Tuesday, April 15, 2008

गुफ्तगू

कल रात मेरे और चाँद के बीच
गुफ्तगू हुई...
देर तक मारते रहे गप्पें हम
मैंने कहा चाँद से,
बड़ा परेशान हूँ मैं
नहीं पाता इस दुनिया में खुद को फिट
दुनिया का कद ज्यादा बढ़ गया है
और मैं रह गया हूँ
एकदम बौना और तन्हा सा....

चाँद जोर से हंसने लगा
और बोला....भाई मेरे
तेरी मेरी मुश्किल तो साझी है
तारे भी नहीं करते मुझे अपने खेल में शामिल
मेरे इत्ते बड़े कद के कारण
मैं भी हूँ अनफिट
इस तारों भरे आसमान में....

Thursday, April 3, 2008

तुम्हारा दामन

देखो ,तुम्हारी साडी कैसे टिमटिमा रही है
याद नहीं...?
कल रात की चादर को झाडा था तुमने
कुछ सितारे टूटकर गिर गए थे नीचे
तुम्हारे पल्लू से जो उलझ गए थे
अब शायद ही इन्हें कोई हटा पाए

मैं ही कहाँ निकल पाया
आज तक उलझा हुआ हूँ
सच ,बड़ा पुरकशिश दामन है तुम्हारा .....

गले लगा लो दोस्त

बचपन हमारे बराबर कद के थे दोस्त
आज तुम इतने ऊंचे हो गए हो
कि मेरे हाथ नहीं पहुँचते तुम तक

हम दोनों ने विस्तार किया
मैंने समंदर की तरह
तुमने आसमान की तरह...

मैंने अपनी मौजों को बहुत उछाला पर
खाली हाथ वापस आ गयीं
तुम्हे छू भी नहीं पायी

तुम्ही झुक कर मुझे गले लगा लो दोस्त
जैसे उफक पर आकर
आसमान समंदर के गले लगता है...