Saturday, July 19, 2008

बालसभा

जो लोग सरस्वती शिशु मंदिर में पढ़े होंगे...वो तो ज़रूर ही इस शब्द से परिचित होंगे और जो नहीं भी पढे हों शिशु मंदिर में मगर किसी भी औसत हिंदी माध्यम के विद्यालय में पढे होंगे ..वो भी बालसभा के नाम से जरूर परिचित होंगे और इसका आनंद भी लिए होंगे....

हमारे स्कूल में शनिवार का इंतज़ार सभी भैया बहनों को रहता था!उस दिन आखिरी के दो पीरियड नहीं लगते थे..उनकी जगह बालसभा होती थी!आधे लोग इसलिए खुश होते थे कि चलो हफ्ते भर तक जो कहानी,चुटकुला,नाच गाना तैयार किये हैं उसको दिखा देंगे...आधे लोग जिनमे हम भी शामिल थे इसलिए प्रसन्न होते थे कि लास्ट का पीरियड गणित का होता था और सबसे ज्यादा संटियाँ उसी पीरियड में टूटती थीं!चलो हफ्ते में कम से कम एक दिन तो मुक्ति मिलती थी उस गणित के पीरियड से!लघुत्तम ,महत्तम,संघ,समुच्चय...बाप रे कितनी डरावनी शब्दावली होती थी गणित की! खैर बालसभा की और चलते हैं सीधे....

बड़ा सा लाल नीले रंग का फर्श बिछा होता था हॉल में...चूंकि पूरे हॉल को नहीं ढँक पाता था तो पहले आओ पहले पाओ सिद्धांत अनुसार जो लेट आते थे उन्हें ज़मीन पर ही बैठना पड़ता था...उसका भी इंतजाम कर रखा था भाई लोगों ने...फुल साइज़ का रूमाल लाते थे शनिवार को जो कम से कम फर्श से तो स्वच्छ ही होता था!
एक बहादुर सा बच्चा खडा होकर कहता "मैं आज की बालसभा के अध्यक्ष के रूप में फलाने भैया का नाम प्रस्तावित करता हूँ"
"मैं प्रस्ताव का समर्थन करती हूँ" दूसरी बहन तत्काल खडे होकर कहती "
लो बन गए अध्यक्ष...अध्यक्ष गर्व से मुस्कुराता हुआ आचार्य जी लोगों के बगल में कुर्सी पर बैठता..केवल उसे ही ये सुविधा प्राप्त थी!इस प्रकार बालसभा प्रारंभ होती....जो भी अपनी कला पेश करने आता वो इन लाइनों से शुरुआत करता "मैं आज आप सभी के समक्ष .....प्रस्तुत करने जा रहा हूँ..जो भी त्रुटियाँ हों उन्हें क्षमा करने की कृपा करें!"हमारे स्कूल में फरमान जारी हुआ था की हर बच्चे को मंच पर आकर कुछ न कुछ बोलना ज़रूरी है...जो बच्चे मंच की सीढ़ी कभी नहीं चढ़े थे उनके लिए बड़ी समस्या उत्पन्न हो गयी...क्या करें!एक तो कुछ आता नहीं ऊपर से मंच पर पहुँचते ही हाथ पाँव फूल जाते थे!पर आज अगर बालसभा हमें याद है तो उन्ही लोगों की वजह से....चलिए आप भी देखिये कि कैसे कैसे प्रोग्राम प्रस्तुत किये जाते थे इन मंच से नफरत करने वाले लोगों द्वारा..
सबसे पहले मनीष चौधरी ...हमारे क्लास के सबसे होशियार लड़का..सदा प्रथम आने वाला!पहले आचार्य जी ने उसे प्यार से बुलाया..जब प्यार व्यार का कोई असर नहीं हुआ तो ज़रा सी घुड़की दी..पसीने से तरबतर ऊपर पहुंचा..१५ मिनिट तक तो "क्या सुनाऊ,क्या सुनाऊ" करता रहा...फिर जब प्रधानाचार्य जी ने आँखें तरेरीं तो जाने कहाँ से उसके मुख से अचानक एक चुटकुला फूट पड़ा!चुटकुला था -
एक मूर्ख दुसरे मूर्ख से- अगर तुम बता दो कि मेरे हाथ में क्या है तो मैं अपने हाथ में रखा बटन तुम्हे दे दूंगा"
दूसरा मूर्ख-कोई क्लू दो
पहला मूर्ख-गोल गोल है..उसमे चार छेद हैं
दूसरा मूर्ख-समझ गया....स्कूटर का पहिया

जैसे ही चुटकुला ख़तम हुआ...मनीष बिना हम लोगों के हंसने का इंतज़ार किये सीधे भागकर नीचे आया और अपनी जगह बैठकर फर्श से हथेलियों का पसीना पोंछने लगा..उसकी हरकत और चुटकुले का मिश्रित असर होता की सब ताली बजाकर हंस दिए...और असली बात अब बताने जा रही हूँ...मनीष ने लगातार तीन सालों तक हर बालसभा में यही चुटकुला सुनाया....
फिर बारी आती थी ...अनीता की! वो भी बड़ी लाजवंती टाइप की लड़की थी! जब पहली बार मंच पर पहुंची तो अपना चुटकुला शुरू करने के पहले दस मिनिट तक तो थूक ही गटकती रही....फिर शायद जब सारा थूक ख़तम हो गया होगा..तब कहीं जाकर चुटकुले की बारी आई!अब ज़रा चुटकुले पर भी गौर फरमाइये-
एक लड़की स्कूल से घर वापस आई और अपनी माँ से बोली "माँ भूख लगी है"
माँ बोली" भूख लगी है तो खाना खा ले"

हम सब अगली लाइन का इंतज़ार कर रहे थे इतने में अनीता जी "धन्यवाद "कहकर नीचे उतर आयीं!ये क्या....चुटकुला ख़तम. एक मिनिट सन्नाटा छाया रहा..फिर वो हंसी का पटाखा फूटा कि रहरह कर अंत तक हंसी गूंजती रही...हर बाल सभा में अनीता दस मिनिट के थूक गटकने के टाइम में नया चुटकुला तैयार कर लेती थी...
तीसरे थे राहुल भैया...उन्हें न चुटकुला आता था, न कहानी, न नाच ,न गाना! पर एक चीज़ कमाल आती थी! आलू बोलना....केवल आलू शब्द को वो इतनी तरीके से बोलता था कि सब हंसी के मारे लोटपोट हो जाते थे...गुस्सा,मनुहार,प्यार,बेचारगी,रोना ,हँसना...सब कुछ होता था उस आलू के साथ!हमने भी कई बार घर आकर बोलने कि कोशिश कि मगर नहीं बोल पाए..आलू की जगह भिंडी,लौकी कद्दू भी बोलने की कोशिश की मगर नाकाम रहे....अगर राहुल तुम कहीं ये पोस्ट पढ़ रहे हो तो एक बार अपने आलू का पौडकास्ट कर दो...सबको सुनवा दो!

36 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

बाल सभा के
सभी बाल अब
बाल कहां रहे
बवाल बन गए।

बवाल तो पहले
उबाल बन गए
जवाब थे सब
सवाल बन गए।

बाल कहां रहे
बाल चोटी बने
चाहे छोटी बने
जुल्‍फें भी बनें.

अनुराग said...

कभी बालभारती गया नही पर ये सब पढ़कर ऐसा लगता है की बाल मन में भी कुछ स्मृतिया ऐसी होती है जो हमेशा जीवित रहती है ,मुझे याद है मै दूसरी क्लास में था एक नाटक में रोल करना चाहता था पर मुझे रोल नही दिया गया ,बड़ा उदास हुआ किस्मत से एक लड़का बीमार हो गया उसकी जगह मुझे रोल मिल गया मंच पर मैंने अपना dialogue तो बोल दिया पर दूसरो की बारी आते आते मै हंसने लगा ,मैडम परदे के पीछे से इशारे करती ....हैरानी तब हुई जब हमारे नाटक दो सेकंड प्रिअज़ मिला....

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत ही यादे ताजा हो गई यह पढ़ कर ..यह बाल सभा भी अच्छे से याद है :)

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

कितनी ही यादे ताज़ा कर दी आपने पल्लवी जी.. हालाँकि मैं अँग्रेज़ी माध्यम में पढ़ता था.. पर हमारे यहा भी बाल सभा होती थी.. और जो भी आपने लिखा है कुछ वैसी ही होती थी.. पुरानी यादो में ले जाने के लिए आभार

siddharth said...

शिशु मंदिर में पढ़ाई मैने भी की है। बालसभा के अलावे वहाँ वार्षिक ‘शिविर’ भी लगता था जो प्रायः बसंत पंचमी को शुरू होता था। सभी बच्चे तीन दिन और दो रातें विद्यालय प्रांगण मे ही ‘पटकुटी’ (tent) में रहकर बिताते थे। पहली रात नाटक, प्रहसन, नृत्य, कौव्वाली, गीत संगीत का रोचक कार्यक्रम बच्चों द्वारा प्रस्तुत किया जाता था। इसकी रिहर्सल महीनों पहले से शुरू हो जाती थी। रिहर्सल के बहाने हमें क्लास के आखिरी दो घण्टे छोड़ने को मिलते थे। अगले दिन ‘शारीरिक प्रदर्शन’- यह सलमान खान वाला नहीं था बल्कि इसके अंतर्गत पी.टी., झण्डी योग, डम्बल योग, साड़ी योग, लेज़िम, रस्सी चालन (rope walk), निशानेबाजी, समूह नृत्य आदि-आदि। एक साथ गिलास कटोरी बजाते हुए जब हम सौ की संख्या में भोजनशाला में पहुँच कर आनंद आ जाता था। भोजन मंत्र तो मुझे आज भी याद है:
ॐ सहनाववतु, सह नौ भुनक्तु, सह वीर्यंकरवावहै तेजस्विनाऽवधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
इसका हिन्दी अर्थ अगले टिप्पणीकार के लिए छोड़ता हूँ क्योंकि मुझे नहीं आता।

Udan Tashtari said...

सबकी सुना गई--अपनी पचा गई??

खुद क्या सुनाती थी वो भी तो बताओ कि सारा थूक गटकने के बाद बोलोगी?

मजेदार रही बालसभा.

ललितमोहन त्रिवेदी said...

बालसभा पढ़कर अनेक स्मृतियाँ ताजा हो गयीं ! मैंने अपनी पहली कविता भी बालसभा में ही पढ़ी थी! बाल मन के उस मोहक कोने में पहुँचा दिया आपकी इस रचना ने !ऐसी छोटी छोटी रचनाएं बहुत आनंद और ऊर्जा देती हैं, धन्यवाद की पात्र हैं आप इसके लिए !

कामोद Kaamod said...

बचपन की यादें ताज़ा कर दी आपने. :)

Mired Mirage said...

वे भी क्या दिन थे!
घुघूती बासूती

Neeraj Rohilla said...

वाह मजा आ गया इस पोस्ट को पढकर ५ साल सरस्वती शिशु मंदिर और ३ साल विद्या मंदिर के जैसे आंखो के सामने गुजर गये ।

रिक्शे से स्कूल ले जाने वाले को भईयाजी कहना, सुबह प्रात: स्मरण, एकात्मता स्त्रोत, गायत्री मंत्र, शान्ति पाठ, स्कूल समाप्त होने के बाद वन्दे मातरम ।

हर प्रमुख स्वतन्त्रता सेनानी के जन्मदिवस पर आखिरी पीरियड में सब लोगों का इकट्ठा होना और भाषण देना । हम तो अपने विद्यालय के प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं । वैसे हम खूब शानदार भाषण दिया करते थे :-) हमारी दुबली पतली काया जोश से ऐसे सराबोर हो जाती थी कि भाषण के बीच में ही कई बार तालियाँ बज जाती थी ।

अविनाश वाचस्पति said...

रिक्शे से स्कूल ले जाने वाले को भईयाजी कहना, सुबह प्रात: स्मरण, एकात्मता स्त्रोत, गायत्री मंत्र, शान्ति पाठ, स्कूल समाप्त होने के बाद वन्दे मातरम । - नीरज रौहिल्‍ला

और अब ........
थ्री व्‍हीलर वाले को चलने से मना करने पर डांटना
सुबह रात के बीते पलों का स्‍मरण
सामूहिकता में एकात्‍मकता
धन मंत्र
खबरों का कुपाठ
स्‍कूल समाप्‍त होने के बाद
नौकरी की तलाश
फिर उससे भी अवकाश।

अभिषेक ओझा said...

समीरजी वाली बात मेरे दिमाग में भी आ रही है :-)

Gyandutt Pandey said...

बाल सभा थूक गटकने के बाद पब्लिक स्पीकिंग सिखाने का सर्वोत्तम माध्यम है। ऐसे ही छोटे छोटे अनुभव और डेलकार्नेगी का बार बार पारायण मुझे याद आता है!

Rajesh Roshan said...

बाल सभा तो नही लेकिन हमारे स्कूल में CCA का पीरिअड लगता था सब कुछ ऐसा ही.... KV का छात्र हू मैं

vipinkizindagi said...

पोस्ट अच्छी लगी
वैसै समीर जी की बात में दम है

हर्षवर्धन said...

पल्लवी तुमने स्कूल की यादें ताजा कर दीं। मैं भी पांच तक शिशु मंदिर में पढ़ा। इलाहाबाद के अल्लापुर में।

Advocate Rashmi saurana said...

sachmuch yaade taja ho gai. sundar.

अंगूठा छाप said...

पल्लवी,
जब शिशु थे तब अपन भी उसी मंदिर में पढ़ते थे। वही संटी, वही भोजन मंत्र, वही बाल सभा, वही वंदे मातरम्... हमारे यहां तो संटी का ये रोल हुआ करता था कि यदि भईया/बहिन खाना नहीं लाए तो भी पड़ती थीं।
आह! बड़ी संटीभरी यादें ताजा हो आईं उस वक्त कीं।

महीने में एक बार अचारजी (आचार्यजी) हमारे घर भी आते थे और एक दैनंदिनी डायरी में घरवालों से कुछ सवालों के जवाब भरवाए जाते थे। जैसे स्कूल जाते वक्त बड़ों के पैर छूकर जाते हैं कि नहीं... बड़ों का कहा मानते हैं कि नहीं... रोज नहाते हैं कि नहीं... वगैरह वगैरह...

बड़ी मिन्नतों से वो कमेंट सकारात्मक भरवा लेता था बड़ी बहिनों से... अदरवाईज दूसरे रोज फिर संटी...

हां बालसभा भी होती थी। उस दिन का सबसे बड़ा क्रेज यही हुआ करता था कि आखिर के दो पीरियड नहीं लगते थे।

अंगूठा छाप

Manish Kumar said...

mazedaar !
mere liye ye bal sabha ka anubhav bilkul naya sa laga. Chaliye isi bahane kuch bachchon ki jijhak dheere dheere kam ho jati hogi.

sandy said...

hi,i m sandeep at agra.i also read in sarasvati shishu mandir n after vidya mandir,but there was shishu sabha not bal sabha .

ज़ाकिर हुसैन said...

aapne aik baar phir us darawni santi ki yaad dila di!!!!
sach-much wo duniya hi alag thi!!
ayaa hai mujhe phir yaad wo zalim gujra zamana bachpan ka

Pragya said...

haalanki mai saraswati shishu mandor mein nahi padhi par hamare vidhyalay mein bhi balsabha hona shuru hua tha.... par pata nahi kyu baad mein band ho gayee...
khoob mazaa aata tha..
school ke din to vaise bhi jiwan ke swarnim din hote hai...
mazaa aa gaya post padhkar

राज भाटिय़ा said...

पुरानी यादे आप के इस बालसभा ने याद दिला दी, बहुत सुन्दर लेख लिखा हे आप ने,धन्यवाद

Dr. Chandra Kumar Jain said...

बहुत रोचक.
आपने क्लू दिया न होता
तो हम कैसे समझते ?
========================
आप सचमुच अच्छा लिखती हैं.
शुभकामनाएँ
डा.चन्द्रकुमार जैन

manas said...

Pallavi Ji, Thank U very much hume phir se us vidyalaya ki yaad dilane ke liye jaha se parishkrat hokar hum nikle hai, Saraswati shishu mandir Chhatarpur aur Damoh ke sunhare dino ki yaad aaj bhi hamare jehan me taaja hai, aaj bhi jab subhah aankh khulte hi to dono hanth aankho ke samne aate hai aur anayas hi muh se nikal padta hai "Karagre vaste laxmi, karmadhye saraswati karmule govindam prabhte kar darshnam" aur apna pair dharti par rakhne se pahle uski vandana karna aur office ke liye ghar se niklate samay papa mummy ke charan sparsh karna to apne aap hi hriday us vidyalay ke liye shraddha se bhar udta hai jisne hume ye sanskar diye....thank you veru much my dear school...

manas said...

Pallavi Ji, Thank U very much hume phir se us vidyalaya ki yaad dilane ke liye jaha se parishkrat hokar hum nikle hai, Saraswati shishu mandir Chhatarpur aur Damoh ke sunhare dino ki yaad aaj bhi hamare jehan me taaja hai, aaj bhi jab subhah aankh khulte hi to dono hanth aankho ke samne aate hai aur anayas hi muh se nikal padta hai "Karagre vaste laxmi, karmadhye saraswati karmule govindam prabhte kar darshnam" aur apna pair dharti par rakhne se pahle uski vandana karna aur office ke liye ghar se niklate samay papa mummy ke charan sparsh karna to apne aap hi hriday us vidyalay ke liye shraddha se bhar udta hai jisne hume ye sanskar diye....thank you veru much my dear school...

मीनाक्षी said...

बालसभा देखते ही अतीत मे चले गए... बचपन की नटखट यादे ताज़ा हो गई...

Abhijit said...

ham sishu mandir me to nahi padhe..par hamare Bal Bharati Public School me bhi Baal-Sabha ka chalan tha jahaan bachche apne apne sadan ke anusar ikatthe hote aur phir wahi...naach, gana, chutkula, kavita aadi. Kuch aise hi vaakya wahaan bhi hote the

School ke din yaad dilaa diye aapne....Dhanyawaad

mahashakti said...

वाह मित्र, अपने तो याद ताजा कर दिया।

कुछ खोजते हुये यहॉं आना हुआ, अच्‍छा लगा पुरातन पोस्‍ट पढ़कर।

सलाम ज़िन्दगी said...

बहुत खूब..लेख पढ़ते हुए तो वाकई बचपन की बालसभा का पूरा चित्र सामने आ गया। क्या कहूं कुछ बातों को शब्दों में नहीं कहा जा सकता..
.इतना सुखद अनुभव देने के लिए शुक्रिया।
सुधी सिद्धार्थ

SID said...

बहुत खूब ...
भैया जी ... हाँ जी
कैसे बैठेगे ..... ऐसे .......
:)

abha said...

बहुत अच्छा लगा पढ़ के | विद्यालय के दिन याद आगये | शिशु मंदिर और विद्या मंदिर ................:) | १० साल बाद ऐसा लगा जैसे शनिवार शाम की बाल सभा \ किशोर सभा चल रही हो | बहुत कुछ जो उन दिनों सिखा आज भी जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन गए है जैसे सुबह उठ के प्रार्थना करना और माँ पापा के पैर छु के घर से निकलना , भोजन मंत्र करना | मै तो हमेशा ही वंदना प्रमुख रही थी विद्यालय में | क्या दिन थे वो भी |

बड़ा ही बढ़िया लेख | धन्यवाद |

Vivek Ranjan Shrivastava said...

bachpan her gum se begana hota hai

Rajkumar Rajak said...

मैं आपके इस बालसभा लेख को, कुछ शिक्षकों के साथ साझा करना चाहता हूँ। क्यूंकी इस लेख में बालसभा के स्वरूप पर तीक्ष्ण व्यंग प्रतीत है । इससे तथाकथित बालसभा के स्वरूप को फिर से बुनने में मदद मिल सकती है ।

Fahmida Laboni Shorna said...

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