Sunday, June 22, 2014

लेने देने की साड़ियां

आप शादियों के सीज़न में किसी भी साड़ी की दुकान
पर चले जाइए ... आपके यह कहते ही कि " भैया ,,साड़ियाँ दिखाइये " दुकान वाले का पहला प्रश्न होगा कि " लेने देने की दिखाऊं या अच्छे में दिखाऊं ?"

मतलब इस प्रश्न से इतना तो सिद्ध हो गया कि लेने देने की साड़ियाँ अच्छी नहीं होतीं ! 

अब अगर आप वाकई में लेने देने की साड़ियाँ ही खरीदने गए हैं तो दुकानदार का अगला प्रश्न होगा " कितने वाली दिखाऊं ?" उसके पास अस्सी रुपये से लेकर ढाई सौ तक की रेंज मौजूद है !

एक कुशल स्त्री अस्सी से लेकर ढाई सौ तक की सभी साड़ियाँ पैक कराती है ! घर जाकर वो पिछले बीस वर्ष का बही खाता खोलती है ! सबसे पहले उसे ये देखना है कि किस किस ने कब कब उसे कैसी साड़ियाँ दी हैं ? "अब बदला लेने का सही वक्त आया है .. जैसी साड़ी तूने मुझे दी थी न उससे भी घटिया साड़ी तुझे न टिकाई तो मेरा नाम भी " फलानी " नहीं !" 
अगर दस साल पहले उस महिला ने सौ रुपये की साड़ी दी थी तो बदला लेने में दस साल बाद अस्सी की साड़ी पचहत्तर में लगवाकर उसके मुंह पर मारी जाती है !

अगर किसी रिश्तेदार के घर का लड़के को जमाई बनाने का सपना संजोये बैठी हो तो उसे ढाई सौ की साड़ी दी जावेगी , अच्छी पैकिंग में, जिसमे थर्माकोल के मोती भी इधर उधर लुढ़क रहे होंगे और दस का करकरा नोट भी सबसे ऊपर शोभा बढ़ा रहा होगा!

ये भी खासी ध्यान रखने की बात होती है कि कहीं ऐसा न हो कि दो साल पहले जिस भाभी ने जो साड़ी दी थी , वापस उसी के खाते में न चली जाए ! और अगर चली भी जाए भूल चूक से तो इन लेने देने की साड़ियों के कलर , कपडे और डिजाइन में इतना साम्य होता है कि दो दिन पहले दी हुई साड़ी भी अगर वापस मिल जाए तो किसी को संपट नहीं पड़ती ! घचपच डिजाइन , चट्ट पीले पे चढ़ता झक्क गुलाबी और भूरे भक्क पर चढ़ाई करता करिया कट्ट रंग !

सबसे मजेदार बात यह है कि सब जानते हैं कि लेने देने की साड़ियाँ कभी पहनी नहीं जातीं ! चाहे अस्सी की हों चाहे ढाई सौ की !ये हमेशा सर्क्युलेशन में ही रहती हैं ! ये रमता जोगी , बहता पानी हैं ! ये सच्ची यायावर हैं ! ये वो प्रेत हैं जो कभी इसे लगीं , कभी उसे लगीं ! इधर से मिली , उधर टिकाई और उधर से मिली इधर टिकाई !

एक बेहद कुशल गृहणी यह पहले से पता करके रखती है कि जो साड़ी उसे मिलने वाली है , वह किस दुकान से खरीदी गयी है ! वह बेहद प्रसन्नता पूर्वक उस साड़ी को स्वीकार करती है , बल्कि उसके रंग और पैटर्न की तारीफ़ करती है और जल्द ही फ़ाल , पिकू करवाकर पहनने की आतुरता भी दिखाती है और अगली दोपहर ही उसे दुकान पर वापस कर दो सौ रुपये और मिलाकर एक अच्छी साड़ी खरीद लाती है !

और ये भली स्त्रियाँ इन लेने देने की साड़ियों को भी छांटती , बीनती हैं और बाकायदा पसंद करती है , ! साड़ी भी मुस्कुराती हुई कहती है " हे भोली औरत क्यों अपना टाइम खोटी कर रही है ? जिस पर हाथ पड़ जाए वही रख ले ! क्या तू नहीं जानती कि हम तो सदा प्रवाहमान हैं , हम हिमालय से निकली वो गंगा हैं जो किसी शहर में नहीं टिकतीं , अंत में हमें किसी के घर की काम वाली बाई रुपी समुद्र में जाकर विलीन होना है "
इन साड़ियों का अंतिम ठौर घर में काम करने वाली महिलायें होती हैं जिन्हें होली दीवाली के उपहार के रूप में इन्हें दिया जाता है और उसमे भी अलमारी में रखी पंद्रह साड़ियों में से सबसे पुरानी की किस्मत जागती है और वह सबसे पहले अपनी अंतिम नियति को प्राप्त होती है !

Thursday, June 19, 2014

ये बेचारे पुष्प चुराने वाले

कोई कहता है " सुबह सुबह घूमने जाते हैं लगे हाथ टॉमी को घुमाना भी हो जाता है " ! कोई कहता है " सुबह सुबह घूमने जाते हैं लगे हाथ दूध पैकेट भी ले आते हैं !"
कोई कहता है "सुबह सुबह घूमने जाते हैं लगे हाथ बच्चे को स्कूल बस में बैठा आते हैं !"

मगर हर मोहल्ले में एक ऐसा भक्तों का समूह भी होता है जो कहता है " सुबह सुबह लोगों के घरों से फूल तोड़ने जाते हैं तो लगे हाथ घूमना भी हो जाता है "
सुबह सुबह थोड़ी वृद्ध महिलाओं और पुरुषों का ये गैंग हाथ में नीली पीली पन्नी लेकर घूमता सहज ही देखा जा सकता है ! फूलों की खोज में चप्पल चटकाते ये नर नारी पूरे मोहल्ले में सबसे पहले जागने वाले प्राणी होते हैं !हर घर की बाउंड्री के बाहर झांकते फूल घर मालिक के नहीं बल्कि इनके होते हैं ! जिनपर ये साधिकार धावा बोलते हैं ! लोगों की बाउंड्री के बाहर उचक उचककर इनकी एड़ी और पंजे बिलकुल फिटफाट रहते हैं ! अगर घर खुला मिल जाए तो एक बार दायें बाएं देख लेने के बाद घर के अन्दर लगे फूलों का नास मिटाने में इन्हें कोई गुरेज नहीं होता !

ये "पुष्प चोर " बिलकुल " माखन चोर " की तरह ही होते हैं , भोले , निष्कपट , मासूम ! अगर इन्हें रोक या टोक दिया जाए तो जाने किन किन भगवानों का वास्ता देकर ये फूल तोड़ने को जस्टिफाय करते हैं !
" ये लो ..अब ये जमाना आ गया है कि लोगों को भगवान् के लिए दो फूल तोड़ने में भी कष्ट हो रहा है ! घोर कलयुग है !कौन सा हम खुद के लिए ले रहे हैं "

चोरी चकारी के फूलों से घर के प्रत्येक भगवान का श्रृंगार किया जाता है ... एक एक मूर्ति पर बीस बीस फूल उड़े
ल दिए जाते हैं , माने कि पूरी पन्नी झड़ा कर फिर से कील पर उलटी करके टंग जाती है ! स्वर्गलोक में धनवंतरी जी की डिमांड बढ़ गयी है !एक भगवान की आँखों में गेंदे की डंडी गुच गयी है , एक को बारामासी की गंध से एलर्जी है , एक भगवान की नाक कनेर का फूल फंस जाने से जाम हो गयी है , एक के कान में गुडहल का लम्बा सा तंतु पिछले दस दिन से ठुंसा पड़ा है ! शंकर जी की जटाओं में तो न जाने कितने फूलों के पराग झड झड कर जम गए हैं जिससे शिव जी मारे डैंड्रफ के सर खुजा खुजा के परेशान हैं , एक दिन धतुरा शंकर जी की जगह किसी देवी जी पर टपक गया , देवीजी तीन दिन तक मूर्छा में रहीं ! स्वर्गलोक में पिछले कई वर्षों से प्रस्ताव लंबित है कि मूर्तियों को भी झापड़ देने की शक्ति प्रदान की जाए मगर इस भय से कि कहीं भक्तों में लोकप्रियता कम न हो जाए , सर्व सम्मति नहीं बन पा रही है !

एक आंटी जी चलीं तो शर्मा जी के बगीचे से बड़ी जतन करके लगाया रजनीगंधा तोड़कर चलती बनीं ! शर्मा जी रात को गमला देखकर सोये थे , सुबह फूल गायब पाकर इतने शोकाकुल हुए कि मिसेज़ शर्मा को तुरंत शोक की सफ़ेद साड़ी पहन कर उनके साथ बैठकर बुक्का फाड़कर रोना पड़ा ! सच्ची अर्धांगिनी को असमय विलाप में भी निपुणता हासिल होना आवश्यक है !

अगले दिन शर्मा जी सुबह पांच बजे से उठकर पहरा देने बैठ गए , दो दिन चोरी नहीं हुई ! तीसरे दिन कोई भक्तन सुबह साढ़े चार बजे आकर डहेलिया पर हाथ साफ़ कर गयी ! भक्तन फूल को देखकर बोलीं " क्या फूल है " और डहेलिया का पौधा शर्मा जी को देखकर बोला " क्या फूल है !"

इस गैंग की एक विशेषता यह भी प्रकाश में आई है कि ये सम्माननीय सदस्य अपने घरों के फूलों की एक पंखुड़ी भी नहीं तोड़ते !
इनके खुद के घरों के लिए इनका फंडा है कि " रंग आँखों के लिए , बू है दिमागों के लिए , फूल को हाथ लगाने की ज़रुरत क्या है "
मगर दूसरों के घरों के फूलों के लिए इनका फंडा है कि " तेरे चरणों में हे प्रभु , मैं फूल चढाने आई हूँ , चंपा,बेला और केतकी, सारी बगिया ले आई हूँ "


पप्पू की प्रेयसी गुल्ली ने एक दिन पप्पू से कहा " जानू , मुझे फूल बहुत पसंद हैं , क्या तुम मुझे रोज़ एक फूल भेंट नहीं कर सकते ?" गुल्ली का "फूल " से आशय बाज़ार में बिकने वाली सुर्ख लाल गुलाब की कली से था जिससे वो अपनी सखियों पर इम्प्रेशन जमा सके !
क्यों नहीं बेबी ..कल से ऐसा ही होगा !
कह तो गए पप्पू ..मगर बाज़ार में गुलाब की कली की कीमत सुनकर सटन्ने छूट गए ! तीन दिन तक तो अपने गुटका पान का पईसा गुलाब पर न्योछावर किया मगर चौथे दिन से पप्पू भी अपनी दादी से दीक्षा लेकर फूल चोर गैंग के नवीनतम सदस्य बन गए और मेहता जी के घर से फुल साइज़ का गेंदा ले जाकर गुल्ली की चुटिया में लगाया !गुल्ली ने गेंदा देखकर थोबड़ा सुजाया , पर बोली कुछ नहीं ! सोचा " शायद दुकान में माल नहीं आया होगा "
उसके अगले दिन एक देसी गुलाब , दो बारामासी और चार चांदनी के फूल पप्पू ने गुल्ली को भेंट किये ! अब तो गुल्ली फैल गयी , लेने से साफ़ इनकार कर दिया !
पप्पू तो फिर पप्पू हैं ..समझाया " देखो बेबी , इश्क में महबूब का दर्ज़ा ईश्वर के बराबर होता है ! कभी ईश्वर को बाज़ार से खरीदी कलियाँ चढ़ाई जाती हैं ? इसीलिए तुम्हारे लिए ताज़े फूल लेकर आता हूँ ! तुम मेरी प्रेम देवी हो ! "

गुल्ली पगलिया थी ..मान गयी और खुश भी हो गयी !ये प्रेम देवी वाली बात से सहेलियों पर ज्यादा अच्छा इम्प्रेशन पड़ेगा ! पप्पू चालू चपोतरा था , फ्री फ़ोकट में काम निकाल कर सीटी बजाता निकल लिया !

आइये हम सब मिलकर इस गैंग को एक सौ आठ बार सादर नमस्कार करें! :) :) :)
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Wednesday, April 16, 2014

अजी सुनते हो " भग गयी कलमुंही "

हिन्दुस्तान में घरवालों की मर्ज़ी के विरुद्ध किये गए प्रेम विवाह के लिए लड़के लड़की आवागमन के लिए बैलगाड़ी से लेकर हवाई जहाज तक किसी भी साधन का प्रयोग कर लें , वो हमेशा भागते ही हैं ! भागे बिना प्रेम विवाह का कोई मोल नहीं ... दो कौड़ी का है वो प्रेम विवाह जिसमे लड़का ,लड़की भागें ना और भागते भागते घर वालों , रिश्तेदारों , दूर के रिश्तेदारों और बिरादरी की नाकें काटकर अपनी जेबों में न भर ले जाएँ !भागने और नाक कटने का चोली दामन का साथ है !जिनकी नाकें रिश्वत लेते पकडे जाने में , लड़की छेड़ देने में नहीं कटतीं , लड़की के भागते ही नाक अपने आप चेहरे से उतरकर लड़की की जेब में भरा जाती है ! साथ ही परिवार की इज्जत जो लाखों करोड़ों की थी , लड़की के भागते ही एक क्षण में इज्जत का अवमूल्यन होता है और वो दो कौड़ी की रह जाती है ! माने भागना केवल लड़के लड़की का भागना नहीं है , इसके साथ घर का बहुत कुछ भागता है !

इस उच्च परंपरा के कारण लंगड़े , अपंग , अपाहिज लड़के लड़कियों को भी भागा हुआ कहलाने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ है !कई अपाहिज तो लोगों के ताने सुन सुनकर इतने उकता गए कि आनन् फानन में जो प्रेमी /प्रेमिका तत्काल उपलब्ध हुए, उसी के साथ रातों रात "भाग गए !" वो बात अलग है कि वे सौ मीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से भागे थे ! भागना तो भागना ही कहलाता है !
भागना वैसे कोई छोटा मोटा काम नहीं है , एक अत्यंत साहसिक कार्य है ! इस यथोचित साहस के अभाव में कई बार लड़के लड़कियों की ऐसी कम तैसी हुई है ! कई दफा लड़की अपना झोला झंडा लेकर आधी रात घर से निकल पड़ी और छज्जू की दूकान के पीछे सवेरे के पांच बजे तक खडी रही मगर मजनू की फूंक सरक गयी और वे नहीं पधारे! लड़की ने पांच बजे घर वाकई में भागकर दोबारा बिस्तर में घुसकर अपने प्राण बचाए या घर में घुसती पकड़ी गयी और खूब रैपटे घले ! कई बार मजनू मियाँ मोटरसायकल लेकर लड़की के मोहल्ले के चक्कर काटते रहे और लड़की खर्राटे भारती रही !कई बार मजनू भाई को लड़की के इशारे पर ही हवालात दर्शन को पहुंचा दिया गया !

ये भी गौर करने वाली बात है कि जब कोई दौड़ने के लिए भागता है तो उसे " भागना " कहते हैं लेकिन जब प्रेमी भागते हैं तो वे "भागते" नहीं हैं बल्कि "भगते " हैं ! "भग गयी कुलच्छिनी घर से "

सारी बचपन से सीखी हुई विद्या , कशीदाकारी , तरह तरह के कबाब मेकिंग की सिखलाई आदि आदि सारे लच्छन अग्नि के हवाले करके "भगती" है एक कन्या !

एक और ख़ास बात है कि हर प्रकार की कन्या "भग" सकती है! जिसके चाल चलन के बारे में पूरे मोहल्ले को उसके पैदा होने के दिन से ही शक होता है वो भी और जिसके मुख से बीस वर्ष की अवस्था तक मोहल्ले ने हाँ ,हूँ के सिवाय कुछ न सुना हो वो भी " भगने " में निपुण हो सकती है !

कई सालों बाद जब सारे तूफ़ान शांत हो चुके होते हैं ! कुलच्छिनी कन्या और आवारा लफंगा छोरा घर के बहू और दामाद बन चुके होते हैं , तब एक दिन सारे लच्छन कन्या को वापस कर दिए जाते हैं ! तब ये "भागना " परिवार के लिए रिश्तेदारों द्वारा तानों के रूप में मौके बेमौके छोड़े जानी वाली फुलझड़ी के रूप में और लड़का लड़की के लिए " एडवेंचर " के रूप में बकाया रह जाता है
!