महीने में रात को जब हवा चलती है तो दिल जोर जोर से धड़कने लगता है....यही वो हवा और मौसम था जिसमे हमने सालों साल परीक्षाएं दी हैं! सुबह पेपर देने जाने का भय आज तक हौवा बनकर डरा देता है!

इन सब प्रश्नों के उत्तर तो मेरे पास नहीं हैं! लेकिन ये महसूस किया है कि सूरज कि किरणों में कुछ जादू है जो उत्साह जगाता है! मई की चिलचिलाती धूप में आप बार बार पसीना पोंछते हुए , सूखे गला लिए अपने काम पर जाते हैं....कितनी भी खीज क्यों न आये मगर निराशा पास नहीं फटकती है! औरों के अपने अलग अनुभव हो सकते हैं मगर मुझे तो हमेशा यही महसूस हुआ है! अपने अनुभवों से मैंने जाना है की जब भी मन उदास हो तो खाली और चुपचाप नहीं बैठना चाहिए! खुद को व्यस्त रखना उदासी भगाने का सबसे अच्छा तरीका है! एक बार की बात है ॥ऐसे ही खिन्न मन से मैं घर में चुपचाप बैठी हुई थी! लग रहा था ....जिंदगी निरर्थक है और शायद अब ख़ुशी वापस नहीं आएगी! उसी वक्त कंट्रोल रूम से फोन आया की मेरी ड्यूटी कॉन्स्टेबल भरती में लगी है और तुंरत मुझे ग्राउंड पहुंचना है! झटपट तैयार होकर मैं पहुंची और लगातार दस घंटे परीक्षार्थियों की हाईट , चेस्ट नपवाते नपवाते कब अँधेरा हो गया कुछ पता न चला! इस दौरान एक सेकंड की फुर्सत नहीं थी! जब घर पहुंची तो थक कर चूर हो चुकी थी! और सुबह की निराशा का अंश मात्र भी शेष नहीं था! और मैंने खुद को हमेशा की तरह खुश और उत्साह से भरा हुआ पाया!

शायद बहुत कुछ अव्यवस्थित सा लिखे जा रही हूँ मैं...पर कभी कभी बिना सोचे जो दिल में आये बस लिखते जाना अच्छा लगता है! मुझे भी सुकून भरा लग रहा है ...आज मैं फिर से दिन में सोयी और दिन ढलने पर उठी! आज न लिखती तो कल शायद न लिख पाती! कुल मिलाकर अब जो महसूस कर रही हूँ वो ये की बहुत कुछ खराब घटने के बाद भी जिंदगी बेहद खूबसूरत है! हमारे और मौत के बीच में लगातार एक कॉम्पटीशन है की कौन इसे ज्यादा प्यार करता है! अगर हमारे प्यार में ज़रा भी कमी हुई तो वो इसे हमसे छीनकर ले जायेगी! तो चलिए इसे पहले से भी ज्यादा प्यार करें.....

Sunday, February 22, 2009

बेवफाई जुर्म क्यों नहीं ?


" क्या दिल टूटने से चोट नहीं लगती? क्या किसी की भावनाओं के साथ खेलने की कानून में कोई सजा नहीं है? क्या दिल पर लगी खरोंच शरीर पर आई खरोंच से कम दुःख देती है?" उसकी आंसुओं
से भीगे प्रश्न लगातार मेरे जेहन पर हथौडे की तरह पड़ रहे हैं! वो आज आई थी मेरे ऑफिस में.....दुखी, परेशान....बात बात पर आंसू छलक उठते थे! भर्राए गले से वो बोलती जा रही थी!मैं चुपचाप सुनती जा रही थी! उसे धोखा मिला था! तीन साल तक साथ जीने मरने की कसमे खाने वाले उसके बॉय फ्रेंड ने अचानक कहीं और सगाई कर ली थी! किसी तीसरे से उसे उसकी सगाई के बारे में पता चला ....और पूछने पर बॉय फ्रेंड का जवाब था- " बी प्रैक्टिकल यार...ये सब तो चलता है!अब मेरे मन में तुम्हारे लिए पहले जैसी फीलिंग नहीं हैं...हम बस अच्छे दोस्त हैं!" इतना कहकर लापरवाही से सर झटक कर वो चल दिया अपने रास्ते!शायद इसके बाद लड़की का फोन उठाने की ज़हमत भी नहीं की उसने!और लड़की उसी दिन से डिप्रेशन में है.....कभी वो पुरानी बातें याद करती है...कभी जानने की कोशिश करती है की आखिर उसके प्यार में कहाँ कमी रह गयी...कभी किसी तांत्रिक के पास जाती है की शायद कोई वशीकरण मन्त्र हो जो उसे प्यार को वापस उसकी और ला सके! पिछले दो महीने में पांच किलो वज़न कम कर चुकी है अपना! रात को नींद की गोली खाए बिना सो नहीं पा रही है!और आंसुओं का तो कोई हिसाब ही नहीं है! ये सब मुझे उसके साथ आई उसकी मां ने बताया!

सलाह देना कितना आसान होता है....मैंने उसे समझाने की बहुत कोशिश की! जो जो भी बातें उसे जिंदगी की राह पर आगे बढ़ने के लिए मैं कह सकती थी..मैं कह रही थी! वो हाँ में सर हिलती....फिर कुछ ही पल में उसकी सिसकियों के साथ मेरे सारे उपदेश बह जाते! अचानक हिचकी भरी आवाज़ से उसने मुझसे पूछा " अगर कोई किसी को डंडे से मारे तो क्या अपराध बनेगा?" मैंने हाँ में सर हिलाया! उसका अगला प्रश्न था " डंडे की चोट कितने दिन में ठीक हो जायेगी?" मैंने कहा ...कुछ दिनों में!
उसने अपनी सूजी हुई आँखों से मेरी तरफ देखा और बोली " क्या मेरे दिल पर जो चोट लगी है...उससे ज्यादा चोट डंडे से मारने से लगती है? डंडे का घाव तो कुछ दिन में भर जायेगा...मेरे दिल पर लगे ज़ख्म जो पता नहीं कब भरेंगे...उसका कुछ भी नहीं? " क्या जो मेरे साथ हुआ वो शारीरिक प्रताड़ना से कम कष्टदायी है? फिर किसी का दिल तोड़ना अपराध की श्रेणी में क्यों नहीं आता?" मैंने उससे कहा ...अगर उस लड़के ने तुम्हारे साथ कोई ज्यादती की है या तुम्हारा शारीरिक शोषण किया है तो ये अपराध है! लड़की बीच में मुझे टोकती हुई बोली...." यानी की अपराध तभी होगा जब शरीर को चोट पहुंचे...वैसे उसने मेरे साथ कोई ज्यादती नहीं की है" इस बार उसकी आवाज़ में शिकायत और तल्खी दोनों ही थे!

थोडी देर सब खामोश रहे....फिर वो उठी और बोली " अब मैं चलती हूँ!" मैंने धीरे से सर हिला दिया! जाते जाते वो पलटी और बोली " शायद मैं धीरे धीरे इस स्थिति से उबर जाऊं पर अब किसी पर विश्वास नहीं कर पाउंगी....और शायद शादी भी न करून! काश आपके कानून में बेवफाई भी जुर्म होती ! "

मैं फिर अपने कमरे में अकेली बैठी थी....कागजों पर साइन भी करती जा रही थी पर उसका आंसू भरा चेहरा न तो हटता था आँखों के सामने से और न ही उसकी सिसकियों की आवाज़ कानो से अब तक अलग हो पायी है! सोचती हूँ वाकई उसके प्रश्न कितने जायज़ हैं! बेवफाई न तो कोई जुर्म है और न ही उसकी कोई सजा!

Sunday, February 1, 2009

राजस्थान यात्रा- एक शरारत भरी शुरुआत

१५ तारीख से राजस्थान यात्रा पर निकली हुई थी! !यात्रा ख़त्म हुई पर खुमार अभी तक छाया हुआ है....शायद अभी कुछ दिन और रहेगा!जाने कितनी बार फोटो देख चुकी हूँ!मम्मी ,दोनों छोटी बहने गड्डू और मिन्नी, साथ में गड्डू की दोस्त अस्मिता और उसकी मम्मी हम छै लोगों का गैंग निकल पड़ा था राजस्थान घूमने! हमारे डेस्टिनेशन थे जोधपुर,जैसलमेर,माउन्ट आबू और उदयपुर ! यात्रा इतनी मजेदार और रोचक थी की लिखे बिना रह ही नहीं सकती! खासकर यात्रा की शुरुआत ही बड़ी जबरदस्त थी! हम लोग भोपाल से जोधपुर ट्रेन से गए !उसके बाद से हर जगह बाय रोड जाना था!ट्रेन में बैठते ही मम्मियों समेत हम सब मौज मस्ती के मूड में आ गए!बैठते ही जो ठहाके लगने शुरू हुए डब्बे में हर कोई एक एक बार हमें देखकर गया!और कोई मौका होता तो शायद हम असहज महसूस करते मगर यहाँ तो किसी की कोई परवाह नहीं थी!हमारे साथ जयपुर के एक अंकल आंटी बैठे थे!उन्होंने कहा की आप लोगों के आने से अच्छा लगा वरना कब से बैठे बैठे बोर हो रहे थे!तब हमने गौर किया की वाकई अगर हम लोग दो मिनिट को भी चुप हो जाएँ तो डब्बे में ऐसी घोर शान्ति थी मानो कोई अपहरण करके ले जा रहा हो!खैर उनकी इस बात से हमारी मस्ती को और बल प्राप्त हुआ!मगर हर किसी को कहाँ किसी की ख़ुशी सहन होती है!हमारे अगले केबिन में बैठे एक सज्जन को हमारे ठहाकों से तकलीफ थे! वे अचानक हमारी तरफ मुडे और बोले " अगर आपकी आज्ञा हो तो हम सो जाएँ?" छोटी बहन ने तपाक से उत्तर दिया " अवश्य सो जाइए" ! उस वक्त रात के मात्र नौ बजे थे! हम सब का दिमाग खराब...ये आदमी अभी से ही हम पर पाबंदी लगा रहा है!हमारे सपोर्ट में सामने बैठी जयपुर वाली आंटी आई और बोलीं " हम तो ग्यारह बजे खाना खाते हैं उसके बाद ही सोयेंगे!" हम खुश...जागने की एक वजह मिल गयी थी! जैसे तैसे वो सज्जन शांत हुए इतने में अगली साइड लोअर बर्थ पर लेटी एक आंटी बिफर गयीं " अब सब लोग बत्ती बंद करो और सो जाओ, मुझे सोना है!" अस्मिता बोली.." आप सो जाओ, हम लोग अभी से नहीं सोयेंगे!" आंटी ने इतनी भयंकर नफरत से हमें देखा की एक पल को तो हम सब सहम कर चुप हो गए!इतने में किसी के मोबाइल पर गाना बजा " अल्ला के बन्दे हंस दे.." इतने सुनना था की सब के सब फुल वोल्यूम में हंस दिए!आंटी क्रोध से उठ बैठीं!हमने इग्नोर मार दिया!इस यात्रा में हमने तीन चीज़ें नयी ईजाद की...इग्नोर मारना,अवोइड मारना और नेगलेक्ट मारना!सभी में चेहरे के एक्सप्रेशन अलग होते हैं!

खैर थोडी देर और हमने बातें कीं लेकिन आंटी जी की फटकार से थोडा डरे डरे भी थे! अब बातचीत खुसुर फुसुर में हो रही थी! आंटी जी ने अपनी बत्ती बुझाई और सो गयीं! हम दबे दबे हँसते रहे! इतने में धडाम की आवाज़ आई....ये क्या? देखा तो आंटी जी ने करवट बदली थी और नीचे गिर गयीं थीं!अब देखिये...हम बेचारों पर एक जुल्म और ढाया गया! खराबी करवट लेने की तकनीक में थी लेकिन इसका दोष आंटी ने हमारी बातों पर मढ़ दिया!" तुम लोगों की वजह से मैं गिर गयी...मार ही डालोगे क्या?" हम समझ ही न पाए की किसी की दबी दबी बातों की आवाज़ से कोई कैसे गिर सकता है! अंत में बहुत विचार विमर्श के बाद हमने खुद को क्लीन चिट दी की बातों से कोई नहीं गिरता है इसलिए फालतू का गिल्ट लादने की कोई ज़रुरत नहीं है! पर आंटी के गिरने के बाद हम सब खामोश हो गए और सो गए!

सुबह उठे तो जयपुर निकल चुका था!और अच्छी खासी ट्रेन पैसेंजर का रूप धारण कर चुकी थी!जयपुर से जोधपुर तक का सफ़र बार बार रुकते रुकाते करीब ७ घंटे में तय किया जबकि ४ घंटे में आराम से पहुंचा जा सकता है! जयपुर के बाद महसूस होने लगा था की अब राजस्थान में आ गए हैं!कोई खेत नहीं...कोई बड़े पेड़ नहीं!दूर दूर तक उजाड़ मैदान और कंटीले पौधे!पता चला की राजस्थान में लोग इतने कलरफुल कपडे इसलिए पहनते हैं ताकि हरियाली और वनस्पति न होने कि नीरसता से बचा जा सके! खैर दस बजे आंटी जी भी उठ गयीं...बाकी का सारा टाइम उन्होंने अपने झोले में लाये गए खाद्य पदार्थों का सेवन करने में खर्च किया! जोधपुर आते आते डब्बे में केवल ३-४ पैसेंजर ही रह गए थे!सो खाली डब्बे का फायदा उठाकर लगे हाथों ट्रेन में एक फोटो सेशन भी कर लिया!फोटो अपलोड करने में कुछ समस्या आरही है वरना ट्रेन का नज़ारा यहाँ ज़रूर दिखाती! दोपहर डेढ़ बजे हम लोग जोधपुर पहुँच गए!

इस बार ट्रेन यात्रा का विवरण....नेक्स्ट पोस्ट में आगे कि यात्रा के हाल लिखूंगी! जब तक आप हमसे या आंटी जी कि व्यथा से खुद को रिलेट कर सकते हैं!कई लोगों ने ऐसी यात्रा की होगी जो या तो हमारी तरह डांट खाए होंगे या आंटी की तरह दूसरों की मस्ती से परेशान हुए होंगे!अगली पोस्ट तक के लिए विदा....

Monday, January 5, 2009

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें.....


मैं न्यू मार्केट जाती हूँ..गाडी से उतरने लगती हूँ इतने में मेरा मोबाइल बजता है! मैं नहीं उठाती, दो बार पूरी रिंग बज जाती है! तीसरी बार मैं उठाकर बात करती हूँ....अभी तक पार्किंग में ही खड़ी हूँ!बात करने के बाद आगे बढ़ने लगती हूँ इतने में देखती हूँ की एक छोटा बच्चा चेहरे पर मुस्कराहट लिए मेरी ओर देख रहा है! शायद यहीं कुछ काम करता होगा....उसके मैले फटे कपडे देखकर मैं अंदाजा लगाती हूँ! मैं आँखें उचका कर पूछती हूँ " क्या चाहिए? आइसक्रीम खायेगा?" बच्चा थोडा बेतकल्लुफ होकर झिझकते हुए कहता है " एक बार मोबाइल में गाना सुनाओगी?" " कौन सा गाना?" बच्चा करीब आकर कहता है " अभी जो बज रहा था, पल पल पल हर पल, मुझे बहुत पसंद है!" ओह ये मेरे मोबाइल की रिंग टोन के बारे में बात कर रहा है! मैं दो बार उसे गाना सुनाती हूँ.....वो बहुत खुश है! गाना सुनकर मुझे बाय
करके वो निकल जाता है!

मैं मार्केट में खरीदारी करते हुए भी सोच रही हूँ कि ख़ुशी बड़ी बड़ी चीज़ों कि मोहताज नहीं! एक गाना सुनकर वो बच्चा इतना खुश हो गया! शायद जिंदगी से हमें बहुत ज्यादा नहीं चाहिए होता है...वो तो हर कदम पर हमें गले लगाना चाहती है! हम ही उससे संतुष्ट नहीं होते जो वो हमें देती है!

दूसरी बात जो साथ साथ साथ मेरे दिमाग में चल रही है वो ये कि जिंदगी खुशियाँ बांटने का दूसरा नाम है! दूसरों को थोडी सी ख़ुशी देकर हम उस पर कोई एहसान नहीं करते बल्कि अपने दिल को सुकून से भरते हैं! किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना खुदा की बंदगी का सबसे पाकीजा रूप है! और जहां तक हो सके ये मौका हमें कभी नहीं छोड़ना चाहिए!

अभी कुछ दिन पहले ही मैं पुलिस कर्मचारियों को स्ट्रेस मैनेजमेंट पढ़ा रही थी! मैंने उनसे पूछा की वे बताएं की उन्होंने कोई नेक काम पिछली बार कब किया था? १० मिनिट तक सोचने के बाद केवल दो हाथ उठे जिनमे से एक ने पच्चीस साल पहले भोपाल गैस काण्ड के वक्त किसी बूढे आदमी की मदद की थी और दुसरे ने सन २००० में एक विधायक की जान बचाई थी!
कितने हैरत की बात है न हमें कोई अच्छा काम किये हुए इतना वक्त बीत जाता है की हमें याद ही नहीं आता!

और दर असल हम सोचकर कोई अच्छा काम नहीं करते वो तो बस हमसे हो जाता है! मैंने शायद ही कभी किसी सुबह उठकर अपनी टू-डू लिस्ट में कोई नेक काम करना शामिल किया होगा! कई बार देखती हूँ बड़े बड़े अधिकारियों के छोटे छोटे बच्चे अपने से दोगुनी तिगुनी उम्र के अर्दलियों और ड्रायवरों को उनके नाम से बुलाते हैं....कितने कचोटता होगा उन्हें? उनके पढ़े लिखे माँ बाप जो सामाजिक कामों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं और अखबारों में शान से फोटो छपवाते हैं, क्यों कभी नहीं सोचते कि उनके बच्चे अगर उनके मातहत कर्मचारियों को अगर भैया, दादा कहकर पुकारेंगे तो अपने पढ़े लिखे होने का ही सबूत देंगे और सबसे बड़ी बात किसी के आत्म सम्मान को बरकरार भी रखेंगे! बिना एक भी पैसा खर्च किये सिर्फ अपने व्यवहार से भी किसी को ख़ुशी दी जा सकती है!
जो माँ बाप दुनिया के भूगोल, इतिहास, विज्ञान के बारे में बच्चों को बड़ी बड़ी बातें सिखाना चाहते हैं...वे इंसानियत का पाठ पढाना क्यों भूल जाते हैं! कई बार लगता है जैसे अमीरी के साइड इफेक्ट के रूप में गुरूर और अहम् अपने आप चला आता है!

हर साल नए साल पर सोचती थी ...इस साल कुछ नया करुँगी, कोई नयी जगह देखूंगी या कोई अच्छी आदत डालूंगी पर इस साल सोचा है अगर पिछले साल की तुलना में जरा सा भी बेहतर इंसान बन पायी तो खुद को खुश किस्मत समझूंगी! निदा फाजली की ये लाइनें लगातार जेहन में चल रही है...
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए
बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं, किसी तितली को न फूलों से उडाया जाए.....

Wednesday, October 15, 2008

जिंदगी के सिक्के का खोटा पहलू


आज ऑफिस में बैठे बैठे दरवाजे के बाहर नज़र पड़ी...एक बच्चा काफी देर से एक सिपाही के साथ खडा था! उत्सुकता वश अन्दर बुलाया...पता चला बच्चे पर चोरी का इल्जाम है और बाल अपराध शाखा में पूछताछ के लिए लाया गया है! एक दुबला पतला,सांवला सा करीब १२-१३ साल का लड़का आकर सामने खडा हुआ!

"क्या नाम है तुम्हारा?" मैंने उससे पूछा!
"आशीष" नीचे सर झुकाए उसने जवाब दिया!
कितने साल के हो?
१४ साल का
कहाँ तक पढ़े हो"
छठवी क्लास तक....
इतने में उसकी माँ भी पीछे पीछे आ गयी....
पढाई क्यों छोड़ दी?" मैंने आगे पूछा!
" पैसे कमाना था....इसलिए स्टेशन पर पोपकोर्न बेचने लगा!

" साहब...क्या करें? मेरा पति मर गया है...चार बच्चे हैं!सब नहीं कमाएंगे तो कैसे चलेगा? बच्चे की माँ बीच में बोली!
ये बताओ...चोरी करना कैसे सीखा? कब से कर रहे हो? कितनी बार पकडे गए हो?" मैंने इकट्ठे कई सवाल एक साथ किये!
" राधेश्याम ने जेब काटना सिखाया ....दो साल से चोरी कर रहा हूँ...दो बार सुधार गृह रह चुका हूँ!" नीची निगाह से आशीष ने बिना किसी लाग लपेट के बताया!
" सुधार गृह में रहने के बाद भी फिर से चोरी करते पकडे गए....क्या सीखा तुमने वहाँ? क्या फायदा हुआ वहाँ रखने का?" मैंने खीजकर पूछा!
" साब.. झाडू लगाना , बर्तन धोना, खाना बनाना और......इतना कहकर वह चुप हो गया और वापस नीचे देखने लगा!
" और क्या.....बोलो"
" और...ब्लेड नाखून में फंसाकर जेब काटना, ट्रेन की खिड़की से पर्स छीनकर भागना...." उसका सर अभी भी नीचे था !


मैंने ध्यान से उसे देखा....इतना मासूम चेहरा की अगर वह झूठ ही कह देता कि उसे पुलिस ने गलत पकडा है तो शायद उसकी बात पर मैं तुंरत विश्वास कर लेती ! उस बच्चे की कितनी गलती है जिसने शिक्षा के नाम पर जैसे तैसे छठवी क्लास पास की है...जिसकी माँ का कहना है कि पढ़ लिख कर क्या करेगा, जिसके दोस्त राधेश्याम जैसे चोर उचक्के हैं और जिसको पैसा कैसे कमाना चाहिए ये बताने वाला कोई नहीं है! और जिस सुधार गृह में उसे भेजा जाता है...वहाँ से वह चोरी करने के नए तरीके सीख कर आता है! सुधार गृह तो इन उभरते बाल अपराधियों के लिए ट्रेनिंग सेंटर का काम कर रहे हैं जहां उससे ज्यादा उम्र के बच्चे उसे पेशेवर बनने का हुनर सिखा रहे हैं....

मैं बच्चे को मेहनत करने और पढाई करने के लिए समझाती हूँ...बच्चा पहली बार मुस्कुरा कर सर हिलाता है...उसके गुटके के कारण बदरंगे दांत उसकी एक और बुरी आदत की पोल खोलते हैं! माँ भी वादा करती है की उसे स्कूल भेजेगी....दोनों चले जाते हैं ! पर मुझे मालूम है....शायद कुछ ही दिनों बाद ये बच्चा दोबारा कहीं और चोरी करता पकडा जायेगा! माँ को भी आदत हो गयी है..बच्चे के जेल जाने की! सचमुच लगता है , गरीबी से बड़ा गुनाह कोई नहीं है!

बच्चे के पीछे पीछे मैं भी बाल अपराध शाखा तक चली जाती हूँ....देखती हूँ वहाँ जमीन पर ऐसे ही तीन आशीष और बैठे हुए हैं! मन खराब हो जाता है! लिख तो रही हूँ ये सब, पर लिखने से क्या होगा....काश कुछ कर भी पाती...

Thursday, September 4, 2008

बंधे हुए है हम सब एक अनजानी डोर से


रोज़मर्रा के जीवन में भी अचानक कभी कुछ ऐसा देखने को मिल जाता है जो यकीन दिला जाता है कि हम सभी इंसानों के बीच ऐसा कुछ है जो हमें एक दूसरे से जोड़े रखता है! अनायास ही नितांत अपरिचित चेहरे अपने से लगने लगते हैं...और सभी एक धागे से बंधे हुए से लगते हैं.!

मैं बांटना चाहूंगी अपना कल का अनुभव....बाज़ार से घर लौट कर आ रही थी तो देखा रास्ते में एक क्रेन आड़ी खड़ी हुई है जिसके कारण रास्ता बंद है और गाडी आगे नहीं जा सकती थी! ड्रायवर ने उतरकर पता किया तो मालूम हुआ कि एक पेड़ खतरनाक स्थिति में खडा है और उसे गिराने के लिए नगर निगम की क्रेन आई है...मैं वहीं गाडी रोक कर पेड़ के गिरने का इंतज़ार करने लगी...एक व्यक्ति ने एक मोटे रस्से को पेड़ की ऊंची डाल से बाँधा , इसके बाद क्रेन ड्रायवर क्रेन स्टार्ट करके उसे खींचने लगा ....लेकिन खट की आवाज़ हुई और रस्सा टूट गया ! रस्से बाँधने वाले और क्रेन ड्रायवर ने एक दूसरे को निराशा भरी आँखों से देखा और फिर से रस्सा बाँधने की तैयारी शुरू हुई! अब तक मैं भी उत्सुक हो चुकी थी की देखें इस बार पेड़ गिर पाता है या नहीं...एक बार फिर वही प्रक्रिया दोहराई गयी.....और जैसे ही क्रेन स्टार्ट हुई...वही खट की आवाज़ और रस्सा फिर टूट गया...! ओह...अच्छा नहीं लगा!

तभी मैंने गौर किया....की मेरी ही तरह कई राहगीर वहाँ रुके हुए हैं और इस प्रक्रिया को देख रहे हैं! जो दो पहिया वाहन वहाँ से निकल सकते थे...उन्होंने भी अपनी गाडियां रोक दी थीं! अब शुरू हुआ रस्से बाँधने वाले का हौसला बढाने का सिलसिला! सब तरफ से " शाबाश" ," इस बार हो जायेगा" आदि आवाजें आने लगीं! रस्सा बाँधने वाले ने एक बार फिर रस्सा कस के बाँधा और जैसे ही ड्रायवर ने क्रेन स्टार्ट की...भीड़ में से किसी ने चिल्लाया " गणपति बब्बा...." और ड्रायवर सहित सारे लोग चिल्ला उठे " मोरिया" ! ड्रायवर ने पूरे जोश में क्रेन आगे बढाई और एक बार फिर असफलता...! उन दोनों के साथ भीड़ से भी निराशा भरी आवाजें आयीं....


फिर से गणपति जी की जय जय कार के साथ काम शुरू हुआ....लेकिन लगातार चार बार रस्सा टूटा! लेकिन अब क्रेन वाले अकेले नहीं थे...करीब सौ अनजाने लोग उनका हौसला बढा रहे थे और रस्सा पकड़ने में मदद भी कर रहे थे ! इस वक्त जैसे सभी को कोई और काम याद नहीं था ...सिवा इसके की ये पेड़ गिरना है!आम तौर पर ट्रैफिक लाईट के ग्रीन होने का भी वेट न करने वाले लोग घर जाना भूल कर पिछले २० मिनिट से इस प्रक्रिया का हिस्सा बने हुए थे....मैं भी पेड़ गिरने के बाद ही वहाँ से जाना चाहती थी!फाइनली पांचवी बार रस्सा नहीं टूटा बल्कि एक जोर की आवाज़ के साथ पेड़ नीचे गिर गया! सभी लोग ख़ुशी से झूम उठे...कुछ ने करीब जाकर क्रेन ड्रायवर और उसके साथी को बधाई दी , कुछ ने वहीं से हाथ हिला दिया! दो मिनिट के बाद सब अपने अपने रास्ते चल दिए...और सड़क अपने पुराने ढर्रे पर लौट आई...मैं भी आगे चल दी!

मैं सोचती जा रही थी...वो क्या चीज़ है जो अनजान होते हुए भी हमें एक दूसरे से जोड़े रखती है? शायद हम एक जैसे हैं इसलिए दूसरे के प्रयत्नों में हमें अपने प्रयत्न दिखाई देते हैं... जब कोई और हिम्मत हारता है तो हम सब उसकी हिम्मत बढाते हैं क्योकी उसके अन्दर भी हमें अपना सा ही एक अक्स नज़र आता है.....खैर कारण जो भी हो , मुझे बहुत अच्छा लगा! घर पहुँचने को ही थी...तभी ड्रायवर बोला " मैडम...जब चौथी बार भी पेड़ नहीं गिरा तो मैं दुखी हो गया था!" मैंने धीरे से कहा " मैं भी!"

Friday, August 1, 2008

खुशियाँ हमसे बचके जायेंगी कहाँ


कल की बारिश में खुशियों को भीगते ,मचलते,नाचते और तैरते देखा और छोटी बहन सिन्नी ने घर के अन्दर से कैमरा लाकर इन अनमोल पलों को कैद कर लिया!तेज़ बारिश में वो ३० मिनिट! वाकई ऐसा लग रहा था जैसे मुस्कराहट बरस रही हो आसमान से!कचरा बीनने वाले बच्चों को बारिश का उत्सव मनाते देखना एक यादगार अनुभव था!
आप भी देखिये इन खूबसूरत तस्वीरों को...घर के सामने सड़क पर नाली में खुशियाँ
मनाते बच्चे॥

हमसे जीना सीखो....

खुशियाँ कैसे चारों और बिखरी पड़ी हैं!हाथ बढाओ और समेट लो

यहाँ के हम सिकंदर

खुशियाँ हमसे बचके जायेंगी कहाँ

Tuesday, July 22, 2008

मेरी असफलताएं

आज मैं सिर्फ अपनी असफलताओं के बारे में बात करना चाहती हूँ! अमूमन कोई मुझसे मेरे बारे में पूछता है तो मैं बड़े गर्व से बचपन से लेकर अब तक की सफलताओं का ज़िक्र किया करती हूँ ...जिसमे मैंने क्या क्या तीर मारे स्टाइल में अपनी जीवन गाथा सुनाती हूँ और इस कथा में कहीं भी मेरी कमियों का, गलतियों का या असफलताओं का ज़िक्र तक नहीं होता मानो ये सब मेरे जीवन का हिस्सा ही न हों....हम खुद को बहादुर कहते हैं लेकिन अपनी विफलताओं के बारे में बताने से डरते हैं! अभी दो दिन पहले ही दैनिक भास्कर में एन.रघुरामन का एक लेख पढ़ा जो सिर्फ असफलताओं के बारे में था..पढ़कर एहसास हुआ की मैंने भी कभी किसी को नहीं बताया की मैं कहाँ कहाँ जिंदगी की पायदान से फिसली हूँ!
जब भी कभी किसी ने मुझसे पूछा कि क्या आप थ्रू आउट फर्स्ट क्लास रही हैं... मैंने तत्काल जवाब दिया " जी हाँ...कभी सेकंड डिविज़न नहीं आई" जबकि ये सरासर गलत है! एक बार मेरी सेकंड डिविज़न आई थी! जब मैं tenth क्लास में थी तब साल भर केवल मस्ती में निकाला, परीक्षा टाइम में जितना पढ़ सकी पढ़ी!जब रिजल्ट आया तो ५९ प्रतिशत बना था! मेरे लिए अप्रत्याशित और सदमे भरा था क्योकि हमेशा से क्लास में फर्स्ट थ्री में शामिल होती आई थी! जिनकी सेकंड डिविज़न आती थी उन्हें हेय द्रष्टि से देखा करती थी! अब मैं खुद उसी जगह पर खड़ी थी!मम्मी पापा को भी बहुत दुःख हुआ,कहा तो ज्यादा कुछ नहीं उन्होंने लेकिन न कहते हुए भी दुखी चेहरे ने बहुत कुछ कह दिया! उसके बाद अपनी दसवी कि मार्कशीट कही भी लगाने से बचती रही, कोई पूछता तो फर्स्ट डिविज़न ही बताती रही! हांलाकि उसके बाद कभी सेकंड डिविज़न नहीं आया लेकिन ये बात मन को हमेशा कचोटती रही कि काश उस साल ढंग से पढाई की होती तो ये धब्बा नहीं लगता!और हाँ...एक और झूठ ,अगर कभी ये बताना ही पड़ जाता कि दसवी में मेरी सेकंड डिविज़न थी तो साथ में ये ज़रूर जोड़ देती थी कि उस साल परीक्षा के समय मेरे दादा जी का देहांत हुआ था तो पढ़ नहीं पायी थी! लेकिन आज कोई झूठ नहीं...मैं स्वीकार करती हूँ कि मेरी असफलता की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ मेरी थी किसी और की नहीं!

दूसरा वाकया ...बचपन से ही मेरा सपना डॉक्टर बनने का था और इसलिए बारहवी क्लास के बाद पी.एम.टी. की तेयारी के लिए एक साल ड्रॉप दिया , जितना पढाई हो सकी उतनी की! लेकिन जितनी भी की वो एक्साम में पास होने के लिए नाकाफी थी! सभी को मुझसे बहुत उम्मीदें थी!साल ख़त्म हुआ और परीक्षा का दिन आ गया! पहला पेपर फिजिक्स का था जो कि मेरा सबसे अच्छा तैयार था!पेपर ठीक ठाक गया! केवल ठीक ठाक न कि बेहतरीन! पेपर देने के बाद समझ आ गया था कि आगे के पेपरों में क्या होने वाला था! मैं बहुत घबराई हुई थी! सिलेक्शन नहीं हो पायेगा उसकी इतनी घबराहट नहीं थी जितनी इस बात की थी कि लोग क्या कहेंगे? इसी घबराहट में रात को मेरी तबियत बिगड़ गयी...अस्पताल जाना पड़ा ! और सुबह का पेपर मैं नहीं दे सकी! जब एक पेपर छूट गया तो आगे के पेपर्स देने का कोई मतलब नहीं था इसलिए मम्मी के बार बार कहने पर भी मैंने पेपर नहीं दिए! मम्मी का कहना था कि भले ही सिलेक्शन न ही लेकिन तुम्हे खुद अंदाजा हो जाएगा कि तुम कहाँ खड़ी हो! लेकिन मैं उन्हें क्या बताती कि यही अंदाजा मैं पहले ही लगा चुकी हूँ इसलिए पेपर नहीं दे रही! खैर मैंने पेपर नहीं दिए! और सभी को सिलेक्शन न होने कि वजह यही बताई कि मेरी तबियत खराब हो जाने के कारण एक्साम नहीं दे सकी और भगवान को रोज़ धन्यवाद देती थी कि अच्छा हुआ जो तबियत खराब हो गयी वरना क्या बहाना बनती खराब नंबर आने का! पर आज कोई बहाना नहीं...मैं असफल हुई थी केवल अपनी गलती की वजह से ,तबियत खराब न भी होती तब भी मेरे खराब नंबर ही आते!

हांलाकि ये बहुत छोटी बातें हैं लेकिन फिर भी मैंने कभी किसी से ये बात शेयर नहीं की...आज इन बातों को यहाँ लिखकर बहुत हल्का महसूस कर रही हूँ...शायद इन छोटी बातों के बाद कभी बड़ी असफलताओं का भी साहस और सहजता से सामना कर पाऊँ!

Tuesday, July 1, 2008

दद्दू...तुम अक्सर याद आते हो


दद्दू... नाम लेते ही बरबस ही चेहरे पर मुस्कराहट आ जाती है!कई लोग जिंदगी में ऐसे मिलते हैं जिन्हें हम कभी भूल नहीं पाते! दद्दू भी उन्ही में से एक हैं....यूं कहने को तो मेरे ड्रायवर थे दद्दू! तीन साल तक मेरी गाडी चलाई उन्होंने! लेकिन ड्रायवर से ज्यादा कुछ थे मेरे लिए! उम्र लगभग ५७ साल, जैसा वो बताते थे..लेकिन लगते ६० के ऊपर ही थे! अक्सर मैं मज़ाक में उनसे कहती " दद्दू ,तुमने गलत उम्र लिखवा दी अपनी मार्कशीट में..सठिया तो पूरे गए हो" दद्दू झेंप जाते" अरे नहीं साहब..सही में ५७ का ही हूँ" हैड कांस्टेबल जगदीश सिंह सिकरवार- यही नाम था दद्दू का लेकिन दुसरे सिपाही उन्हें दद्दू कहकर ही बुलाते और शायद पहले ही दिन से मैंने भी उन्हें दद्दू बुलाना शुरू कर दिया था! मैं नौकरी में आने के बाद से ही अकेली रह रही हूँ....तो ऐसे में अपना पर्सनल स्टाफ ही परिवार जैसा हो जाता है!

जब मैं ग्वालियर गयी थी तो हाथ में केवल एक सूटकेस था!वहाँ जाकर घर का सारा सामान खरीदा...सारा सामान दद्दू के साथ जाकर खरीदती थी!हांलाकि पसंद मेरी ही होती थी मगर फिर भी तसल्ली के लिए दद्दू से पूछती "दद्दू...ये वाला सोफा लूं या वो वाला" ? साहब..दोनों अच्चे लग रहे हैं" नहीं ..एक बताओ" दद्दू सोचते हैं फिर बोलते हैं" वो कत्थई वाला अच्छा लग रहा है" अरे कहाँ दद्दू...ये वुडन कलर का ज्यादा अच्छा है,मैं तो यही लूंगी" मैं ऐसे बोलती जैसे दद्दू ही मुझे सोफा दिलवा रहे हैं! "हाँ..ये ज्यादा अच्छा है..." दद्दू मन में शायद सोचते की अपने ही मन से लेना है तो हमसे काहे पूछ रही हैं!

मैं अक्सर देहात में जाती थी...रास्ते में मोर,ऊँट,हाथी दिखाई देते तो मैं ख़ुशी के मारे दद्दू को भी दिखाती...दद्दू भी एक मुस्कराहट के साथ मेरी ख़ुशी बांटते!कई बार मेरी नज़र नहीं पड़ पाती तो दद्दू खुद मुझे दिखाते " साहब .देखो एक साइकल पर पांच लोग बैठे हैं और सब दूध की केन लिए हैं!" हम दोनों ठठाकर हंस देते! एक बार तो हद हो गयी मेरी गाडी में ही मेरे एस.पी. भी बैठे थे...अचानक एक हाथी को देखकर मैं बेखयाली में चिल्लाई" दद्दू...जल्दी देखो...कितना बड़ा हाथी" दद्दू चुप..एस.पी. ने एक पल मेरी और देखा और फिर मुंह छुपाकर मुस्कुरा दिए!

एक बार रात गश्त से लौट रही थी...सुबह के करीब सादे चार बजे थे .ठंडों के दिन थे तो खासा अँधेरा था! लौटते लौटते मुझमे भी जागने की ताकत नहीं बचती थी! पिछली सीट पर ऊंघने लगती थी! हम लौटे ,दद्दू ने गाडी खड़ी की...मेरी नींद खुली " दद्दू ,ये कहाँ ले आये" मैंने अजनबी जगह को देखकर आश्चर्य से पूछा! दद्दू ने इधर उधर देखा और बोले " अरे साहब..मैंने समझा घर आ गया" दरअसल दद्दू ने गाडी एक अखाडे में ले जाकर खड़ी कर दी थी उनका मासूम सा जवाब था" साहब,अपने घर का और अखाडे का गेट एक जैसा ही तो है"

जिस दिन दद्दू अपने बाल और मूंछे डाई करके आते...उस दिन शर्ट भी इन करके पहनते और अपनी उम्र से सीधे १० साल पीछे चले जाते और मुझे उन्हें छेड़ने का एक और मौका मिल जाता! और दद्दू शरमा के रह जाते! बारिश के दिनों में मेरे लॉन में काफी पानी भर जाता था ,एक दिन ऐसी ही तेज़ बारिश में मैं ढेर सारी कागज़ की नाव बनाकर पानी में पहुंची और सारी नाव एक साथ तैरा दीं.. साथ में अपनी हवाई चप्पलें भी पानी में तैरा दीं! दद्दू देख देख कर मुस्कुरा रहे थे...थोडी देर बाद मैं अन्दर आ गयी और १० मिनिट बाद बाहर झाँककर देखा तो दद्दू एक अखबार की नाव बनाकर पानी में छोड़ रहे थे..एकदम तल्लीन! मैं बाहर नहीं गयी...कहीं उनके भीतर का बच्चा शरमा कर भाग न जाए!

दद्दू बूढे भले ही थे लेकिन थे बहादुर...मुसीबत के वक्त उन्होंने कभी साथ नहीं छोडा...एक बार एक गाँव में हम गांजे की रेड करने गए लेकिन सारे गाँव वाले इकट्ठे हो गए और हमारे ऊपर फायरिंग शुरू कर दी!हम ६ लोग थे...दद्दू खेत के बाहर गाडी में अकेले थे! उनके ऊपर भी अटैक हुआ...सारी गाडी की तोड़ फोड़ कर दी!लेकिन दद्दू गाड़ी छोड़कर नहीं भागे...उन्हें भी हाथ में काफी चोट आई थी! मैंने बाद में पूछा" दद्दू,तुम वहाँ से हट क्यों नहीं गए थे?" साहब .आप भी तो खड़े रहे,मैं कैसे चला जाता" दद्दू का जवाब था! फिर मैं कुछ नहीं बोली!
अभी कुछ दिन पहले ही मेरे एक दोस्त को दद्दू रास्ते में मिल गए....उसने मोबाइल से मेरी बात करायी दद्दू से! शायद अब उन्हें कम सुनाई देने लगा है!मैंने पूछा "दद्दू कैसे हो?" अच्छा हूँ...आजकल कहाँ काम कर रहे हो दद्दू?" बस..साहब बढ़िया हूँ" दद्दू कुछ का कुछ सुन रहे थे!"दद्दू कभी भोपाल आओ" मैंने कहा! दद्दू ने तीसरी बार कहा" बस साहब बढ़िया हूँ!" फिर मैंने फोन रख दिया और एक बार फिर मेरे चेहरे पर मुस्कराहट थी....

Saturday, June 14, 2008

सचमुच बदल गई हूँ मैं

आज छुट्टी का दिन था ..अमूमन छुट्टी वाले दिन मैं सुबह ड्राइवर को भी फ्री छोड़ देती हूँ इस हिदायत के साथ की अपना मोबाइल चालू रखे जिससे अचानक कहीं जाना पड़े तो आ जाए!आज भी ड्राइवर को मैंने फोन कर दिया था की शाम को ठीक ६ बजे आ जाए....मैंने शाम को ६.१५ पर बाहर निकल कर देखा तो गाड़ी नही दिखी...मेरे अन्दर धैर्य थोड़ा कम ही है...वापस अन्दर आ गई...५ मिनिट बाद दुबारा बाहर निकली तो फ़िर से गाड़ी नही दिखी..गुस्से में ड्राइवर को फोन लगाया... २ सेकंड में ही गाड़ी लेकर हाजिर हो गया...मैंने आव देखा न ताव ..चिल्लाना शुरू कर दिया...जब मैं चुप हुई तब उसने बताया की पानी बरस रहा था तो उसने गाड़ी को साइड में लगा लिया था ताकि भीगे नही...आ तो वह ६ बजे ही गया था!मुझे बुरा लगा की उसे बिना सुने ही मैंने बुरा भला कह दिया...तत्काल उसे मैंने सौरी बोला!बात आई गई हो गई लेकिन मैं सोच रही थी.....पिछले कुछ सालों में मैं कितना बदल गई हूँ.....बचपन से ही मुझे माफ़ी मांगने में अपनी बेईज्ज़ती महसूस होती थी! अगर कभी बचपन में कोई गलती हो जाती और मम्मी पापा कहते की माफ़ी मांग लो हम कुछ नही कहेंगे...लेकिन मैं गलती मानने से साफ इनकार कर देती थी...

आज ऐसे ही एक किस्सा याद आ गया....मैं बी.एस.सी. सेकंड ईयर में पढ़ रही थी..हर साल की तरह उस साल भी यूथ फेस्टिवल होने वाले थे...चूंकि मैं पिछले एक साल से शास्त्रीय संगीत सीख रही थी तो सभी के कहने पर मैंने प्रतियोगिता में भाग ले लिया...और चूंकि शास्त्रीय संगीत के जानने वाले ज्यादा नही थे तो मैं ओवर कौन्फिदेंट भी थी अपनी जीत को लेकर....मेरे अलावा केवल एक लड़की और थी भाग लेने वाली..हम दोनों में से एक को ही जीतना था! मैंने राग हमीर की एक बंदिश अच्छे से तैयार कर रखी थी और उसी को २-३ प्रोग्राम में गा भी चुकी थी..ऊपर से लोगों की तारीफ ने सचमुच मेरा दिमाग भी ख़राब कर दिया था...दूसरी तरफ़ रश्मि थी जो अभी तक किसी प्रोग्राम में नही गाई थी!और सबसे बड़ी बात की जो उस प्रतियोगिता की जज थीं...मैडम ताम्बे, वो संगीत की जानी मानी हस्ती थीं और बमुश्किल दो हफ्ते पहले ही किसी सिलसिले में मेरा उनके घर जाना हुआ था तो मैंने उन्हें यही राग गाकर सुनाया था और उन्हें भी अच्छा लगा था...तो मुझे पूरा विश्वास था की जीत तो मेरी ही होनी है!प्रोग्राम शुरू हुआ...मैंने गाना शुरू किया और ये क्या....पहला ही सुर ग़लत लगा!मैंने मैडम की तरहफ और मेरे गुरु जी की तरफ़ देखा ...उनके माथे पर बल आ गए थे! इसके बाद मैंने सुर संभाला और उसके बाद पूरी बंदिश लगभग सही गाई....शायद बाकी लोगों को मेरी इस गलती के एहसास भी नही हो पाया था...इस गलती के बाद भी मुझे यकीन था की जीतूंगी तो मैं ही....फ़िर रश्मि आई...उसने राग बागेश्री की एक बंदिश गाई...और पूरी तरह सुर में ५ मिनिट में अपनी बंदिश ख़त्म कर दी...मैं सोच रही थी की मैंने १५ मिनिट तक गाया है और जितनी कलाकारी सम्भव थी सब कुछ दिखा दी थी इसलिए इंतज़ार कर रही थी विजेता के रूप में अपना नाम पुकारे जाने का....और जैसे ही विजेता के रूप में रश्मि का नाम पुकारा गया..एक बार मुझे अपने कानों पर विश्वास नही हुआ...लेकिन ये सच था रश्मि मंच पर पहुँच चुकी थी..इनाम लेने के लिए!मेरा दिमाग एकदम सातवे आस्मान पर पहुँच गया...रही सही कसर मित्र मंडल ने पूरी कर दी ये कह के की तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है...तुम्हे ही जीतना चाहिए था...मैं ये मानने को तैयार नही थी की रश्मि ने मुझसे अच्छा गाया था..गुस्से में उठकर मैं सीधे घर की और चल दी...रश्मि को बेमन से बधाई दी..ताम्बे मैडम ने मुझे बुलाया मगर मैंने उनकी और देखा तक नही....गुस्से ने साधारण शिष्टाचार भी भुला दिया था!दोस्तों के कहने में आकर अगले दिन अपने कॉलेज के प्रिंसिपल के पास पहुँची...ग़लत जजमेंट की शिकायत करने...वो भी संगीत के बड़े जानकार थे और ताम्बे मैडम की बड़ी इज्ज़त करते थे..उन्होंने साफ मना कर दिया उनके निर्णय के ख़िलाफ़ जाने से..मैं बहुत दिनों तक अपसेट रही इस घटना से...और खासकर ताम्बे मैडम के प्रति कटुता से भर गया मेरा मन...मैं एक बार भी ये स्वीकार करने को तैयार नही थी की मैंने गलती की थी!

आज सोच रही हूँ....रश्मि ने वाकई मुझसे अच्छा गाया था! वक्त के साथ कितना कुछ बदल जाता है जो हमे पता भी नही चलता! आज एक सिपाही से भी माफ़ी मांगते संकोच नही होता...सचमुच बदल गई हूँ मैं!

Sunday, June 8, 2008

वो खामोश बैठी लड़की

अभी अनुराग जी की पोस्ट पढी...लास्ट की लाइन्स "दर्द है कि कम्बख्त ख़त्म होता नही..........रूह को चैन मिलता नही" पढ़कर बहुत कुछ याद आ गया! कभी कभी कुछ लम्हे जेहन पर ऐसे चस्पा हो जाते हैं कि गाहे बगाहे याद आ जाते हैं! आज ही किसी अखबार में एक छोटी बच्ची के बलात्कार कि खबर पढी,मन कसैला हो गया!और अचानक वो याद आ गयी...

वो चौदह साल की ही तो थी जब इस दर्दनाक हादसे की शिकार हुई! सात साल पहले एक देहात के थाने में थाना प्रभारी की ट्रेनिंग ले रही थी! गंभीर अपराध पलट रही थी..नज़र पड़ी , स्टाफ ने बताया पास के ही एक छोटे से गाँव की लड़की है उसके २० साल के पडोसी लड़के ने रेप किया! लड़का अरेस्ट हुआ? मैंने पूछा ! मैं आगे का पेज पलटने लगी तभी हवलदार की बात सुन के बुरी तरह चौंक गयी..." साहब..वो लड़की अब गर्भवती है" !कुछ बहुत ही अजीब सी फीलिंग उठी मन में..रहा नहीं गया! मुझे ले चलोगे उसके गाँव? क्यों नहीं...अभी चलिए!

लगभग ५ किलो मीटर दूर था उसका गाँव! पहुंची..लड़की के घर पहुंचे! माँ बाहर ही बैठी थी! मैंने नज़र घुमाई..बमुश्किल २०-२५ टपरे बने हुए थे !सारे के सारे अनपढ़ और हद से ज्यादा गरीब! माँ ने बताया कि सातवां महीना चल रहा है! इतने में वो भी बाहर निकल कर आयी! सांवली, दुबली पतली सी लड़की! उसकी माँ ने बैठने का इशारा किया..चुपचाप जमीन पर बैठ गयी! मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या बात करूं उससे!" इससे तो पैदा ही नहीं होती तो अच्छा था.." माँ लड़की को देखते हुए बोली! वो बिलकुल चुपचाप थी..मैंने माँ को डांटा" इसमें इसकी क्या गलती है...उसे क्यों कोसती हो" इसे किसी डॉक्टर को दिखाया? माँ ने क्रतग्य भाव से मेरे साथ आये हवलदार कि ओर देखकर बोला " इन हैड साब ने बहुत मदद की हमारी...डॉक्टर के पास ले जाना, दवाई दिलवाना सब करवा देते हैं! बड़ा अच्छा लगा सुनकर!इसके पहले तक मेरे मन में पुलिस कि छवि नकारात्मक ही ज्यादा थी! खैर...मिलकर वापस आ गयी और दूसरे कामों में लग गयी!

दो महीने बाद उसे अस्पताल में भरती कराया गया! लड़की का माँ के अलावा कोई नहीं था...लेकिन थाने के सारे स्टाफ की सुहानुभूति थी..दौड़ दौड़कर दवाई लाना..डॉक्टर को बुलाना..सब मेरे सिपाहियों ने ही किया! रात को उसने एक लड़की को जन्म दिया! हम सब पहुंचे उसे देखने...बड़ी खूबसूरत प्यारी सी बच्ची थी! घर आकर सोयी...सुबह चार बजे फोन की घंटी से नींद खुली...." उसने अपनी पैदा हुई बच्ची का गला घोंट कर मार दिया" कानों पर विश्वास नहीं हुआ...भागकर अस्पताल पहुंची! सचमुच उसने अपनी कुछ घंटों की बेटी का गला घोंट दिया था...नवजात बच्ची निर्जीव पड़ी हुई थी!वो अब भी चुपचाप अपने पलंग पर बैठी थी! उसकी माँ उसे गालियाँ देती हुई रोये जा रही थी! मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था...क्या करूं? क्यों किया तुमने ऐसा? मैंने उससे पूछा ! " मैं क्या करती इसका...?" पहली बार वो कुछ बोली ! क्या करती मतलब...?मैं बुरी तरह खीजकर बोली!
"अम्मा ही तो जब से कह रही है...तेरी लड़की है अब तू ही संभालना, आप बताओ मैं कैसे सम्भालू इसे...मुझे नहीं चाहिए" उसकी आँखों न आंसू हैं न चेहरे पर कोई पश्चाताप! डिलेवरी के बाद उसकी हालत भी कोई ठीक नहीं थी..ऊपर से दिसम्बर की ठंड! उसके ऊपर अपनी ही बेटी के कत्ल का मुकदमा कायम हो गया! अगले घंटे में वो अस्पताल से निकलकर थाने के हवालात में आ गयी! कोई प्रतिरोध नहीं...एकदम खामोश बैठ गयी फिर से!पता नहीं क्या चल रहा था उसके मन में....उस बेचारी बिना पढी लड़की को ये भी बोध नहीं था की उसने कोई अपराध कर दिया है! उसे अभी तक ये समझ नहीं आ रहा था...की आखिर उससे ऐसी क्या गलती हो गयी...उसकी लड़की, उसे नहीं चाहिए उसने मार दी! मैं उसे कानून नहीं समझा सकती थी! हवालात में बैठी बुरी तरह से कांप रही थी....इस वक्त थाने के स्टाफ ने जो किया मेरे मन में सभी के लिए श्रद्धा भर गयी...मैंने उसके लिए स्वेटर मंगाया...एक सिपाही अपने घर से वो लड्डू बनवा लाया जो डिलेवरी के बाद दिए जाते हैं...दूसरे सिपाही की पत्नी उसके साथ बैठी रही..जब तक वो सो नहीं गयी! अगले २४ घंटे वो थाने पर रही...उसके बाद कोर्ट पेश की गयी ..जहाँ से उसे सुधार गृह भेज दिया गया!

कत्ल का मुकदमा चला उस पर...शायद उम्र को देखते हुए सज़ा में कुछ कमी हो जाये मगर उसे बरी कोई नहीं कर सकता!पता नहीं..केस ख़त्म हो गया या अब तक चल रहा है?पता नहीं उसे कितने साल की सजा हुई? अब तक तो वो बालिग हो गयी होगी और सुधार गृह से निकलकर जेल पहुँच गयी होगी! हत्यारी माँ का लेबल भी उस पर लग गया होगा!

मैं अक्सर सोचती हूँ...कानून की नज़र में वो गुनाहगार है पर क्या सचमुच वो दोषी है?

जब सोचती हूँ उसके बारे में तो मुझे " gods must be crazy" film का वो सीन याद आ जाता है जिसमे कालाहारी का एक बुश्मैन हिरन मार देता है...जब उसे कोर्ट ले जाया जाता है...तो उसे सजा मिलती है लेकिन वह अंत तक नहीं समझ पाता की उसकी गलती क्या है? जिस परिवेश में वह रहता था वहा कोई कानून नहीं था! शायद उस लड़की के लिए भी बिल्ली मारना और इंसान को मारना एक जैसा ही रहा होगा! आज फिर से वो खामोश बैठी लड़की बहुत याद आ रही है!

Friday, May 30, 2008

एक उलझन सी है

आज सुबह शताब्दी से ग्वालियर से भोपाल लौट रही थी!कल सुबह अचानक जाना पड़ा ग्वालियर...गुर्जरों ने ग्वालियर बंद करवाया था कल तो उसी सिलसिले में गयी थी!आज वापस आई...आम तौर पर शताब्दी से भोपाल तक का सफर साड़े चार घंटे का होता है..और पुराने फिल्मी गीतों के instrumental म्यूजिक के साथ कोई एक किताब पढ़ते हुए सफर आसानी से कट जाता है! आज भी चेतन भगत की 'the three mistakes of my life' मेरे हाथ में थी और खासी interesting भी लग रही थी पर मन बार बार भटक कर बलवीर पर जा रहा था...

बलवीर कांस्टेबल है ग्वालियर में और मेरे ग्वालियर के कार्यकाल के दौरान मेरे ऑफिस में मेरे रीडर का सहायक था..तीन साल वो मेरे साथ था और इतना होशियार और सज्जन की इन तीन सालों में मुझे एक भी बार उससे ऊंची आवाज़ में बात करने की ज़रूरत नहीं पड़ी! हमेशा सभी के साथ ऐसा होता है की जिस जगह काम करते हैं वहाँ पर कुछ लोगों से आत्मीय संबंध बन जाते है और वे लोग घर के सदस्य की तरह हो जाते हैं बलवीर भी उन्ही में से एक है..उसके साथ ही एक और हवलदार जो मेरा बड़ा विश्वसनीय रहा देवसिंह ..वो भी मिलने रेस्ट हाउस आ गया!मुझे भी अच्छा लगा मिलकर...बस यूं ही मैंने दोनों से उनकी खैरियत पूछी बलवीर आम तौर पर शांत ही रहता था...एक मुस्कान के साथ अपने बारे में बता रहा था!सब कुछ ठीक साउंड कर रहा था!तभी देवसिंह ने बताया 'साहब, बलवीर बहुत बीमार रहता है अभी १० दिन अस्पताल में एडमिट रहा'! मैंने बलवीर की तरफ देखा..आधे घंटे से हम लोग बात कर रहे थे पर उसने एक शब्द नहीं बोला! मैंने पूछा ' क्या हो गया बलवीर?' उसने बताया की उसको हार्ट प्रोब्लम है और बी..पी. भी बढ़ गया है!और कोलेस्टेरोल भी काफी ज्यादा है!ओह..ज्यादातर पुलिस वालों को ये प्रोब्लम होती है...काम की अधिकता,तनाव और अनियमित खान पान के कारण! बलवीर की तो उम्र भी ज्यादा नहीं है!यही कोई ४० के आसपास!मैं ज्यादा तो नहीं जानती...पर चूंकि \कोलेस्टेरोल मेरा भी हाई रहता है इसलिए डॉक्टर से जो अपने लिए सलाह सुनी थीं वही बलवीर को बताने लगी ' घी लगी रोटी मत खाओ, सलाद ज्यादा लो...सुबह सुबह ब्रिस्क वॉक करो..वगेरह वगेरह! मैंने लगे हाथों कुछ देसी इलाज भी बता दिए जो मैं आजमा चुकी थी! मैंने सुबह घूमने पर ज्यादा जोर दिया...मैंने अपनी बात ख़तम कर बलवीर की ओर देखा...ये क्या... उसके चेहरे पर एक दर्द छलक आया और आँखों में आंसू आने से जैसे तैसे रोक रहा था!मैंने पूछा 'क्या हुआ बलवीर?' " साहब, मेरी पत्नी मानसिक रोगी है रात को दवा लेकर सोती है तो सुबह ८ बजे का पहले नहीं उठती...मैं सुबह ५ बजे से उठकर पानी भरना, बच्चों को स्कूल भेजना, उनका नाश्ता बनाना , घर का झाडू पोंछा करना ,खाना बनाना ये सब करके १० बजे ऑफिस पहुँचता हूँ..एडिशनल एस.पी. के ऑफिस का सारा काम अकेले देख रहा हूँ...और वहाँ भी दिन भर डांट ही खाता हूँ..कहाँ से वक्त लाऊं सुबह घूमने के लिए?' इतना कहकर उसने मुंह फेर लिया..मैं समझ गयी वो मेरे सामने रोना नहीं चाहता है! दो मिनट हम सब खामोश रहे!' बलवीर..तुम किसी कूल जगह ट्रांसफर क्यों नहीं कर लेते?' मैंने पूछा!" बहुत कोशिश कर ली लेकिन..." इसके आगे कुछ न बोल सका..पर मैं समझ गयी..तमाम कोशिशों के बाद भी मनचाही जगह ट्रांसफर होना मुश्किल ही है..खासकर जिसकी कोई जुगाड़ न हो!बलवीर फिर ज्यादा देर नहीं ठहरा..चला गया!

वो तो चला गया लेकिन मन अब तक परेशान है...कई बार मैं खीज जाती हूँ ज्यादा काम होता है या कभी बॉस कुछ कह दे तो...बेचारा बलवीर कितना खीजता होगा..दिन भर डांट खाकर और वो तो किसी से कुछ कह भी नहीं पाता...घर पर अपना पत्नी से भी नहीं बाँट सकता अपना परेशानी! पता नहीं ऐसे कितने और कर्मचारी होंगे जो इतने तनाव में नौकरी करते होंगे...और कोई पूछने वाला भी नहीं है!'तुमने अच्छी वर्दी नहीं पहनी, काम में मक्कारी करते हो, काम नहीं करना तो नौकरी छोड़ क्यों नहीं देते...किसी और को नौकरी मिले' ये कुछ शब्द हैं जो अमूमन हर सिपाही ,हवलदार रोज़ सुनता है!हमारे पास वर्दी के तीन सेट होते हैं, हम गाडी में चलते हैं, एक दाग लग जाए तो तुरंत धुलने चली जाती है...मगर एक सिपाही जो दिनभर मोटरसाइकल या साइकल या टैम्पो में दौड़ भाग कर रहा है...कहाँ तक वर्दी धुल्वाये.. आज सोच रही थी! डांटना कितना आसान होता है...लेकिन कभी अपने सिपाहियों को बुलाकर उनका दुखदर्द पूछने का टाइम नहीं है किसी के पास!

पता नहीं क्यों पोस्ट कर रही हूँ मैं ये..पता नहीं मैं बलवीर के लिए क्या कर पाउंगी! सोचती हूँ किसी अधिकारी से बात कर लूं उसके ट्रांसफर के लिए...! और हाँ...कल ही अपने रीडर से भी थोडी देर बात करुँगी!मुझे तो ये भी नहीं पता की उसके कितने बच्चे हैं?