Tuesday, April 14, 2009

जिंदगी बेहद खूबसूरत है,चलिए इसे पहले से भी ज्यादा प्यार करें.....


"life is so beautiful that death has fallen in love with it।" कल ही एक नॉवेल पढ़ते वक्त ये पंक्तियाँ देखी! कितना सच है, जिंदगी की सुन्दरता की इससे सुन्दर व्याख्या मैंने नहीं पढ़ी थी! मेरे कई दोस्तों से कई बार जिंदगी की फिलॉसफी पर चर्चा होती है...कितनी अजीब बात है वही जिंदगी बहुत खूबसूरत लगती है जब हमारे साथ सब कुछ अच्छा अच्छा हो रहा होता है, हमारा दिल खुशियों से भरा होता है ! वही दोस्त जो अपने अच्छे वक्त में जिंदगी के एक एक पल का आनंद उठाना चाहता है ! कुछ महीनों बाद जब दुर्भाग्य वश अच्छे वक्त का चक्र ख़त्म होता है और जिंदगी अपना दूसरा चेहरा दिखाती है तब वही दोस्त जिंदगी को एक अभिशाप से ज्यादा कुछ नहीं मानता! परिवर्तन जिंदगी का नियम है या अच्छा और बुरा वक्त दोनों ही स्थायी नहीं हैं....ऐसी बातें चर्चा के दौरान करने वाला दोस्त सब भूल जाता है जब खुद कठिनाइयों से जूझ रहा होता है! और शायद हममे से ज्यादातर लोग इसी तरह की जिंदगी जीते हैं! अच्छे फेज़ को उत्साह के साथ जीते हैं तब हम क्यों याद नहीं रखते की ये फेज़ अस्थायी है और इसके बाद दूसरा फेज़ भी आएगा जो हमारी अंदरूनी शक्ति की असली परीक्षा होगी! कितने हैरत की बात है न की आर्थिक, शारीरिक और मानसिक परेशानियां हमें इतना हताश कर देती हैं की हमारे अन्दर से जीने की इच्छा ही ख़तम हो जाती है! मेरे खुद के अनुभव हैं की मानसिक अवसाद के दौर में गुस्सा, आंसू, चिडचिडापन आप पर हावी हो जाते हैं और लगता है की अब ये दौर शायद कभी ख़त्म न होगा...एक लम्बी अँधेरी सुरंग की तरह! पहले पढ़ी हुई सारी सकारात्मक बातें जैसे हवा हो जाती हैं! मुझे अच्छी तरह याद है कि जब मेरी कोई दोस्त परेशान होती थी तो मैं उसे इतनी सारी सकारात्मक बातें, जिंदगी को सुन्दर बनाने के तरीके और डिप्रेशन को दूर रखने के तरीके बताया करती थी जो कि मैंने किताबों में पढ़े हुए थे! शायद तब तक मैंने डिप्रेशन को जाना नहीं था! जिस दिन वो फेज़ मेरी जिंदगी में आया तब वो सारी बातें मैंने खुद से भी कही लेकिन खुद को बहुत लाचार पाया! और अगर किसी और ने मुझे समझाने कि कोशिश की तो लगा की ये सब तो मुझे पता है॥ये मुझे क्या बता रहा है!

पहले मुझे समझ नहीं आता था की बचपन से ही अगर मैं दोपहर में सो जाऊं और शाम को अँधेरा होने के बाद उठूँ तो क्यों एक अनजानी सी उदासी मुझे घेर लेती थी! हांलाकि ये दौर बहुत छोटा होता था...शायद दो घंटे या इससे कुछ ज्यादा का! आज भी ये होता है इसलिए जब भी मैं दिन में सोती हूँ तो इस अवसाद से बचने के लिए अलार्म लगा लेती हूँ ताकि अँधेरा होने से पहले उठ जाऊं! अगर कभी गलती से सोती रह गयी तो अब तक मैं जान चुकी हूँ की क्या करना है! तुंरत तैयार होकर मार्केट का एक राउंड लगा लेती हूँ! वहा आइसक्रीम का कोन हाथ में पकडे हुए लखनवी चिकन के कुरते या जंक ज्यूलरी की दुकाने देखते हुए याद भी नहीं रहता की थोडी देर पहले उदासी ने मुझे जकड रखा था! लेकिन मैंने एक बात विशेष तौर पर नोटिस की कि अवसाद चाहे कितनी भी कम देर का क्यों न हो...आपकी सोच को बदल कर रख देता है! आम तौर पर जिंदगी को पूरी तरह एन्जॉय करने वाली मैं अवसाद के उस दौर में कोई और ही बन जाती हूँ मानो मेरे अन्दर मुझसे छुपकर कोई और इंसान भी रहता है! जो समय समय पर अपनी उपस्थिति का एहसास दिला जाता है! निराशा के उस दौर में वे सारे लोग जो मुझे छोड़कर इस दुनिया से चले गए हैं....बहुत जोर से याद आने लगते हैं! एक अनजाना सा भय सताने लगता है कि कहीं अपना कोई कहीं चला न जाए! जीवन के मायने नए सिरे से तलाश करने लगती हूँ! शायद ये भी खुद को जानने समझने का एक मौका होता है! जब कई बार ऐसा मेरे साथ हुआ तो मैंने अवसाद के बारे में बहुत बहुत पढ़ा! तब जाना कि मौसम का हमारे मूड से कोई न कोई रिश्ता ज़रूर है! फरवरी महीने में विश्व में सबसे ज्यादा आत्म हत्याएं क्यों होती हैं? क्यों काले बादल से भरा दिन उदास कर देता है? यहाँ तक कि आज भी मार्च अप्रैल के महीने में रात को जब हवा चलती है तो दिल जोर जोर से धड़कने लगता है....यही वो हवा और मौसम था जिसमे हमने सालों साल परीक्षाएं दी हैं! सुबह पेपर देने जाने का भय आज तक हौवा बनकर डरा देता है!

इन सब प्रश्नों के उत्तर तो मेरे पास नहीं हैं! लेकिन ये महसूस किया है कि सूरज कि किरणों में कुछ जादू है जो उत्साह जगाता है! मई की चिलचिलाती धूप में आप बार बार पसीना पोंछते हुए , सूखे गला लिए अपने काम पर जाते हैं....कितनी भी खीज क्यों न आये मगर निराशा पास नहीं फटकती है! औरों के अपने अलग अनुभव हो सकते हैं मगर मुझे तो हमेशा यही महसूस हुआ है! अपने अनुभवों से मैंने जाना है की जब भी मन उदास हो तो खाली और चुपचाप नहीं बैठना चाहिए! खुद को व्यस्त रखना उदासी भगाने का सबसे अच्छा तरीका है! एक बार की बात है ॥ऐसे ही खिन्न मन से मैं घर में चुपचाप बैठी हुई थी! लग रहा था ....जिंदगी निरर्थक है और शायद अब ख़ुशी वापस नहीं आएगी! उसी वक्त कंट्रोल रूम से फोन आया की मेरी ड्यूटी कॉन्स्टेबल भरती में लगी है और तुंरत मुझे ग्राउंड पहुंचना है! झटपट तैयार होकर मैं पहुंची और लगातार दस घंटे परीक्षार्थियों की हाईट , चेस्ट नपवाते नपवाते कब अँधेरा हो गया कुछ पता न चला! इस दौरान एक सेकंड की फुर्सत नहीं थी! जब घर पहुंची तो थक कर चूर हो चुकी थी! और सुबह की निराशा का अंश मात्र भी शेष नहीं था! और मैंने खुद को हमेशा की तरह खुश और उत्साह से भरा हुआ पाया!

शायद बहुत कुछ अव्यवस्थित सा लिखे जा रही हूँ मैं...पर कभी कभी बिना सोचे जो दिल में आये बस लिखते जाना अच्छा लगता है! मुझे भी सुकून भरा लग रहा है ...आज मैं फिर से दिन में सोयी और दिन ढलने पर उठी! आज न लिखती तो कल शायद न लिख पाती! कुल मिलाकर अब जो महसूस कर रही हूँ वो ये की बहुत कुछ खराब घटने के बाद भी जिंदगी बेहद खूबसूरत है! हमारे और मौत के बीच में लगातार एक कॉम्पटीशन है की कौन इसे ज्यादा प्यार करता है! अगर हमारे प्यार में ज़रा भी कमी हुई तो वो इसे हमसे छीनकर ले जायेगी! तो चलिए इसे पहले से भी ज्यादा प्यार करें.....

37 comments:

कुश said...

अपना फार्मूला तो फिक्स है जब भी लगता है कुछ गड़बड़ है तो जोर से एक लम्बी सांस लेकर छोड़ देता हूँ.. मुझे लगता है जैसे सारी टेंशन ख़त्म हो गयी.. ये वाकई काम करता है.. साय्क्लोजिकली तो फर्क पड़ता ही है..
वैसे अवसाद से बचने के लिए एक और भी तो उपाय है बस उंगलियों को काम में लेना है और एक नंबर पे फोन लगाना है.. फिर थोडी सी नौटंकी करनी है.. बस हो गया काम

सुशील कुमार छौक्कर said...

जब भी मन उदास हो तो खाली और चुपचाप नहीं बैठना चाहिए! खुद को व्यस्त रखना उदासी भगाने का सबसे अच्छा तरीका है!
सच इससे अच्छा तरीका नही। ये मेरा भी अनुभव है।

ajay kumar jha said...

pehlee baat to ye ki aapkaa blog bahut khoobsoorat hai, doosra ye ki is lekh mein aapne maanav manovigyaan kaa bada hee sundar aur sajeev chitaran kiya hai, aisa sabke saath hotaa hai, magar kehte hain na jindagee kabhee ruktee nahin.

मीत said...

सच कहा आपने क्यों ना इसके जाने से पहले इससे प्यार करे...
पल्लवी जी एक बात से हैरान हूँ..
आपने जो लिखा है की पहले मुझे समझ नहीं आता था की बचपन से ही अगर मैं दोपहर में सो जाऊं और शाम को अँधेरा होने के बाद उठूँ तो क्यों एक अनजानी सी उदासी मुझे घेर लेती थी!
ऐसा मेरे साथ भी बचपन से हो रहा है.. लेकिन मेरी वो उदासी अगली सुबह ही जाकर ख़त्म होती थी..और यह सिलसिला आज भी वैसा ही है.. इसलिए में दिन में नहीं सोता... लेकिन आपने एक तोड़ भी बताया है इसका... आजमाऊंगा...
बहरहाल लेख बहुत अच्छा लगा
मीत

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सूर्य की रोशनी में चमत्कार है। यही तो पदार्थ का वह रूप है जो पूरे यूनिवर्स में फैल जाता है। रुकता नहीं कभी। जब भी अवसाद हुआ। किसी न किसी काम में जुट गया। अवसाद पता नहीं कहाँ चला गया।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

इन भावों में हम अक्सर डूबते-उतराते हैं। आपने उन्हे शब्द दे दिये।

नीरज गोस्वामी said...

सोच को अपनी बदल कर देख तू
मन तेरा गर यार मुरझाने लगे
ये शेर लिखना जितना आसान है उसे जीवन में उतारना उतना ही मुश्किल....मैं समझ सकता हूँ इस बात को...अवसाद हर एक को दबोच लेता है लेकिन ये आप पर है की आप अपने आप को कितना उसके हवाले कर दे रहे हैं...ये एक ऐसी अनुभूति है जिस से सब बचना चाहते हैं लेकिन बच नहीं पाते...अवसाद गंभीर रूप से आप पर हावी हो उस से पहले ही उसमें से निकल आना चाहिए...सबसे आसान तरीका है उस परिस्तिथि या जगह से अपने को दूर ले जाना...
बहुत रोचक पोस्ट लिखी है आपने...सच्ची और अच्छी...
नीरज

कंचन सिंह चौहान said...

अजीब सी बात है न फरवरी का माह पूर्व एवं पश्चिम दोनो तरीके से प्रणय माह है और इसी माह में सर्वाधिक आत्महत्या भी होती है.....! आश्चर्य..!

अभिषेक ओझा said...

कई सवाल सोचने लायक है... इनके उत्तर तो इतनी आसानी से पता नहीं लग सकते ... पर इतना तो समझ में आ ही रहा है. "जिंदगी बेहद खूबसूरत है,चलिए इसे पहले से भी ज्यादा प्यार करें....."

जितेन्द़ भगत said...

आपने सही कहा-
अवसाद चाहे कितनी भी कम देर का क्यों न हो...आपकी सोच को बदल कर रख देता है!
और न जाने क्‍यों, गर्मी के मौसम में अवसाद मन को ज्‍यादा ग्रसता है, शायद तन को भी।

Manish Kumar said...

जिंदगी के सब रंगों से गुजरने के बाद ही इसका सही मूल्यांकन हो सकता है। अपने अनुभवों को हम सब से साझा करने के लिए धन्यवाद। आपके कुछ अनुभवों से कुछ में समानता पाई और कुछ में प्रतिकूलता। फिर भी पढ़ना अच्छा लगा।

बी एस पाबला said...

जब भी मन उदास हो तो खाली और चुपचाप नहीं बैठना चाहिए! खुद को व्यस्त रखना उदासी भगाने का सबसे अच्छा तरीका है!यही फार्मूला पिछले कई वर्षों से अपना रहा हूँ और मानता हूँ कि यह प्रभावी है

siya said...
This comment has been removed by the author.
Vidhu said...

पल्लवी जी ...अपने सच से भला कौन आपको जान सकता है ...शानदार पोस्ट ...उदासी भरे दिनों में शोपिंग करना या अपने को व्यस्त रखना या मेरे ख्याल से मनपसंद गीत-गजल सुनना बेहतर उपचार होता है ....परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों अपने को खुशगवार रखना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए ...बधाई...आप भोपाल में ही हें २६ को भारत भवन में एक ब्लोगर मीट सुबह १० बजे है इसका निमंत्रण आपको मिला या नही ....

विष्णु बैरागी said...

इस मामले में सबके अपने-अपने अनुभव और अपने-अपने निदान हैं।
जितने अधिक लोग अपने अनुभव उजागर करेंगे, उतनी ही अधिक परस्‍पर सहायता करेंगे।

ali said...

"परीक्षार्थियों की हाईट , चेस्ट नपवाते नपवाते कब अँधेरा हो गया कुछ पता न चला! इस दौरान एक सेकंड की फुर्सत नहीं थी ! "

अब आप की कृपा से इनमें से कुछ लोग अवसाद में चले जायेंगे !

यही जीवन है ! सबके अपने अपने अवसाद अपने अपने कारण हैं !

आपसे सहमत कि जीवन को पहले से भी ज्यादा प्रेम करें !

डॉ .अनुराग said...

उदासी के साथ सबसे हितकर बात है कुछ सबक लेना ...इसलिए कहते है आपके पास ढेरो दोस्त होने चाहिए मन का उलीचने के लिए ....मन में जमा हो तो मुश्किल होती है....जब कभी लो फील करता हूँ तो अच्छा मनपसंद खाता हूँ .आर्यन के साथ खेलता हूँ ओर एक दो दोस्तों के साथ मोबाइल पे बतियाता हूँ.....जब उदासी लम्बी हो तो सब कुछ बंद करके लॉन्ग ड्राइव पे निकल जाता हूँ....जैसे कल बचपन का एक दोस्त ऑस्ट्रेलिया से १५ साल बाद मिला......वही सर्जन है ...दोनों निकल लिए..आजकल दोस्तों पे रिश्तेदारो से ज्यादा यकीन है....वैसे भी रिश्तेदार तो सबके पास है ...
कभी फुरसत ओर कभी रूटीन ...............दोनों में ब्रेक चाहिए ....यार

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सभी की ज़िन्दगी में इस तरह के पल आ हो जाते हैं ..तब ज़िन्दगी अजीब सी शय नजर आने लगती है ...मार्च अप्रैल के महीने की हवा अक्सर मुझे भी अपने और अब अपने बच्चो के बोर्ड के एग्जाम की याद दिला देती है :) यहाँ सबने अपने अवसाद से बचने के तरीके लिखे हैं इस लिहाज से बेहतरीन पोस्ट बन गयी है यह ..मेरा इस से उबरने का तरीका है ..सूफी संगीत सुनना और अमृता की किसी किताब सेकोई अच्छा सा पन्ना पढना ..:) और अब ब्लोगिंग भी इस में शमिल होती जा रही है :) ....जिंदगी जैसी भी है इस में कोई शक नहीं कि बेहद खुबसूरत है और रोज़ नए तरीके से आने वाले अवसाद से लड़ने का और उस से जीतने का अवसर सिखा ही देती है ..

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

Well written and well said too.Pallavi ji ,you have a daring to speak it out which others have not.Sun always enlightens and shaddow always depresses.It also happens with me and with lot of others too.Scientists have the reason ,need not to say but truth lies in self appraisal.If you can think ,you can win.Every one has faced it ,everybody will have to face,let us see that ultimately truth wins.My heartly congrats and I hope that you will write in series about your emotional experiences and how u dealt with them.With hope and regards
dr.bhoopendra

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आज ज़िँदगी और प्यार पर लिखा ये बढिया लगा

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छी तरह से लिखा आपने। सुन्दर! जिंदगी के बारे में किसी का लिखा हुआ वाक्य मुझे हमेशा याद आता है- सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है!

अनिल कान्त : said...

जब कभी मन उदास महसूस करता है तो कोई फिल्म देख लेता हूँ या दोस्त से बतिया लेता हूँ .....या माँ से
आपका लेख बहुत प्यारा है ...सच में मुझे तो बहुत अच्छा लगा

Udan Tashtari said...

एक नीरज जी की कविता है:

कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है...


-आज बहुत सुन्दर लेखन दिया तुमने बिल्कुल दिल से!! ऐसे ही मनोभाव सीधे उकेरो....अच्छा लगा!!

Harsh said...

bahut achcha likha hai aapne.....

anurag said...

बहुत सुंदर लेख है.
" गम हों के खुशी दोनों ,कुछ देर के साथी हैं
फिर रस्ता ही रस्ता है, हंसना है न रोना है."
( अब ये मत कहियेगा कि ये सब तो मुझे पहले से ही पता है.)
शॉपिंग पे निकल जाना मानो रामबाण औषधि है.

Science Bloggers Association said...

सही कहा आपने, आखिर इतनी खूबसूरत दुनिया दुबारा तो मिलने से रही।

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खुशियों का विज्ञान-3
एक साइंटिस्‍ट का दुखद अंत

Rohit Tripathi said...

Wahi Zindagi ka dusra chehra dikh raha hai mujhe bhi aaj kal, lekin is ummed ke sath ki acha waqt aayega.. bas life chalti ja rahi hai :-) luvly post pallavi ji

mark rai said...

एक श्वेत श्याम सपना । जिंदगी के भाग दौड़ से बहुत दूर । जीवन के अन्तिम छोर पर । रंगीन का निशान तक नही । उस श्वेत श्याम ने मेरी जिंदगी बदल दी । रंगीन सपने ....अब अच्छे नही लगते । सादगी ही ठीक है ।

भुवनेश शर्मा said...

बड़ा सुकून मिला आपकी पोस्‍ट पढ़कर....टेम्‍पलेट भी बहुत खूबसूरत है

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

आपकी अनुभूति सबकी सी किन्तु अभिव्यक्ति पूरी तरह अपनी मौलिक है...लिखती रहें...

Vijay Kumar Sappatti said...

paalavi ji

aapne bahut acchi baat kahi aur main khud is baat ko samajhta hoon .. aur apne team ko bhi yahi sandesh deta hoon . itne acche lekhan ke liye badhai sweekare karen.

meri nayi kavita " tera chale jaana " aapke pyaar aur aashirwad bhare comment ki raah dekh rahi hai .. aapse nivedan hai ki padhkar mera hausala badhayen..

http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html

aapka

vijay

rush said...

So deep..perceptive n true...v well said..leaves u thinking

kumar said...

I want to know the name of the novel which made u inspire to wrote a feeling lik dis .


nice article maam

"In Search of.." said...

सरल शब्दों में आपने इतनी गहरी बात कह डाली की सच में एक पल के लिए जीवन की इस खूबसूरती को अपने झोले में बंद कर लेने का मन किया ! मैं खुद को काफी सकारत्मक मानुष समझता था और हूँ भी, मगर सत्य है की दुःख के बादल आपके जीवन को घेरेंगे ही घेरेंगे और इस दौर को आप कितनी सच्चाई से और कितनी दिलेरी से पार करेंगे वही जीवन का सार है ! दुःख को घर पे बैठ के अपने आप जाते नहीं देखा !
"मन उदास हो तो खाली और चुपचाप नहीं बैठना चाहिए" सत्य है !

आपकी लेखनी सरल व साफ़ तो है ही आकर्षक भी है !!

इती

दर्शन मेहरा
http://darshanmehra.blogspot.com

deepu said...

zindgi badi khubsurat hai use jaya nahi karna cahiye.

deepu said...

sach hi to hai ki zindagi to khubsurat to hoi he hai ise hamesa pyar karna cahiye.

deepu said...

sach hi to hai ki zindagi to khubsurat to hoi he hai ise hamesa pyar karna cahiye.