Sunday, November 16, 2008

तेरी याद का एक पौधा



अपने दिल के गुलशन में मैंने
रोपा था तेरी याद का एक पौधा
मोहब्बत की खाद
अश्कों के पानी से
सींच सींच कर पाला बड़े प्यार से

आज बड़ा हो गया है मेरा ये पौधा
देख,कितने फूल आये हैं इसमें
और तू बिखर गयी है
फिजा में खुशबू बन के.....


जाते जाते समेट ली थी
तुम्हारी आहट मैने
अपने आगोश में,
हर शब बाहें खोल के
ज़मीन पे डाल देती हूँ इस आहट को

तुम्हे पता है न..
.मुझे अँधेरे में अकेले डर लगता है!

52 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

आज बड़ा हो गया है मेरा ये पौधा
देख,कितने फूल आये हैं इसमें
और तू बिखर गयी है
फिजा में खुशबू बन के.....
बहुत गहनतम भावाभिव्यक्ति ! शुभकामनाएं

कंचन सिंह चौहान said...

तुम्हे पता है न मुझे अकेले में डर लगता है....!

बहुत खूब

रंजना [रंजू भाटिया] said...

जाते जाते समेट ली थी
तुम्हारी आहट मैने
अपने आगोश में,
हर शब बाहें खोल के
ज़मीन पे डाल देती हूँ इस आहट को

बहुत खुबसूरत लिखा है आपने पल्लवी जी भाव बहुत अच्छे लगे इस रचना के ..

poemsnpuja said...

wow!
"हर शब बाहें खोल के
ज़मीन पे डाल देती हूँ इस आहट को"
कमाल का लिखा है. ये आखिरी पंक्ति बेहद खूबसूरत है.

Vijay Kumar Sappatti said...

Aapki ye nazm padi , dil ko kuch chooo sa gaya .

bahut hi umda lines.

great work, keep it up.

regards

vijay

please visit my blog : poemsofvijay.blogspot.com and give your comments .

thanks

Gyan Dutt Pandey said...

अच्छा लगा जी। भाव हमें भी ऐसे घेरते हैं। पर शब्द साथ नहीं देते। :(

seema gupta said...

मोहब्बत की खाद
अश्कों के पानी से
सींच सींच कर पाला बड़े प्यार से

"very loving soft felings"
Regards

अवाम said...

अपने दिल के गुलशन में मैंने
रोपा था तेरी याद का एक पौधा
मोहब्बत की खाद
अश्कों के पानी से
सींच सींच कर पाला बड़े प्यार से
बहुत ही सुंदर लाइनें हैं.
सुंदर रचना.

स्वाति said...

क्या बात है पल्लवी जी
अत्यन्त सुंदर शब्दों को भावो की माला में पिरोया है आपने । वाकई दिल को छू गई आपकी कविता।
स्वाति

"अर्श" said...

तुम्हे पता है न..
.मुझे अँधेरे में अकेले डर लगता है!


bahot khub, kya likha hai aapne bahot hi gahari bat likhi hai aapne .dhero badhai...

विवेक सिंह said...

अरे वाह आपके शब्द तो मुलायम हैं .

डॉ .अनुराग said...

जाते जाते समेट ली थी
तुम्हारी आहट मैने
अपने आगोश में,
हर शब बाहें खोल के
ज़मीन पे डाल देती हूँ इस आहट को

jaut amazing!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
superb pallavi.....

mehek said...

आज बड़ा हो गया है मेरा ये पौधा
देख,कितने फूल आये हैं इसमें
और तू बिखर गयी है
फिजा में खुशबू बन के.....
waah dil ko chu liya,bahut sundar

Akshaya-mann said...

bahut hi anokha ehesaas.......
sundar kakpna....
accha chitran hai...........
http://akshaya-mann-vijay.blogspot.com/

मीत said...

जाते जाते समेट ली थी
तुम्हारी आहट मैने
अपने आगोश में,
हर शब बाहें खोल के
ज़मीन पे डाल देती हूँ इस आहट को

तुम्हे पता है न..
मुझे अँधेरे में अकेले डर लगता है!

बहुत बढ़िया.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

तूब हो तो उजास है
अंधेरा है अकेलापन
डर लगता ही है।

जितेन्द़ भगत said...

प्रेम सहारा चाहता है, स्‍नेह चाहता है और मासूमीयत इसकी पूँजी होती है, बहुत अच्‍छी लगी ये पंक्‍ति‍याँ-
तुम्हे पता है न..
.मुझे अँधेरे में अकेले डर लगता है।

राज भाटिय़ा said...

आज बड़ा हो गया है मेरा ये पौधा....
भाई आप की कविता के लिये जितनी भी तारीफ़ की जाये कम है, बहुत सुन्दर, अति सुन्दर , दिल को छू गई.
धन्यवाद

नीरज गोस्वामी said...

आप पुलिस में होकर भी इतनी संवेदनशील रचना लिख लेती हैं...याने भविष्य में अब पुलिस से डरने की कोई जरुरत नहीं है...लाजवाब रचना...वाह...
नीरज

अभिषेक ओझा said...

बड़े प्यार से पाला गया पौधा है !

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत खूब!

मीत said...

जाते जाते समेट ली थी
तुम्हारी आहट मैने
अपने आगोश में,
हर शब बाहें खोल के
ज़मीन पे डाल देती हूँ इस आहट को

Parul said...

और तू बिखर गयी है
फिजा में खुशबू बन के.बहुत खूब

कुश said...

simply great... blog ka naam kuch ehsaas se badalkar bahut saare ehsaas rakh lijiye...

RC said...

आज बड़ा हो गया है मेरा ये पौधा
देख,कितने फूल आये हैं इसमें
और तू बिखर गयी है
फिजा में खुशबू बन के.....

Nice lines

योगेन्द्र मौदगिल said...

क्या बात है पल्लवी जी.... बेहतरीन.... साधुवाद.....

Rohit Tripathi said...

तुम्हे पता है न..
.मुझे अँधेरे में अकेले डर लगता है!

wah pallavi ji wah.. bahut sundar likhi hai kavita.. acha aapne sab ka link add kiya links mein mere blog ka link kyn nahi add kiya :-(

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

बडी सुँदर कविता और
उतने ही प्यारे चित्र हैँ
पल्लवी जी
स्नेह,
- लावण्या

Dr. Chandra Kumar Jain said...

फिजा में बिखरी हुई
खुशबू की मानिंद
निश्छल अभिव्यक्ति.
=================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

neera said...

वाह! क्या खूब कहा! एक नही कई अहसास हैं

रवीन्द्र रंजन said...

अच्छा लगा यह एहसास.

rush said...

sooo moving..dil ko touch kar gayi..esp the ending.,,magic in ur words

डा. अमर कुमार said...

बेहतर रचना

yaksh said...

bahut badiya hai,kavita padkar maja aagaya

संदीप शर्मा Sandeep sharma said...

आज बड़ा हो गया है मेरा ये पौधा
देख,कितने फूल आये हैं इसमें
और तू बिखर गयी है
फिजा में खुशबू बन के.....

सुंदर रचना...

N said...

आप बहुत अच्छा लिखती हैं, शुभ कामनायें |
- आदरसहित
नवीन शर्मा

Radhika Budhkar said...

सुंदर भावो की सुंदर शब्दों में अभिवयक्ति के लिए बधाई

Akshaya-mann said...

मैंने मरने के लिए रिश्वत ली है ,मरने के लिए घूस ली है ????
๑۩۞۩๑वन्दना
शब्दों की๑۩۞۩๑

आप पढना और ये बात लोगो तक पहुंचानी जरुरी है ,,,,,
उन सैनिकों के साहस के लिए बलिदान और समर्पण के लिए देश की हमारी रक्षा के लिए जो बिना किसी स्वार्थ से बिना मतलब के हमारे लिए जान तक दे देते हैं
अक्षय-मन

ललितमोहन त्रिवेदी said...

रेशमी एहसास की अति सुंदर अभिव्यक्ति !

Rohit Tripathi said...

kaha rah gayi aap? no new post? election duty?

New Post :- एहसास अनजाना सा.....

डुबेजी said...

aaj kai dino ke baad apka blog dekha wah kya kavita likhi hai apne badhai

विक्रांत बेशर्मा said...

जाते जाते समेट ली थी
तुम्हारी आहट मैने
अपने आगोश में,
हर शब बाहें खोल के
ज़मीन पे डाल देती हूँ इस आहट को

तुम्हे पता है न..
.मुझे अँधेरे में अकेले डर लगता है!


बहुत ही शानदार नज़्म है ,बधाई !!!!!!

योगेन्द्र मौदगिल said...

aap kahan hain aajkal ?

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

बेहतरीन,
आपकी कविता ने मुझे भी किसी की याद में गुम कर दिया, बस डर लगने का काम मेरा नही हुआ करता था.
आपको बधाई

vipinkizindagi said...

बहुत सुंदर भाव

आशीष said...

पल्लवी जी आप तो ब्लॉग पर छा गई हैं। यकीन मानिए जितने कमेंट आपकी पोस्ट पर आ रही है, वो काफी अधिक है। दिग्गज ब्लॉग को पसीने आ रहे हैं।

आशीष

विनय said...

नये साल की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ

Udan Tashtari said...

बहुत सुन्दर रचना...


नये साल की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.

RC said...

आज बड़ा हो गया है मेरा ये पौधा
देख,कितने फूल आये हैं इसमें
और तू बिखर गयी है
फिजा में खुशबू बन के.....

beautiful lines!

God bless
RC

purnima said...

और तू बिखर गयी है
फिजा में खुशबू बन के.....
aapki rachan kafi sunder he
Pallavi ji

Fahmida Laboni Shorna said...

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