Tuesday, March 31, 2009

जब कोई महबूबा चांदनी ओढ़कर उतरती है तो कैसी लगती है....


सुबह मेहँदी महक रही थी बिस्तर पर
मैं तो रातरानी सिरहाने रखकर सोया था
होंठों पर गर्म साँसें अभी भी दहक रही थीं
और पलकों पर आज फिर एक मोती झिलमिलाया था
खुली खिड़की से जब झाँका था मैंने तो
आसमा के आखिरी कोने पर लहराता दिखा था
तुम्हारा रेशमी आँचल ,
जिसका एहसास रात भर मदहोश किये था

या खुदा...मुझे इल्म है
तुझे भी वो प्यारी थी मेरी तरह
और बुला बैठा तू उसे अपने पास
मगर....एक काम कर मेरा
उड़ा दे मेरी रातों की नींद
तड़पने दे मुझे तमाम उम्र
कम से कम एक बार तो देख सकू
जब कोई महबूबा चांदनी ओढ़कर उतरती है
तो कैसी लगती है....

43 comments:

mehek said...

उड़ा दे मेरी रातों की नींद
तड़पने दे मुझे तमाम उम्र
कम से कम एक बार तो देख सकू
जब कोई महबूबा चांदनी ओढ़कर उतरती है
तो कैसी लगती है....
uff es ada ke bhi kya kehne,dil mein tadap hai ankhonmein intazaar,pallavi ji ,aaj to gazab jadu chala diya kalam se,waah.mehbooba ka chndani odhakar aana bhaa gaya.

रूपाली मिश्रा said...






















अनिल कान्त : said...

क्या यही प्यार है ...हाँ यही प्यार है

poemsnpuja said...

उफ्फ्फ...कितना खूबसूरत लिखा है...नशा सा है हर शब्द में. दिल खुश हो गया.

पवन *चंदन* said...

वाह क्‍या खूबसूरत रचना है
वाह वाह

Kishore Choudhary said...

जब भी कोई रचना हिन्दुस्तानी ( उर्दू और हिंदी का मिश्रित रूप ) में देखता हूँ भाषा विज्ञानियों के बारे में कुछ ख्याल आ जाते हैं कि आप अपने सौन्दर्य शास्त्र को इन रचनाओं की सुन्दरता से कैसे बचा पाएंगे?

Kishore Choudhary said...

आशा है मेरी वर्तनी सम्बन्धी त्रुटियां अनदेखी कर दी जाएँगी यथा "ख़याल"

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

ओह, यह अहसास हुये दशकों बीत गये।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बेहद खूबसूरत एहसास और ख्याल ..जिसको सोचते हुए ही कई रंग जहन में खिल जाते हैं .बहुत पसंद आई यह कविता

sanjaygrover said...

जब कोई महबूबा चांदनी ओढ़कर उतरती है
तो कैसी लगती है....

Aur jab koi Police-Adhikari-n kavita likhti hai to kaisa lagta hai.
Ans.: Achchha lagta hai.

कंचन सिंह चौहान said...

kya kahun sab pahale vale kah gaye...!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आह!
यह दीवानापन
मुझे न मिला!

नीरज गोस्वामी said...

बेहद खूबसूरत रचना है आप की...बहुत दिनों बाद आपका लिखा पढने को मिला लेकिन इस खूबसूरत नज़्म को पढने के बाद सारे गिले शिकवे जाते रहे...वाह..वा..करते मन नहीं भर रहा...
नीरज

Udan Tashtari said...

कम से कम एक बार तो देख सकू
जब कोई महबूबा चांदनी ओढ़कर उतरती है
तो कैसी लगती है....


--आह!! वाह!! एक साथ निकल पड़ी.

-बहुत अद्भुत अभिव्यक्ति है. यह रुप भी देखा तुम्हारा-बहुत उम्दा!!

Shefali Pande said...

खूबसूरत रचना ...बधाई

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

सुभानाल्ल्लाह ..लिखती रहीये यूँ ही ..
- लावण्या

डॉ .अनुराग said...

गोया के ये आमद भी सुखद है.....एक नज़्म के साथ .....खुदा कसम जरा रवानगी रखिये......ऐसे गुम हो जाना ठीक बात नहीं है....वो भी पुलिस वालो का .

रवीन्द्र प्रभात said...

खूबसूरत रचना ...बधाई!

"अर्श" said...

कम से कम एक बार तो देख सकू
जब कोई महबूबा चांदनी ओढ़कर उतरती है
तो कैसी लगती है....


-बहुत अद्भुत अभिव्यक्ति है. यह रुप भी देखा तुम्हारा-बहुत उम्दा!!

संगीता पुरी said...

कम से कम एक बार तो देख सकू
जब कोई महबूबा चांदनी ओढ़कर उतरती है
तो कैसी लगती है....
सुंदर अभिव्‍यक्ति हुई है ।

मीत said...

बहुत खूब !

Sanjeet Tripathi said...

खूबसूरत

अनूप शुक्ल said...

क्या कहने! क्या बात है!

MANVINDER BHIMBER said...

बेहद खूबसूरत एहसास और ख्याल ..जिसको सोचते हुए ही कई रंग जहन में खिल जाते हैं......दिल खुश हो गया.

मीत said...

मेरे पास शब्द नहीं इस नज़्म की तारीफ के लिए...
बेहद पसंद आयी बहुत खुबसूरत...
मीत

कुश said...

बड़े दिनों बाद आपकी आमद अच्छी लगी... ऑर अगर ये शायराना हो तो क्या कहने..

ललितमोहन त्रिवेदी said...

वाह से आह तक की एक सुन्दर अभिव्यक्ति !

Harkirat Haqeer said...

सुबह मेहँदी महक रही थी बिस्तर पर
मैं तो रातरानी सिरहाने रखकर सोया था

bhot sundar....!!

कम से कम एक बार तो देख सकू
जब कोई महबूबा चांदनी ओढ़कर उतरती है
तो कैसी लगती है....

lajwaab....!!

muskan said...

या खुदा...मुझे इल्म है
तुझे भी वो प्यारी थी मेरी तरह
और बुला बैठा तू उसे अपने पास
मगर....एक काम कर मेरा
उड़ा दे मेरी रातों की नींद
तड़पने दे मुझे तमाम उम्र
कम से कम एक बार तो देख सकू
जब कोई महबूबा चांदनी ओढ़कर उतरती है
तो कैसी लगती है....

bahut dard hai is rachna me

Richa Sharma said...

Fantastic.

संदीप शर्मा said...

या खुदा...मुझे इल्म है
तुझे भी वो प्यारी थी मेरी तरह
और बुला बैठा तू उसे अपने पास
मगर....एक काम कर मेरा
उड़ा दे मेरी रातों की नींद
तड़पने दे मुझे तमाम उम्र

बहुत उम्दा और भावपूर्ण...

rohitler said...

बहुत बहुत खूबसूरत

Kavi Kulwant said...

wah wah ji

अर्चना said...

idhar udhar ghoomate hue aapake blog par chali aayi. afasos hua itani der se kyon aai! arse baad itani khoobasurat rachana padhi.

आशीष कुमार 'अंशु' said...

खूबसूरत लिखा है...

रवीन्द्र रंजन said...

वाह बहुत खूबसूरत रचना है।

Archana said...

पल्लवी जी आपने बहुत सुन्दर रचनाएँ की हैं..
मेरी शुभकामनाओं सहित...

ajit.irs62 said...

khoobsurat hai.

Pyaasa Sajal said...

agar main sahi samajh raha hoon to aapko orkut pe kaafi padha hai maine..blog ki duniya me kavitao ko padhke bahut achha lag raha hai :)

www.pyasasajal.blogspot.com

परा वाणी - अरविंद पाण्डेय said...

सुन्दर मोहक अभिव्यक्ति

Sanjeet Tripathi said...

शानदार एहसास, बेहतरीन शब्दों मे।

Manish said...

vaah vaah

Ravi Rajbhar said...

Nih-shabd kar diya aapne.