Thursday, June 19, 2014

ये बेचारे पुष्प चुराने वाले

कोई कहता है " सुबह सुबह घूमने जाते हैं लगे हाथ टॉमी को घुमाना भी हो जाता है " ! कोई कहता है " सुबह सुबह घूमने जाते हैं लगे हाथ दूध पैकेट भी ले आते हैं !"
कोई कहता है "सुबह सुबह घूमने जाते हैं लगे हाथ बच्चे को स्कूल बस में बैठा आते हैं !"

मगर हर मोहल्ले में एक ऐसा भक्तों का समूह भी होता है जो कहता है " सुबह सुबह लोगों के घरों से फूल तोड़ने जाते हैं तो लगे हाथ घूमना भी हो जाता है "
सुबह सुबह थोड़ी वृद्ध महिलाओं और पुरुषों का ये गैंग हाथ में नीली पीली पन्नी लेकर घूमता सहज ही देखा जा सकता है ! फूलों की खोज में चप्पल चटकाते ये नर नारी पूरे मोहल्ले में सबसे पहले जागने वाले प्राणी होते हैं !हर घर की बाउंड्री के बाहर झांकते फूल घर मालिक के नहीं बल्कि इनके होते हैं ! जिनपर ये साधिकार धावा बोलते हैं ! लोगों की बाउंड्री के बाहर उचक उचककर इनकी एड़ी और पंजे बिलकुल फिटफाट रहते हैं ! अगर घर खुला मिल जाए तो एक बार दायें बाएं देख लेने के बाद घर के अन्दर लगे फूलों का नास मिटाने में इन्हें कोई गुरेज नहीं होता !

ये "पुष्प चोर " बिलकुल " माखन चोर " की तरह ही होते हैं , भोले , निष्कपट , मासूम ! अगर इन्हें रोक या टोक दिया जाए तो जाने किन किन भगवानों का वास्ता देकर ये फूल तोड़ने को जस्टिफाय करते हैं !
" ये लो ..अब ये जमाना आ गया है कि लोगों को भगवान् के लिए दो फूल तोड़ने में भी कष्ट हो रहा है ! घोर कलयुग है !कौन सा हम खुद के लिए ले रहे हैं "

चोरी चकारी के फूलों से घर के प्रत्येक भगवान का श्रृंगार किया जाता है ... एक एक मूर्ति पर बीस बीस फूल उड़े
ल दिए जाते हैं , माने कि पूरी पन्नी झड़ा कर फिर से कील पर उलटी करके टंग जाती है ! स्वर्गलोक में धनवंतरी जी की डिमांड बढ़ गयी है !एक भगवान की आँखों में गेंदे की डंडी गुच गयी है , एक को बारामासी की गंध से एलर्जी है , एक भगवान की नाक कनेर का फूल फंस जाने से जाम हो गयी है , एक के कान में गुडहल का लम्बा सा तंतु पिछले दस दिन से ठुंसा पड़ा है ! शंकर जी की जटाओं में तो न जाने कितने फूलों के पराग झड झड कर जम गए हैं जिससे शिव जी मारे डैंड्रफ के सर खुजा खुजा के परेशान हैं , एक दिन धतुरा शंकर जी की जगह किसी देवी जी पर टपक गया , देवीजी तीन दिन तक मूर्छा में रहीं ! स्वर्गलोक में पिछले कई वर्षों से प्रस्ताव लंबित है कि मूर्तियों को भी झापड़ देने की शक्ति प्रदान की जाए मगर इस भय से कि कहीं भक्तों में लोकप्रियता कम न हो जाए , सर्व सम्मति नहीं बन पा रही है !

एक आंटी जी चलीं तो शर्मा जी के बगीचे से बड़ी जतन करके लगाया रजनीगंधा तोड़कर चलती बनीं ! शर्मा जी रात को गमला देखकर सोये थे , सुबह फूल गायब पाकर इतने शोकाकुल हुए कि मिसेज़ शर्मा को तुरंत शोक की सफ़ेद साड़ी पहन कर उनके साथ बैठकर बुक्का फाड़कर रोना पड़ा ! सच्ची अर्धांगिनी को असमय विलाप में भी निपुणता हासिल होना आवश्यक है !

अगले दिन शर्मा जी सुबह पांच बजे से उठकर पहरा देने बैठ गए , दो दिन चोरी नहीं हुई ! तीसरे दिन कोई भक्तन सुबह साढ़े चार बजे आकर डहेलिया पर हाथ साफ़ कर गयी ! भक्तन फूल को देखकर बोलीं " क्या फूल है " और डहेलिया का पौधा शर्मा जी को देखकर बोला " क्या फूल है !"

इस गैंग की एक विशेषता यह भी प्रकाश में आई है कि ये सम्माननीय सदस्य अपने घरों के फूलों की एक पंखुड़ी भी नहीं तोड़ते !
इनके खुद के घरों के लिए इनका फंडा है कि " रंग आँखों के लिए , बू है दिमागों के लिए , फूल को हाथ लगाने की ज़रुरत क्या है "
मगर दूसरों के घरों के फूलों के लिए इनका फंडा है कि " तेरे चरणों में हे प्रभु , मैं फूल चढाने आई हूँ , चंपा,बेला और केतकी, सारी बगिया ले आई हूँ "


पप्पू की प्रेयसी गुल्ली ने एक दिन पप्पू से कहा " जानू , मुझे फूल बहुत पसंद हैं , क्या तुम मुझे रोज़ एक फूल भेंट नहीं कर सकते ?" गुल्ली का "फूल " से आशय बाज़ार में बिकने वाली सुर्ख लाल गुलाब की कली से था जिससे वो अपनी सखियों पर इम्प्रेशन जमा सके !
क्यों नहीं बेबी ..कल से ऐसा ही होगा !
कह तो गए पप्पू ..मगर बाज़ार में गुलाब की कली की कीमत सुनकर सटन्ने छूट गए ! तीन दिन तक तो अपने गुटका पान का पईसा गुलाब पर न्योछावर किया मगर चौथे दिन से पप्पू भी अपनी दादी से दीक्षा लेकर फूल चोर गैंग के नवीनतम सदस्य बन गए और मेहता जी के घर से फुल साइज़ का गेंदा ले जाकर गुल्ली की चुटिया में लगाया !गुल्ली ने गेंदा देखकर थोबड़ा सुजाया , पर बोली कुछ नहीं ! सोचा " शायद दुकान में माल नहीं आया होगा "
उसके अगले दिन एक देसी गुलाब , दो बारामासी और चार चांदनी के फूल पप्पू ने गुल्ली को भेंट किये ! अब तो गुल्ली फैल गयी , लेने से साफ़ इनकार कर दिया !
पप्पू तो फिर पप्पू हैं ..समझाया " देखो बेबी , इश्क में महबूब का दर्ज़ा ईश्वर के बराबर होता है ! कभी ईश्वर को बाज़ार से खरीदी कलियाँ चढ़ाई जाती हैं ? इसीलिए तुम्हारे लिए ताज़े फूल लेकर आता हूँ ! तुम मेरी प्रेम देवी हो ! "

गुल्ली पगलिया थी ..मान गयी और खुश भी हो गयी !ये प्रेम देवी वाली बात से सहेलियों पर ज्यादा अच्छा इम्प्रेशन पड़ेगा ! पप्पू चालू चपोतरा था , फ्री फ़ोकट में काम निकाल कर सीटी बजाता निकल लिया !

आइये हम सब मिलकर इस गैंग को एक सौ आठ बार सादर नमस्कार करें! :) :) :)
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7 comments:

प्रतिभा सक्सेना said...

बहुत बढ़िया चित्रण ऐसाही होता है ,हम भी भुगते बैठे हैं - और तो और, उन्हें सवालाख तुलसी दल चढ़ाना है हमारी सारी तुलसी झंखाड़ रह गई!

सागर said...

कितना सुन्दर लिखती हैं आप ! हरफनमौला टाइप। लिखा कीजिये लगातार।

सागर said...

फिर जैसे उनके दिन बहुरे एक दिन हिंदी ब्लॉग के भी बहुरें। सब ख़ुशी ख़ुशी अपने घर जाएँ। जय हो

अन्तर सोहिल said...

:-)

Devender Bisht said...

hahaha ati sundar !

Ravishankar Shrivastava said...

भई, हम फूल-चोर तो नहीं, पौधा चोर जरूर हैं. जहाँ कहीं नया मनभावन पौधा देखा, उसकी कलम / जड़ के पास के अंकुर पर हमारी निगाह टिक जाती है. मालिक-मालकिन आसपास हो तो पूछ लेते हैं, वरना... :)

BS Pabla said...

हा हा हा

बिना सरगने वाले ये गैंग बड़े एक्सपर्ट होते हैं