Wednesday, August 20, 2008

ठसाठस भरी बस में तीन घंटे

बड़े दिनों बाद इस बार बस में सफ़र करने का अवसर प्राप्त हुआ....ब्लॉग बनाने के बाद से एक फायदा ज़रूर हो गया है! अच्छा अनुभव हो तब तो अच्छा है ही...ख़राब हो तो भी एक सुकून मिलता है की चलो एक पोस्ट का मसाला मिल गया! कहने का मतलब ये कि इस ब्लॉग ने मुश्किलों में भी एक आशा की किरण तो दिखा ही दी है!खैर सीधे मुद्दे पे आते हैं....

हुआ यूं कि इस बार रक्षाबंधन पर सौभाग्य से तीन दिन की छुट्टी मिल गयी तो घर चले गए!सबसे बड़े संकट की बात ये होती है जब घर जाना होता है कि भोपाल से शिवपुरी के लिए कोई ट्रेन नहीं है! झांसी या ग्वालियर तक ट्रेन से जाओ...फिर वहां से बाई रोड ही जाना पड़ता है! अब चाहे कहीं से भी जाओ रोड तो गड्डे वाली ही मिलनी है! तो भैया जैसे तैसे पहुँच तो गए शिवपुरी स्लीपर बस में....रात को सोते सुवाते! बाकी बची खुची नींद घर जाकर पूरी कर ली!लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी!18 तारीख को वापसी थी...लौटते में ग्वालियर में थोडा काम था तो सोचा ...बस से ग्वालियर चलते हैं ,वहाँ से ट्रेन से भोपाल आ जायेंगे!बस...यही सोचकर गलती कर बैठे! घर वालों ने आगाह भी किया कि त्यौहार का टाइम है...बहुत भीड़ होगी अभी! हमने मुस्कुराते हुए गर्व से अपने मित्र को जो शिवपुरी में एस.डी.ओ.पी. है, फोन लगाया और उससे दोपहर की किसी फास्ट बस में सीट बुक करवाने को कहा! मित्र ने तुंरत एक सिपाही को पाबन्द कर दिया! हम इत्मीनान से बस स्टैंड पहुंचे! सिपाही वहाँ पहले से मौजूद था! दस मिनिट में बस आई...आगे से दूसरी सीट हमारे लिए बुक थी! हमारे बाजू में एक और लड़की बैठी थी विंडो सीट पर... मन तो किया उससे कह दें कि विंडो सीट पर हम बैठेंगे मगर लिहाज कर गए और चुपचाप उसके बगल में बैठ गए! दो जनों की ही सीट थी! छोटी सी बस थी जिसमे टोटल चौबीस लोगों के लिए जगह थी! भगवान कसम... जब बैठे थे तो बिलकुल अंदाजा नहीं था कि भला आदमी ७० सवारी उस छोटी सी बस में चढाने वाला है वरना नहीं चढ़ते! बस चली....दस मिनिट बाद ही रुक गयी और फिर रुकी रही जब तक कि ठसाठस भर नहीं गयी! बैठने की जगह तो थी नहीं सो लोगों ने खड़े खड़े ही ठंसना शुरू कर दिया! दोनों सीटों के बीच कि गली में ठंसे लोग, पैरदान पर लटके लोग,बोनट पर बैठे लोग,और तो और ड्राइवर की सीट पर भी आधे बैठे लोग....बाप रे, कितने लोग! हमारी सीट के बगल में तीन लोग खड़े थे जो कि हम पर ही चढ़े चले जा रहे थे....एक दो बार मना किया कि " भैया जरा अपने भर खड़े हो लो" जब आग्रह के कोई असर नहीं हुआ तो हमने भी भाई लोगों को मुक्के मारना शुरू कर दिया! भाई लोग मुक्का खाते, एक बार पलट कर हमें देखते और पहले से भी ज्यादा मजबूती से जमे रहते!बगल वाली लड़की बार बार हमें देखती और चुपचाप आँखें बंद कर लेती....गुस्सा तो ऐसा आया कि कह दें " ऐसे नहीं चलेगा...आधी दूर तू खिड़की के पास बैठ ,आधी दूर हम बैठेंगे!" पर मालूम था ...वो नहीं हटने की!
हम भी अपनी सहन शक्ति की परीक्षा ले रहे थे!पर अब तो हद ही हो गयी....जब बेरहम कंडक्टर ने उस बस को दस किलोमीटर बाद रोककर चिल्लाना शुरू कर दिया " ग्वालियर...ग्वालियर.." उसकी आवाज़ पर भीड़ का एक रेला बाहर से खिंचा चला आया!बस में से आवाजें उठीं " अरे...अब क्या हमारी खोपड़ी पर बिठाएगा सवारी?" कंडक्टर ने बेहद संतुलित स्वर में जवाब दिया " चिंता नहीं...सबको जगह मिलेगी बैठने की" न जाने क्या बात थी उसके आश्वासन में...भीड़ संतुष्ट होकर अन्दर समा गयी!

तभी पीछे से एक औरत जो अपने बच्चे को गोद में लिए खड़ी थी, अचानक उफन पड़ी " आग लगे, धुंआ लगे, तेरी ठठरी बंधे....मुझे सीट दे, नहीं तो पैसे वापस कर दे मेरे"
कंडक्टर भी उफना " कहाँ से दे दूं सीट...मेरे पास कारखाना है सीटों का?"
महिला फिर दहाडी " तू ही तो कह रहा था कि बिठाकर ले जायेगा.."
तो सबर नहीं करेगी क्या जरा भी...अभी बस खाली होगी तो तू ही पसर जाना सीट पर"
जैसे तैसे महिला शांत हुई...पर बड़ी देर तक अन्दर ही अन्दर बड़बड़ाती रही!


अब तक मुक्के मार मार कर हमारा मुक्का दुखने लग गया था...महिला शांत हुई तो हम उफन पड़े कंडक्टर पर " अब तू ले चल गाड़ी सीधे थाने पर..तेरा चालान कराती हूँ !परेशान कर दिया लोगों ने धक्के मार मार कर " अब कंडक्टर थोडा सीधा हुआ और तुंरत उसने फरमान जरी किया " मैडम की सीट के पास कोई खडा नहीं होगा"
थोडी देर को सब इधर उधर हो गए...लोगों को एहसास हो गया कि हम सचमुच कोई मैडम हैं! तभी एक आदमी जो धोती कुरता पहने था...उसका कुरता उड़ उड़कर हमारे चेहरे पर आने लगा....कुछ कहने ही वाले थे ..इतने में उस आदमी ने हमारे मनो भावों को भाँपते हुए कुरता अपनी धोती में खोंस लिया और कष्ट के लिए माफ़ी भी मांग ली!

इतने ही कष्ट काफी नहीं थे....अब एक सज्जन को बीडी की तलब लग आई! बड़े आराम से बीडी सुलगाई और पहला सुट्टा मारा...बदबू का भभका सीधे हमारी नाक में घुसा! हम चिल्लाये " बीडी फेंक..." किसी ने भी हमारी बात का समर्थन नहीं किया मगर कंडक्टर ने उसके मुंह से बीडी निकाली और खिड़की से बाहर फेंक दी! उस आदमी ने जलती निगाहों से हमें देखा मगर हमारी निगाहें उससे भी ज्यादा जल रही थीं!पता नहीं..कैसे लोग बीडी पीने वालों को सहन कर लेते हैं!

डेढ़ घंटे चलने के बाद मोहना नाम का स्टेशन आया...यहाँ गाड़ी दस मिनिट खड़ी होनी थी! धन्य हैं रे भारतवर्ष के लोग....खड़े खड़े भी पकोडे खाने से बाज नहीं आये!ठीक हमारे बगल में एक आदमी पकोडे का दोना भर लाया...एक हाथ से दोना पकडे, एक हाथ से खाए और बाजू वाली सीट से कमर टिकाकर खडा होए! तीन चार पकोडे ही खाए होंगे की एक दचका लगा और दोना उछला और पकोडे बिखर गए...हर आदमी के कंधे पर या सर पर छोटा बड़ा पकोडा नज़र आने लगा! हम पर भी गिरा ..जिसे हमने तत्काल हटाया और बगल वाले के पैर पर गिरा दिया! हमने संतोष की सांस ली कि चलो इस व्यक्ति को दही बड़ा अथवा समोसा विथ चटनी की इच्छा नहीं जाग्रत हुई वरना क्या हाल होता! हमने देखा हमारे अलावा किसी और के माथे पर कोई शिकन तक नहीं थी..मानो पकोडे उछलना एक अत्यंत सामान्य घटना हो!

अब तक सर में भारी दर्द शुरू हो गया था...तभी कंडक्टर ने किसी से बात की जिससे हमें मालूम हुआ की इस बहादुर आदमी को अभी दो बार और शिवपुरी से ग्वालियर तक ऐसे ही लटक कर जाना है! ११२ किलोमीटर का सफ़र हमने तीन घंटे में पूरा किया! जैसे ही ग्वालियर बस स्टैंड पर पहुंचे...नीचे उतरे तभी बगल से धप्प की आवाज़ आई...हमने तत्काल अपनी गिनती सुधारी! उस बस में ७० नहीं अस्सी आदमी थे...दस आदमी छत की शोभा भी बढा रहे थे! उतारते ही कंडक्टर ने पूछा " मैडम...तकलीफ तो नहीं हुई न?"
हमने अपने होंठ फैलाकर मुस्कराहट बनायीं और कहा " नहीं भैया..बिलकुल नहीं" और आगे बढ़ लिए!

इस पूरी यात्रा पर चिंतन करने के बाद हमने कुछ निष्कर्ष निकाले जो निम्नानुसार हैं..
१- भारतीय इंजीनियर बहुत दूरदर्शी होते हैं! चौबीस सवारी की क्षमता वाला वाहन उन्हें बनाने को दिया जाये तो वे परिस्थितियों का बुद्धिमत्ता पूर्ण आंकलन कर असीमित क्षमता वाला वाहन तैयार करते हैं ..वो भी दी गयी लागत में!
२- भारतीय लोग कठिन से कठिन परिस्थितिओं में भी खाना पीना नहीं त्याग सकते! सलाम है उस जीवट इंसान को जिसे भीड़ में ठंसे ठंसे भी चाट पकोडे खाने की सूझ सकती है!
३- भारतीय बस का कंडक्टर बहुत वीर पुरुष होता है जो बार बार लगातार ऊबड़ खाबड़ सड़क पर सफ़र करके भी अपनी ऊर्जा नहीं खोता और इस प्रकार सभी को वीर बनने को प्रेरित करता है!
आशा है इस प्रसंग से आप सभी को भी बस में सफ़र करने के लिए आवश्यक बल और प्रेरणा प्राप्त हुई होगी...धन्यवाद!

54 comments:

Lovely kumari said...

hamara bhi aisi paristhition se samana huya hai.para aajkal to hum bhid dekhkar hi khisak lete hain,bhale hi uske bad 2-3 padaw pahle se jakar gadi pakadani pade.


kafi rochak tha aapka ytra vivran.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

यात्रा करने का असली मजा लिया आपने :) रोचक वर्णन

Sanjeet Tripathi said...

वाकई जबरदस्त!

लेखन कला तो आपकी शानदार है, कायल कर दिया है आपने।

पर यह समझ नही आया कि पल्लवी के लिखे पर खुद पल्लवी ने कैसे कमेंट कर लिया ;)

pallavi trivedi said...

अरे संजीत जी...वो कमेन्ट ,मैंने नहीं कुश ने किया था!दरअसल मेरे सिस्टम में प्रोब्लम होने से कुश को ही पोस्ट करने को कहा था तो उसने गलती से मेरे ही अकाउंट से कमेन्ट पोस्ट कर दिया!

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत शानदार पोस्ट...

संजीत की बात से तो हम हमेशा ही सहमत रहते हैं लेकिन इस बात से डबल सहमत हैं. पढ़ने के बाद आधा घंटा हंस लिए. तीन बार पढ़े और अब जाकर टिप्पणी करने की हालत में पंहुचे हैं. पोस्ट और इस यात्रा पर आपके निष्कर्ष पर तो खूब हँसे. रही-सही कसर आपके नाम से की गयी (या फिर डिलीट की गई) टिप्पणी ने पूरी कर दी.

पल्लवी जी, आपकी लेखन शैली अद्भुत है.

राज भाटिय़ा said...

भई कमाल हे आप ने उस बस का आंखो देखा हाल ज्यो का त्यो लिख दिया,इतना मजा तो हमे भारतीया फ़िल्म देखने मे नही आता जितना मजा आप की बस मे आ गया,
धन्यवाद

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

माफ़ कीजिएगा पल्लवी जी आपके आई डी से ही पोस्ट कर दिया कमेंट.. लेकिन अब तो भूल गया क्या किया था.. इतना कह सकता हू .. पढ़ना शुरू किया तब जो चार्म था वो अंत तक बरकरार रहा.. यू कहिए की हंसते हुए लोटपोट हो गया.. वाकई आपकी लिखावट लाजवाब है..

अनुराग said...

आपके निष्कर्ष बिल्कुल वाजिब है ......ओर कंडक्टर की वीरता पे किसी को शक नही है.......ड्राईवर की धर्य क्षमता को आप मिस कर गयी.....कभी किसी ने एक सुझाव दिया था (एक पत्रिका के संपादक ने ) की विनम्रता का अगर अलग से टैक्स लगा कर भारतीयों को उसी हिसाब से सेवा दी जाये ..सोचिये बिजली वाला सर झुककर मुस्करा कर आपके बिगडे मीटर की फ़ौरन जांच करने आता है ओर मुस्करा कर चला जाता है....खैर छोडिये असली निष्कर्ष यही है
.दरसल हम हिन्दुतानी ही महान है .....वीर है......

Rohit Tripathi said...

Bahut hi mazedaar safar raha pallavi ji.. shabdo ko padh ke to aisa lag raha tha ki jaise yeh hamare sath hi hua hai...

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

बढ़िया अनुभव साझा किया, शुक्रिया!

Dr. Chandra Kumar Jain said...

विषय चयन
अनुभव की साझेदारी
और
प्रस्तुति शैली, सभी दृष्टि से बेजोड़ .
========================
बधाई
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

रंजन गोरखपुरी said...

वाकई बहुत बढिया और रोचक वर्णन!! आपके निष्कर्ष बिलकुल दुरुस्त हैं...

हम पारादीप से कटक तक की बस यात्रा (80 km, 5.5 hrs) की हिम्मत अभी तक नहीं जुटा पाए हैं, पर आपको पढ कर कुछ हौसला बढा है!! :)

योगेन्द्र मौदगिल said...

wah..
बस भी कमाल की थी तुम भी कमाल के
ले आए खुद को साबुत-सुथरा निकाल के
wah..wah..

Arvind Mishra said...

अफसरों को भी बीच बीच में भारत के आम आदमीं की मुश्किलों से इसी तरह रूबरू होते रहना चाहिए -खैर आपको दाद दी जानी चाहिए आपने बस में यात्रा पूरी कर ही ली .ऐसी मुसीबत में फसाने पर हम भी गांधी बाबा की याद करते हैं -गांधी क्लास निर्धारण तो उन्हीने किया था .....

उमेश चतुर्वेदी said...

DSP Sahiba,
Vakai aap mahan hai ki itne rutbedaar post par hote hue bhi aapne aisi yatra ki.Lekin kya aapne socha ki aapke mathato ko aisi buso ke overloading me chalan karna chahiye, lekin vo nahi karte.Aur aapne bhi aisa kaha karaya?

जितेन्द़ भगत said...

आपके धैर्य की कद्र करता हूँ मैं। आह से उपजा गान-सा भान हुआ मुझे ये वर्णन।

P. C. Rampuria said...

सुंदर और रोचक लेखन के लिए बधाई !
निरंतर प्रवाह बना रहा ! ऐसा लगा की
पाठक (हम) भी यात्रा में साथ चल रहे हैं !
अद्भुत ! शुभकामनाएं !

शोभा said...

इसी प्रकार अनुभव बाँटती रहें।

vipinkizindagi said...

शानदार पोस्ट......

Sarvesh said...

बहुत रोचक लिखा है आपने. अंत तक रोचकता बरकरार रही. लेकिन सोचिए उन महिलाओं के बारे मे जिन्हे अक्सर आना जाना होता होगा ऐसे बसो मे.

Manish Kumar said...

ye aapki lekhni ka hi kamaal hai ki aapki dukh bhari yatra ke bare mein padh kar bhi maza hi aaya . aaisi aap beeti sunati rahein.

Lavanyam - Antarman said...

पल्लवीजी,
आपके सहयात्री ने पकौडे खाने की इच्छा की वहाँ तक आते आते
हमेँ बहुत हँसी आयी !! ;-))
सच, भारतवर्ष के लोग कितने सहनशील हैँ !
..शिव भाई के
"लाल सलाम वाले कामरेड "
क्यूँ नहीँ बन जाते लोग ?
और एक और बस
क्यूँ नहीँ चलाते ये लोग ?
काश !अब भी सुधर जायेँ ..
लिखा बहुत बढिया आपने :)
- लावण्या

Udan Tashtari said...

अति प्रेरक प्रसंग!! बड़ी सीख मिली-भगवान न मजबूर करे बस में चढ़ने को!!

विंडो सीट पर हम बैठेंगे मगर लिहाज कर गए -पुलिस वालों की नाक कटा दी लिहाज करके. :)

रश्मि प्रभा said...

hahaha,mazedaar bus yaatra,jisse dur rahna bhala......

अभिषेक ओझा said...

सब तो ठीक पर हमें ३ बातें याद रही:
1. ख़राब हो तो भी एक सुकून मिलता है की चलो एक पोस्ट का मसाला मिल गया!
2. बगल के सीट पर लड़की बैठे इसके लिए कोई व्रत त्यौहार करना होता है क्या?
3.आपको तो मैडम के विशेषाधिकार से अलंकृत हैं... हमारा क्या?

:-)

pallavi trivedi said...

अभिषेक जी...आपकी दो बातों के जवाब!
१- बगल में लड़की बैठे इसके लिए ज्यादा मशक्कत करने की ज़रूरत नहीं है...किसी दिन साडी पहन कर ,घूंघट करके बस में चले जाइये! महिला सीट मिल जायेगी! :)
२- अगर आप चाहें तो आज से हम आपको अभिषेक मैडम कहना शुरू कर देते हैं! दुखी न हों :)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बेहद रोचक यात्र वृत्तान्त। उत्तर भारत के प्रदेशों में सब जगह कमोबेश यही हालत है...। एक बार गोरखपुर से इलाहाबाद की बसयात्रा के दौरान मुझे इससे थोड़ा अलग अनुभव हुआ था। सरकारी बस में यात्री नदारद थे लेकिन ड्राइवर व कण्डक्टर ऐसे ही वीर पुरुष थे। यहाँ देखें।

कुमार मुकुल said...

वाह पकौड़ा प्रकरण पर हंसते-हंसते बुरा हाल था,दिल्‍ली की प्राइवेट बसों की हालत अलग नहीं, हां पकौडा खाने भर फुरसत नहीं यहां के लोगों केा,जिस तरह लिखते हुए अपना मनोविज्ञान आप सामने रख देती हैं और अपनी गडबडियां भी दिखा जाती हैं वही आपके लेखन की ताकत है

अभिषेक said...

बहुत बहुत बहुत बहुत मज़ा आया॥
बहुत ही अच्छा लिखा है पल्लवी आपने, पढ़ते पढ़ते हंस रहा था!
और बात भी बिल्कुल ही सही कही आपने, ऐसे कई सारे मेरे भी अनुभव हैं, बस के, ट्रेन के, ऑटो के! बस प्लेन में ही ये नहीं हुआ.

मीत said...

apne sath sath aone bhi hame bhi us yatra ka anubhav kara diya..
jo bhi ho acha laga...
jari rahe..

Pragya said...

अरे शुक्र है कि बात पकोडों तक ही सिमित रही. हमने तो ग्वालियर से भिंड (नानी के घर) जाते हुए १-२ बार बछो की उल्टियां भी झेली हैं.
अब सब सोचेंगे कि बताना जरूरी था क्या?? पर क्या करें, काबू नही रहा ख़ुद पर. इतनी जीवंत पोस्ट पढ़कर यादें ताज़ा हो गयीं...

Rajesh Roshan said...

अद्भुत शैली में लिखा गया एक बेहतरीन पोस्ट। इतनी अच्छी लगी कि अपने एक दोस्त को मेल कर दिया.. । रही बात यह सारे वाक्ये को तो भारत देश इसी सब बातों के लिए जाना जाता है कि आपके और हमारे जैसे ब्लागर लिखते लिखते थके जाएं लेकिन भारत की विविधता खत्म नहीं होगी। कभी भारत के ट्रैफिक व्यवस्था पर गौर किजिएगा आपको विश्वास हो जाएगा कि कहीं भगवान रहते हों या नहीं रहते हों.. भारत में तो जरूर रहते हैं।

एक बात और पूछनी थी, आप भोपाल की डीएसपी हैं ना!? मेरे एक दूर के भैया अभी भोपाल के एसएसपी बने हैं नाम है उनका जयदीप..।

महामंत्री-तस्लीम said...

कॉलेज लाइफ के दौरान नगर बसों में मैंने भी कई बार ऐसी यात्राएं की हैं।
सही मायनों में कहें तो भारत की अधिकांश जनता का यही यथार्थ है।

हर्षवर्धन said...

बड़ा ही प्रेरक यात्रा विवरण है। आपका उत्साह भी काबिलेतारीफ है।

केतन कनौजिया said...

kya baat hai pallavi ma'am ... khoob andaaz... :)

महेंद्र मिश्रा said...

post me nikarsh bahut sateek hai . badhiya.

मुकुंद said...

पल्लवी, आप अच्छा लिख रही हैं. धार को बनाए रखिएगा. और मजा आएगा. मुकुंद, पत्रकार, चंडीगढ़
09914401230

शहरोज़ said...

aapne shivpuri-gwaliar ki dastaan byan ki.
dilli mein bhi bason ki yaatri ise kam dushkar nahi hai.

aapmein vishay ko pakadne ka vivek aur likhne ki urja gazab ki hai, ye to manna hoga.

P. C. Rampuria said...

परिवार एवं इष्ट मित्रों सहित आपको जन्माष्टमी पर्व की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं ! कन्हैया इस साल में आपकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करे ! आज की यही प्रार्थना कृष्ण-कन्हैया से है !

यारा said...
This comment has been removed by the author.
यारा said...

wao!!

कितना सुंदर लग रहा है
तुम्हारा ब्लॉग पल्लवी........



अगली दफा कभी जाना हो तो
शिवपुरी के लिए सीधे कम्पू से बैठा करो
वहां कुछ ट्रावेल्स अच्छे हैं......

बहरहाल मैं तो ब्लॉग के ताजे लेआउट की बधाई देने आया था जी......

समीर यादव said...

प्रथमतः आपका आभार कि आपने ना केवल मुझे add किया अपितु
मेरे निर्माणाधीन ब्लॉग का visit कर पोस्ट्स पर अपने विचार
दिये....!!!
आपके एक अलहदा व्यक्तित्व से परिचय हुआ या
यूँ कहे कि दूसरे पहलू से ..........अच्छा है.

पुलिस में अपनी एक अलग आदत को पाल रखना आवश्यक है
यह व्यवसाय एवं मन दोनों को संबल देता है.

कुछ अहसास .....में बहुत कुछ है.!!!!
यात्रा संस्मरण सहज है...सम्प्रेशानीय है.

अभी इतना ही....
समीर....

Hari Joshi said...

लगता है आपका बस में पहला सफर था। वैसे मैं सोचता हूं कि आपको देश में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की हालत का अंदाजा बेहतर होना चाहिए क्योंकि आपके विभाग के सहयोग के बिना तो आेवरलोडिंग हो ही नहीं सकती।
अब चलते-चलते बस कंडक्टरों पर एक जुमला-
आपने सोचा है कि चलती हुई खचाखच भरी बस में कंडक्टर सवारियों को टिकट कैसे बांट आता है। बिल्कुल उसी तरह जैसे मुझ जैसे ब्राह्मण के ठसाठस भर चुके पेट में मिठाई अपनी जगह बना लेती है।

राज भाटिय़ा said...

जन्माष्टमी की बहुत बहुत वधाई

ललितमोहन त्रिवेदी said...

सबसे पहले तो मेरी व्यंग रचना पर आपकी ' समालोचना ' पढ़कर मज़ा आगया ( सच कहूँ तो इसी का इंतजार कर रहा था ) बहुत बहुत धन्यवाद !आपकी रचना पर ४५ वी टिप्पणी(हो सकता है ४७ वी हो जाय)लिखने में अच्छा लग रहा है !इस ३ घंटे की यात्रा का 'आनंद' भी मैंने अभी अभी उठाया है !कंडक्टर महोदय ने ३० नंबर की सीट के ३ टिकिट काट दिए थे ,किस कौशल से सीट हासिल की होगी और उसे कितने ज़रूरी काम स्थगित कर ग्वालियर तक बचाए रखा होगा,एक शोध का विषय हो सकता है !खैर ...आपकी पोस्ट पढ़कर यात्रा की तकलीफ भी आनंद में बदल गई ! बहुत खूब !

Tarun said...

Jabardast vivran kiya hai, maja aa gaya parke......yaad aa gaye woh din jab aisi kisi bus me hum bhi tange hote thai.

नीरज गोस्वामी said...

आप की बस कथा पढ़ कर फेविकोल का विज्ञापन याद आ गया जिसमें बस के ऊपर नीचे आगे पीछे लोग बैठे/चिपके हुए हैं...पंजाब में एक बार यात्रा की थी जिसमें लोग अपनी गोद में बकरियां रख कर बैठे हुए थे...हालाँकि बात बहुत पुरानी है...
बहुत मस्त पोस्ट लगी ये आपकी... रोचकता से परिपूर्ण.
नीरज

Praveen said...

ajji medam apne kaya khoob bibran diya hai .. yatraa ka ... aapko batana chaoonga ki main shivpuri ka rahne wala hi hoon .. mene ye sab mahsoos tho kai baar kiya par .. aapne kaya khoob likha ... hai..

दीपक said...

बस का चित्रदेखा श्रद्धा उमड पडी । काफ़ी वयोवॄद्ध है,सदियो के अनुभव के निशान लिये हुये,उस पर आपलोगो ने अनावश्यक बोझ लाद दिया उसकी तो सिर्फ़ पुजा की जा सकती ह॥

Sanjeet Tripathi said...

फोटो अच्छी है नई वाली पर आप किधर गायब हो?

Sagar Chand Nahar said...

पल्लवी जी
आज सुबह आपके ब्लॉग पर आया था और तब से इस पोस्ट के पहले वाली सारी पोस्ट्स पढ़ ली। आपकी लेखनी का कायल हो गया।
आपने यह अनुभव एक ही बार लिया है, हमारा तो पूरा बचपन इस तरह वीर बनने में ही गुजरा है। :)
हमारे गाँव से भीलवाड़ा जाना होता तो निजी बस में जाना होता और उनका तो भगवान मलिक है, १०२ किमी का सफर सात घंटे में पूरा होता था। हर दसवें मिनिट में आधे किमी दूर से हाथ हिला कर बस को रुकने का इशारा कर रहे यात्री के लिये बस बीस मिनिट के लिये रुक जाती थी।
कोई थोड़ा बड़ा कस्बा आता तो चाय के बहाने बस का ड्राईवर, कंडक्टर और खलासी सब गायब हो जाते कम से कम पैंतालीस मिनिट के लिये।
उदयपुर, जोधपुर, पाली या अजमेर कहीं भी जाना हो रोड़वेज की बस में जाना होता था और उनका भी लगभग यही हाल रहता था।
आपकी यात्रा का वर्णन मजेदार रहा।
:)

॥दस्तक॥|
गीतों की महफिल|
तकनीकी दस्तक

lakhan said...

Pallavi ji hamko esha laga ki aapne hamaare jewan ki kahani likh di hai aur gam hum ghar ko jaate hain to hamko ishi tarh har baar jaana hota hai kabhi latak kar kabhi bus ki chhat par jab esha hota hai to hum bus conductor ko paisa bhi kum dete hain.
aapki kahani padte time bahut hanshi aayi aaur mere mitra bandhu puchh hi bethe ki kuchh mil gaya kya... to maine usko ye post send kar diya

vakayi aapni bahut achha likha hai

Santhosh naik s said...

यात्रा करने का असली मजा लिया आपने

Fahmida Laboni Shorna said...

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