Thursday, August 20, 2015

ये होती है बारिश

हट्ट पागल ...
बारिश का होना केवल काले बादलों से बूंदों का गिरना थोड़े ही है 
बूँदें बारिश नहीं होतीं
वे तो बारिश लाती हैं

बताऊँ ? क्या होते हैं बारिश के मायने ...
धड़कनों का मोर बन जाना है बारिश
बदन का मुस्कराहट बन जाना है बारिश
आँखों का जुगनू बन जाना है बारिश 
बाहों का झप्पी बन जाना है बारिश

सड़कों का संतूर बन जाना है बारिश 
पहाड़ों को कहवे की तलब उठना है बारिश 
नदियों की गुल्लक भर जाना है बारिश 
जंगलों का किलकारी बन जाना है बारिश

रांझों का जोगी हो जाना है बारिश
हीरों का नटनी हो जाना है बारिश 
खुदा के पेहरन का कच्चा हरा रंग छूट जाना है बारिश
रातों का झींगुर हो जाना है बारिश

धरती का खुशबू हो जाना है बारिश 
सूरज का एक झपकी मार लेना है बारिश 
रेनकोट के भीतर तरबतर हो जाना है बारिश 
यादों की इक सूखी पत्ती का हरिया जाना है बारिश

आसमान का टिपटिप हो जाना है बारिश 
शहरों का छप छप हो जाना है बारिश 
मौसम का रिमझिम हो जाना है बारिश 
रागों का घन घन हो जाना है बारिश

नज्मों के चेहरों पर बूंदों का झिलमिलाना है बारिश 
सीले ख़्वाबों का सुलग उठना है बारिश
मन का सबसे कच्चा कोना रिसने लगना है बारिश 
बूढ़ी पृथ्वी के जोड़ों में इक कसक है बारिश

पुराने एल्बम पलटना है बारिश 
ड्राफ्ट्स में सहेजा एक ख़त दसियों बार पढना है बारिश 
गुलज़ार , पंचम और ब्लैक कॉफ़ी है बारिश 
छतरी ठेले से टिका भुट्टे खाना है बारिश और

तुम्हारा हौले से मेरा माथा चूम लेना है बारिश .....

Thursday, July 2, 2015

विदा ...

कब किसी ने सलीका बताया कि कैसे ली जाती है विदा
प्रेम करने के सौ तरीकों वाली किताब भी नहीं बताती
कि विदा प्रेम का ज़रूरी हिस्सा है
साथी को खुश रखने के नुस्खे तो सहेलियों ने भी कान में फूंके थे
माँ भी यदा कदा सिखा ही देती समझौते करने के गुर

लेकिन विदा और मृत्यु के बावत कोई बात नहीं करता
जबकि दोनों प्रेम और जीवन का अंतिम अध्याय लिखती हैं

इस तरह विदा लेना और देना मुझे आया ही नहीं
गले लगकर रोना बड़ा आसान और प्रचलित तरीका है
पर मुकम्मल तो वो भी न लगा 
गाली बक कर दो तमाचों के साथ भी विदा ली जा सकती है
मगर वह इंसानी तरीका नहीं

क्या होता वो सलीका कि विदाई की गरिमा बनी रहती
तमाम शिकवों के बावज़ूद ?

जैसे पेड़ करते हैं अपने पत्तों को विदा 
जैसे रास्ता मुसाफिर को और 
जैसे चिड़िया अपने बच्चों को

मुझे न पेड़ होना आया , न रास्ता होना 
और न चिड़िया होना

खामोशी से किसी को सुलाकर उससे हाथ छुड़ा लेना एक और तरीका है
पर यह तो ज़ुल्म ठहरा 
यशोधरा की खाली छूटी हथेली आंसुओं से भरी देखी थी मैंने
और खामोश होंठों पर एक उदास शिकवा " सखी वे मुझसे कहकर जाते "

वादा करके न लौटना एक और तरीका हो सकता है
मगर यह क्रूरता की पराकाष्ठा है और 
जन्म देता है एक कभी न मिटने वाले अविश्वास को

हांलाकि दोनों तरीकों के मूल में विदा के दुःख को कम करना होता होगा शायद
मैं इस विदा को टालती रही एक मुकम्मल तरीके के इंतज़ार में 
और इस बीच एक सुबह देहरी पर रखा पाया 
एक गुड बाय का ग्रीटिंग कार्ड

विदाई का एक बदमज़ा तरीका आर्चीज वाले भी बेच रहे थे
सच तो ये कि विदा करना कोई किताब नहीं सिखा सकती
कोई समझाइश विदा को आसान और सहज नहीं बनाती

हर विदाई छाती पर एक पत्थर धर जाती
हर विदा के साथ नसें ऐंठ जातीं , आँखें एक बेचैन काला बादल हो जातीं
हर विदाई के साथ कुछ दरकता जाता
हर विदा के साथ कुछ मरता जाता

कितना टालूं इस विदा को कि
अब वक्त बार बार चेतावनी अलार्म दे रहा
"टाइम ओवर लड़की .. तुमसे न हो पायेगा"

हाँ ... मुझसे सचमुच न हो पायेगा
कि मरना ही होगा एक बार फिर
ओ गुलज़ार .. जानते हो
सांस लेने की तरह मरना भी एक आदत है

पर अब भी मैं जीवन की आखिरी विदा से पहले
पेड़ ,रास्ता या चिड़िया होने के इंतज़ार में हूँ...

Saturday, June 20, 2015

जान जाती है जब उठ के जाते हो तुम..

' जान जाती है जब उठ के जाते हो तुम '
फरीदा आपा , कहाँ से लाई हो तुम आवाज़ में ऐसी तड़प कि जाने वाले के कदम वहीं के वहीं थम के रह जाएँ !उफ़ सी होती है दिल में , धड़कनें मुंह को आती हैं ! रोकने वाले की जान जाने वाले के क़दमों में घिसटती हुई पीछे पीछे जाती है !
मैंने तो जब जब कहा ' तुमको अपनी कसम जानेजां ,बात इतनी मेरी मान लो ' जाने वाला मुस्कुराया,गाल पर एक मीठी चपत लगाई और फिर कभी नहीं लौटा ! कसम सिसकती हुई खुली खिड़की पर औंधे मुंह पड़ी रही ! जान निकलती रही ,जान जाती रही पर कोई रुका नहीं !
जाने कितनी कही अनकही इश्क की दास्तानों में ये एक गुज़ारिश रो रोकर दम तोड़ती रही ! पहलू से उठकर जाते देखना रुलाता रहा ,हाय मरते रहे, लुटते रहे मगर आखिर में पनाह देती बस एक आवाज़ बची रह जाती !
' आज जाने की ज़िद न करो '
फरीदा आपा .. तुम गाती जातीं , रील घिसती जाती , ज़िन्दगी गुज़रती जाती !
आखिरी बार तुम्हे अपनी रूह में घोलकर मैंने शिद्दत से बार बार पुकारा था....
' तुम ही सोचो भला क्यूँ न रोकें तुम्हे ,जान जाती है जब उठ के जाते हो तुम
तुमको अपनी कसम जानेजां ,बात इतनी मेरी मान लो
आज जाने की ज़िद न करो '
पर पापा नहीं रुके ! तुमको इतना इतना सुनने वाले पापा नहीं रुके ! ऐसे गए कि बस ...
सच सच कहना आपा ,क्या तुम भी कभी रोक पायीं जाने वालों को ? नहीं रोक पायी होगी ना .. जाने वाला कब रुका है भला ?
आज किसी को नहीं रोकना मुझे ! किसी से कोई ज़िद नहीं करनी ! मगर तुमसे एक रिश्ता है आपा ! जब भी जाने वाले को रोकूँगी ,तुम्हे ही गुनगुनाउंगी । क्या जाने कोई सचमुच ही सारा जहां छोड़कर पहलू में ही बैठा रह जाए ! कोई एक कसम पर ख़ुशी ख़ुशी बंध जाए !
आपा ... तुम पनाह देती हो हमेशा हमेशा ! अभी भी तुम्हारी आवाज़ के दरिया में गहरे डूबी हुई हूँ ! तुम्हारे इतने कहे पर ही जान निकलती है मेरी !
' वक्त की कैद में ज़िन्दगी है मगर ,चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद है
इनको खोकर मेरी जानेजां ,उम्र भर न तरसते रहो
आज जाने की ज़िद न करो .... '