Saturday, February 6, 2016

रो लो पुरुषो , जी भर के रो लो

बड़ा कमज़ोर होता है 
बुक्का फाड़कर रोता हुआ आदमी

मज़बूत आदमी बड़ी ईर्ष्या रखते हैं इस कमज़ोर आदमी से
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सुनो लड़की 
किसी पुरुष को बेहद चाहती हो ?
तो एक काम ज़रूर करना

उसे अपने सामने फूट फूट कर रो सकने की सहजता देना
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दुनिया वालो
दो लोगों को कभी मत टोकना
एक दुनिया के सामने दोहरी होकर हंसती हुई स्त्री को 
दूसरा बिलख बिलख कर रोते हुए आदमी को

ये उस सहजता के दुर्लभ दृश्य हैं 
जिसका दम घोंट दिया गया है 
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ओ मेरे पुरुष मित्र
याद है जब जन्म के बाद नहीं रोये थे 
तब नर्स ने जबरन रुलाया था यह कहते हुए कि 
" रोना बहुत ज़रूरी है इसके जीने के लिए "

बड़े होकर ये बात भूल कैसे गए दोस्त ?
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रो लो पुरुषो , जी भर के रो लो
ताकि तुम जान सको कि 
छाती पर से पत्थर का हटना क्या होता है

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ओ मेरे प्रेम
आखिर में अगर कुछ याद रह जाएगा तो 
वह तुम्हारी बाहों में मचलती पेशियों की मछलियाँ नहीं होंगी

वो तुम्हारी आँख में छलछलाया एक कतरा समन्दर होगा
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ओ पुरुष
स्त्री जब बिखरे तो उसे फूलों सा सहेज लेना

ओ स्त्री 
पुरूष को टूट कर बिखरने के लिए ज़मीन देना

Sunday, December 13, 2015

हर पहर प्रेम

(श्रवण )
आज सवेरे जब तुम्हे देख रही थी अपलक ,
परिंदों को दाना डालते हुए ,
छत पर दो गौरैया , तीन कबूतर और चार गिलहरियों से घिरे ,
उन्हें प्यार से टेर लगाकर बुलाते हुए तुम,

अचानक एक गहरी और शांत आवाज़ में तब्दील हो गए थे 
और मैं लगभग ध्यान मग्न

संसार के सारे स्वर मौन हुए और
तुम गूंजने लगे मेरे देह और मन के ब्रम्हांड में एक नाद की तरह 
काटते रहे चक्कर मेरी नाभि के इर्द गिर्द

मैं उस पल में एक योगिनी थी और तुम 
ओम... ओम...ओम

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( स्वाद)
आज दोपहर मौसम की पहली बारिश और बस ...
तुमने देखा मुझे ऐसी तलब भरी निगाहों से 
मानो मैं चाय की एक प्याली हूँ

ओह ...उत्तेजना से थरथरायी प्याली और 
टूट कर बिखर गयी एक गर्म आगोश में

और ठीक उस वक्त जब तुम ले रहे थे बागान की सबसे कोमल पत्तियों की चुस्कियां
मैं तलबगार हुई एक अनचीन्हे नशे की और
तुम उस क्षण बने मेरे लिए अंगूर का महकता बाग़

ढेर से रसीले अंगूर मैंने कुचले , चखे और
डूबकर बनायी दुनिया की सबसे बेहतरीन शराब

अब आँखें बंद कर घूँट घूँट चखती हूँ तुम्हे 
नशा -ए -मुहब्बत बढ़ता जाता हर बूँद के साथ

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(स्पर्श)
पूरी ढल चुकी शाम के बाद बुझ चुके सूरज की राख 
जब उदासी बनकर जमा हो रही थी चेहरे और निगाहों पर

तुम बन गए थे एक रेशमी रूमाल
मेरी छलछलाई आँख को समेटते , उदासी की राख पोंछते

तुम उस पल एक मुलायम छुअन थे , 
हंस का एक उजला मुलायम पंख थे , किसी नवजात की नर्म हथेली थे

तुम स्वाति की पहली बूँद थे, बेचैन पपीहे पर बरस रहे थे ....
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(दृश्य)

आधी रात नींद खुली और देखा 
तुम टेबल पर झुके कोई कविता बुन रहे थे 
लैम्प की उस पीली रौशनी में तुम बन गए
प्रकृति की एक विराट पेंटिंग

सोचते हुए ललाट पर चार गहरी सिलवटें
जैसे सूरज से निकलती पहली किरणें
जिसकी गुनगुनी गर्माहट में 
गेंहूं की बाली की तरह पकती थी कविता ,

प्रेमिल आँखों में देर से टिकी एक बूँद 
जो बाद में कविता की किसी पंक्ति में ही गुम हो गयी थी 
मद्धम लयबद्ध साँसों में महकती थी वो सुनहरी गेंहू की बाली

मैं देखती रही अडोल उस अलौकिक चित्र को 
फिर मैं उस चित्र पर झुकी और अपना नाम लिख दिया 
एक पीले चुम्बन से ....

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मैं मेरी चार इन्द्रियों से चार पहर तुम्हे महसूसती हूँ
और पांचवी ?
(गंध)
जब जब सांस लेती हूँ 
तुम बन जाते हो तुम्हारी ही तुर्श महक 
जो फूटती है तुम्हारी देह से और 
समाती है मेरी रूह में......

Wednesday, November 18, 2015

और कमला मर गयी


कमला के आदमी ने कमला के गाल सुजाये
खींचा पटका और घर से निकाल दिया 
इसने देखा , उसने देखा , सबने देखा
मैंने भी देखा 

सबके कानों में एक साथ गांधीजी चिल्लाये 
" बुरा मत देखो "
हम सब अपनी आँखों पर हाथ रखकर घर लौट गए 

कमला रोती रही रातभर गली के कुत्तों के साथ
मोटी मोटी गालियां बकती रही अपने घर की देहरी के बाहर 
इसने , उसने , सबने सुनीं 
मैंने भी सुनीं 

गांधी जी फिर हमारे कानों में फुसफुसाए
" बुरा मत सुनो "
हम सब ने खिड़कियाँ बंद कीं और सो गए 

कमला फिर कभी नहीं दिखी 
दो दिन बाद एक अनजान औरत की मौत पुलिस फ़ाइल में दर्ज़ थी 
शिनाख्त पर कोई कमला निकली 

पुलिस मोहल्ले भर में पूछती फिरी 
" क्या हुआ था ? कमला के पति का चलन कैसा है ?"
मूर्ख हवलदार .. क्या जाने गांधी की शिक्षा 

हम किसी के लिए बुरा नहीं बोलते ... गांधी बुरा मान जाते हैं 
हमने अपने मुंह पर हाथ रख लिया 

जांच में कमला की मौत नामालूम वजहों से आत्महत्या निकली 

हमने अगले दिन गांधी प्रतिमा पर फूल चढ़ाये 
ऐनक और चरखे को कवर फ़ोटू बनाया 
तीन बंदरों को शुक्रिया कहा 
इस तरह हमने दो अक्टूबर मनाया