Thursday, July 24, 2008

जय हो आंग्ल भाषा की

जय हो आंग्लभाषा की जिसको आज की ये पोस्ट समर्पित है!अँगरेज़ चले गए,अंग्रेजी छोड़ गए " एक बहुत ही प्रचलित कहावत है जिसे अंग्रेजी से खफा हर शख्स कभी न कभी इस्तेमाल ज़रूर करता है!दरअसल अंग्रेजी से नफरत दर्शाने के लिए इससे सुन्दर कोई कहावत नहीं बनी!चाहे स्वदेसी आन्दोलन वाले हों ,चाहे ग्रामर के सताए हुए हों,चाहे अंग्रेजी छोड़ हर विषय में पास होने वाले हों...ऐसा मुंह बनाकर ये कहावत कहते हैं मानो इनका बस चले तो अभी झोले में भर के अंग्रेजों के देस में पटक आयें!

शुरुआत करते हैं इस अंग्रेजी पुराण की हमारे स्कूल से....जहां इंग्लिश का पीरियड तो लगता था लेकिन कहना और लिखना "आंग्लभाषा"पड़ता था! इंग्लिश कहने से भारतीय संस्कृति का क्षय होता था! जब हम पढाई करते थे तब गिना चुना एकाध इंग्लिश मीडियम स्कूल हुआ करते थे....उसमे और हमारे स्कूलों में मात्र इतना ही अंतर होता था की वहाँ के बच्चे "may i go to toilet sir" और " may i come in sir" बोला करते थे जबकि हम सब " क्या हम अन्दर आ सकते हैं आचार्य जी" उच्चारते थे! बाकी तो कोई अंतर कभी समझ नहीं आया! इंग्लिश बोलनी न हमें आती थी न उन्हें आती थी! हम खुश थे क्योकी हम तो हिंदी मीडियम में पढ़ते थे इसलिए इंग्लिश बोलना आना कोई ज़रूरी नहीं था मगर न वो खुश थे न उनके मां बाप क्योकी जहां हमारे स्कूल की फीस ८० रुपये थी (तांगा शुल्क सहित) ,वहीं उन्हें १०० रुपये देने पड़ते थे( तांगा अलग)!

ऐसी ऐसी भी माएं थीं या सही कहूं तो आज भी हैं जो घर में बच्चों को ठेठ देसी अंदाज़ में लाल भकूका होकर डांटती थीं लेकिन मेहमान के सामने " नो बेटे, घर के अन्दर प्ले मत करिए" या " बेटे,नोजी साफ़ करिए" कहती थीं वो भी चेहरे पर अत्यंत सौम्य भाव लाकर ! बेटेराम धन्य हो गए.. दिन भर तू-तड़ाक करने वाली माता अचानक सम्मान देने लगी!

एक बार एक नए आचार्य जी स्कूल में आये अंग्रेजी पढाने...चूंकि वो अंग्रेजी के मास्टर थे तो दबदबा भी अन्य अध्यापकों से थोडा अलग था! अंग्रेजी जानने का गौरव चेहरे से छलका पड़ता था! स्कूल में सभी आचार्यजियों को धोती कुरता पहनना अनिवार्य था...सब कोई मजे से धोती कुरता पहनकर साइकल पर आते! ये भी आते मगर फर्क इतना होता की ये पेंट शर्ट पहनकर आते और एक बेग में गणवेश रखकर लाते! स्कूल में आकर धोती कुरता धारण कर लेते! जाते वक्त फिर पेंट शर्ट चढा लेते! वो आचार्य जी कम " सर" ज्यादा लगते थे ! हम इनसे इतने ज्यादा प्रभावित थे की इनके द्वारा पढाये गए " neighbour" को "नाइघबोर" ही रटते रहे! आचार्य जी ने जो कह दिया सो पत्थर की लकीर! अगले साल एक नया लड़का क्लास में आया...उसने नाइघबोर की जगह " नेबर" कह दिया! ऐसा मज़ाक उड़ाया पूरी क्लास ने कि बेचारा मान बैठा कि वही गलत है!दो इन बाद वो भी "नाइघबोर" कहने लगा! सत्य झुक गया भले ही बाद में कभी जीत गया हो!इसी तरह सिक्स्थ क्लास में अंग्रेजी के पाठों में दो परिवारों का ज़िक्र होता था...एक मिस्टर दास ,जिनके बच्चे मोहन और रीता थे! एक मिस्टर स्मिथ का परिवार जिनके बच्चे जॉन और मेरी थे! जॉन की स्पेलिंग "john" लिखी जाती थी और मोहन की " mohan" ! हमारे आचार्य जी मोहन और जोहन पढाया करते थे! लगभग तीन साल तक हम जोहन ही कहते रहे!


एक और सर थे जो जबरदस्ती हमें टूशन पढाने के लिए लगाये गए थे! उनका अंग्रेजी ज्ञान हमारे गणित ज्ञान से भी कमज़ोर था! हमने उन्हें भगाने के सारे प्रयत्न किये...मैं और मेरी बहन उन्हें ऊपर से गद्दी डालकर टूटा सोफा बैठने के लिए देते, चाय में नमक डालकर भी पिलाई, और कभी होमवर्क तो अपने को करना ही नहीं था! लेकिन बेचारे बहुत सीधे थे...और गज़ब का जिगर कि उस टूटे सोफे पर चौथाई वजन रखकर एक घंटा पढाते रहे! कभी उफ़ तक नहीं की! हम बाद में चैक करते तो ज़रा सा बैठते ही अन्दर धंस जाते! लेकिन नमन है इस आंग्लभाषा को जो काम टूटा सोफा और नमक वाली चाय नहीं कर पायी वो इसने कुछ ही दिनों में कर दिया! हमने पहले दिन ही ताड़ लिया कि कमज़ोर कड़ी अपने हाथ लग गयी...वो मैथ्स कि किताब खोलते और हम अंग्रेजी की! उनसे कहते" सर..पूरा लैसन पढ़ के ट्रांसलेट कर दीजिये" मरते क्या न करते..उन्हें पूरे विषय पढाने के लिए लगाया गया था! सबसे कठिन चैप्टर छांटकर देते...जैसे ही पढने बैठते दो चार लाइन तो ठीक पर जैसे ही कोई कठिन वर्ड आ जाता तो उच्चारण नहीं कर पते और अपने गले को बड़े अजीब टाइप से खंखार कर साफ़ करते कि कठिन वर्ड उसी में उच्चारित हो जाता! एक लैसन में करीब दस-बीस बार उनका गला खराब होता था! हम भी ठहरे पक्के बेशरम...उनके गला साफ़ करते ही टोक देते " सर...इस वर्ड को कैसे बोलेंगे,दुबारा बता दीजिये" बेचारे अगले दस दिन में ही अन्य कार्यों में व्यस्त होने का बहाना बनाकर ट्यूशन छोड़ कर चले गए!

इस आंग्लभाषा की एक और खासियत है...वज्र मूर्ख को भी मूरख कहने पर लाल पीला हो जायेगा! "डफर" कह दो, खी खी कर के हंस देगा!गालियाँ भी इंग्लिश के वस्त्र धारण कर अपनी गरिमा को प्राप्त कर लेती हैं!सो बस यही कह सकते हैं कि " जय हो आंग्ल भाषा की"

39 comments:

राकेश जैन said...

jai ho angla bhasha kee !!! apki nahi sabki yahi kahani hai...

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत ही "'गुड स्टोरी ""सुनाई है आपने पल्लवी जी :) इस भाषा की जय जय कार तो है ही कोई शक नही इस में

अशोक पाण्डेय said...

जय हो आंग्‍ल भाषा की :)

Rajesh Roshan said...

समझ में नहीं आया कि आप रेड मार रहीं हैं या फिर प्रशंसा कर रही हैं.. वैसे आप जो भी कर रहीं हो पोस्ट अच्छी है।

अंगूठा छाप said...

देखो पल्लवी,

मैं तुमसे फिर कह रहा हूं कि तुम्हें लगातार लिखना चाहिए और हास्य व्यंग्य ही अधिक लिखने चाहिए...!

नहीं पता तुम ये लिखत-पढ़त कबसे कर रही हो, लेकिन इतना तय है कि तुमने अभी देखते-देखते एक बेहतरीन अंदाज ‘क्रिएट’ किया है।

इस लेख में हास्य का जो पुट है वो यकीनन गौरतलब है।


पुनश्च: बात अपने शिशु मंदिर और आंग्लभाषा की चल रही है तो मुझे तो देववाणी (यानी संस्कृतम्) की भी याद हो आई है। हा! हा! हा!!


अंगूठा छाप

आनंद said...

वाह! क्‍या तबीयत से धोया है! पढ़कर मज़ा आ गया।

- आनंद

Abhijit said...

angla bhasha ke kaee utkrisht namoone hamne bhi school-college me dekhe. Amooman university me kuch ladkiyan apne angla gyan ka parichay deti aur kehti.."u know, the rasta was so kharaab..meri salwar par na mud bhi lag gaya hai"

angla bhasha me koi buraai nahi par jaisa aapne ingit kiya ki ise sabhyata ki nishani maane jaana laga hai.

barhaal...ek aur utkrisht lekh

अनुराग said...

आहा बोले तो डी एस पी साहिबा की जे ....ये क्या मैडम आपने सारी पोलपट्टी खोल दी,इस अन्गल भाषा की ओ सोरी जी "आंग्‍ल" .बोलना था स्पेलिंग मिस्टेक हो गयी.....ओर हाँ एक बात ओर कह देंवे मैडम जी .....रोज रोज लिखने से बेहतर है जब भी लिखो अच्छा लिखो .....ऐसे ही ......हमें तो मैडम जी आपकी कुछ नज्मे भी भली सी लगी है .....अब चलते है....कौन सी रिफल उठाये .....सॉरी जी फ़िर स्पेलिंग मिस्टेक हो गयी .....रायफल ....ना ..ससुरी आंग्‍ल" .

अंगूठा छाप said...
This comment has been removed by the author.
siddharth said...

हा, हा, हा,… पल्लवी जी, मजा आ गया। आपने तो स्कूल की बात बतायी, मुझे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक एम.ए. के छात्र की याद आ गयी जो knowledge को ‘कनऊ-लद-गे’ पढ़ बैठा था। अनिवार्य अंग्रेजी का पर्चा समाप्त हो जाने के बाद ये सज्जन state civil service में चुन लिए गये। आई.ए.एस. की मुख्य परीक्षा में अंग्रेजी दाँव दे गयी तो बाकी कापियों का मूल्यांकन ही नहीं हो सका। वर्ना…

Shiv Kumar Mishra said...

आंग्ल भाषा की सचमुच जय है...हम सभी के पास अपने अनुभव हैं. मुझे याद है मैं गाँव के स्कूल में छठवी कक्षा में था. हमारे यहाँ उसी कक्षा से पहली बार अंग्रेजी की पढाई होती है. एक पाठ था, जिसका पहला वाक्य था...
mother a man is here....

मेरे सहपाठी मोहन लाल ने कहा था; "मदर ए मैं इज हेरे"...मास्टर जी खूब हँसे थे. आपकी शानदार पोस्ट पढ़कर ढेर सारी बातें याद आ गईं.

Manish Kumar said...

अरे आप तो बड़ी शरारती निकलीं :)। बेचारे टीचर को यूँ भगा दिया। काफी हँसी आई आपके इस मज़ेदार लेख को पढ़ कर।

Lavanyam - Antarman said...

Wonderful article Pallvi ji, You should write more articles & sansmaran with humor in them,
Sorry to post in " Angreezi bhasha " -- being away from my PC -- yehi vikalp tha -
so long, & regards,
Lavanya

Gyandutt Pandey said...

वाह, वाह। हमें भी याद है - कनऊ लद गये (knowledge)!! :)

अभिषेक ओझा said...

जय हो ! :-)

दिनेशराय द्विवेदी said...

अंग्रेजी महामाया की कथा ऐसी ही है। हम कहते थे "बाटी जीरो नून" यानी "व्हाट इज़ योर नेम"।
तीनों भोजन की वस्तुएँ।

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

अंग्रेजी फूल सही पर हिन्दी पत्थर नहीं यह तो दुनिया को समझ आ ही चुका है!

Udan Tashtari said...

इतनी बदमाशी?? फोटो से तो ऐसी नहीं लगती!! :)

कितनी बेरहमी से उस मास्साब को टूटे सोफे बैठाया..श्री राम..श्री राम..

ये नमक वाली चाय अभी भी बनाना जनती हो क्या? तब सोच समझ कर मिलने आयें. :)

बेहतरीन रही यह पोस्ट भी.

परमजीत बाली said...

आप की पोस्ट पढ कर पुरानी यादे ताजा हो गई अपनी भी।बहुत बढिया लिखा है।आनंद आ गया।

राज भाटिय़ा said...

पल्लवी,मे अपने आप को बहुत बडा शरार्ती समझता था, शरारत हमेशा मे करता था घर ओर बाहर, लेकिन पिटाई साथ वाले की होती थी, लेकिन आज आप ने लडकी हो कर हमे फ़ेल कर दिया, मान गये नारी मर्द से दो कदम आगे हे, बहुत अच्छा लगा आप का लेख ओर बचपन की सारी शरारते भी याद दिला दी,बहुत ही अच्छा लेख लिखा,धन्यवाद

डा० अमर said...

क्या बात है !, ,

लेकिन एक बात है, पल्लवी ! वह मास्साब आजकल हर जगह अपना दम भरते होंगे ।
हमने पल्लवी जी को ऎसी अंगेज़ी पढ़ा दी कि वो डी.एस.पी. बन गयी ।


इस आलेख से उनकी टी.आर.पी. घटी ही समझो। हेऽ... बिरिजबिहारी इस लड़की ने अपने गुरु को क्या दक्षिणा दे डाली, इसे क्षमा करना होऽ अवधबिहारी !!

arvind mishra said...

बहुत खूब -मजेदार संस्मरण -पढ़ते हुए होठों पर डेढ़ इंच मुस्कान बनी ही रही .

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

waah ji waaj annad aa gaya... chai pite hue padh raha tha.. ki padha sir john aur mohan wala padha to hansi choot gayi.. sasuri chai gale mein fans gayi.. abhi tak khansi chal rahi hai.. lekh kamal ka likha hai..

बाल किशन said...

हा हा हा
बहुत अच्छे.
मजे के साथ साथ कई यादें भी आ गई.
केनाइफ़ (knife) बोलने पर जो मार पड़ी थी वो अभी भी याद है.

vipinkizindagi said...

बेहतरीन पोस्ट

रंजना said...

वाह,अति सुंदर लिखा आपने . आनंद आ गया .कई संस्मरण एकदम तरोताजा हो तबियत खुश कर गए.हम प्रतीक्षा में हैं,कुछ और संस्मरण ऐसे ही रोचक अंदाज में और सुनने को मिले तो आनंद आ जाए.

Atul Pangasa said...

Maza aa gaya........... script aaNgal use karte hue bhi haNsi nahiN ruk rahi ;)

कुमार मुकुल said...

आपका संस्‍मरण पढकर मुझे भी कुछ याद आ रहा है, उस समय मैं हैदराबाद स्‍टार फीचर्स में हिन्‍दी का संपादक था मेरे साथ अंग्रेजी और तेलुगु के संपादक भी थे। अंग्रेजीवाले अपने को तीसमार खां समझते थे और हमें नीची नजर से देखते थे। तो जैसी की मेरी आदत है मैं उनकी कापी देखने लगा तो कई गलतियां दिखने लगीं। मैंने भी उन्‍हें अन्‍य लोगों को दिखाया तो उनकी भदद पिटने लगी पर उनकी समझ में नही आ रहा था कि‍ मेरी अंग्रेजी कमजोर है तो मैं उनकी गलतियां कैसे निकाल देता हूं। इसका जवाब यह था कि वे अंग्रेजी के विदवान थे पर बाकी ज्ञान काम भर ही था। अब अंग्रेजी पढने से यह तो आ नहीं जाएगा कि बाबर के बेटे का नाम क्‍या है या रामायण किसने लिखी है तो ऐसी तमाम गलतियां मैं ढूंढ निकालता था। इस तरह उनकी हेकड़ी दूर हुई और फिर वे दोस्‍त हो गए।

ज़ाकिर हुसैन said...

bahut khoob pallawiji
aap ko padhkar lagta hai ki parsai ji ki kami nahin khalegi
is widha main aapne achhi camand hasil kar li hai
badhai

महामंत्री-तस्लीम said...

इस सम्‍बंध में नॉलेज को भी याद कर लीजिए। अगर उसे शुद्ध रूप से पढा जाए तो होगा कनउलदिगे।

ललितमोहन त्रिवेदी said...

हास्य व्यंग में धुरंधरों को भी पीछे छोड़ रही हो ,यह बात मैं काफी सोच समझ कर ही कह रहा हूँ !इतनी गहरी पकड़ और उसे सही भाषा में व्यक्त करना ईश्वर का वरदान है !यह विधा आपको बहुत ऊँचा लेजाएगी,लेखन में निरंतरता रखें और प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में भी भेजें ! शुभ कामनाएं !

शहरोज़ said...

achche hasya ke liye badhayi.
yun vyangya ke put bhi kam nahin hain yahan.

ragini said...

kahin acharaya ji ne padh li ye post to unke jakhm hare ho jaayenge....wo to kabka ye haadsa bhool haye honge..

Shiv Nath said...

Hope you go though my comment. The first time I added you as friend was to get a chance to go through your blogs. Today, I am again writing because I am not able to stop myself from commenting. Your sense of humour, satire and observation is wonderful. Though I have a book to my credit, which has been appeciated by many academicians, ministers, newspapers and other readers. But I find your writing (satires) to be way ahead to that of mine. I have tried my hands at the same, but it lacks the punch that is needed for satire. I salute you for your writings.

सागर नाहर said...

पांछ छ: साल पहले मैं बंबई से सुरत आ रहा था, मेरे पास में बैठी एक महिला यात्री का बच्चा बहुत शरारत कर रहा था, मां अपना रौब जताने के लिये बच्चे को बार-बार कह रही थी "मारी लैग पर बेसी जा" (मेरी गोद में बैठ जा)
मुझ अज्ञानी उस दिन पता चला कि गोदी को अंग्रेजी में "लेग" कहते हैं।
:)

सागर नाहर said...

पांछ छ: साल पहले मैं बंबई से सुरत आ रहा था, मेरे पास में बैठी एक महिला यात्री का बच्चा बहुत शरारत कर रहा था, मां अपना रौब जताने के लिये बच्चे को बार-बार कह रही थी "मारी लैग पर बेसी जा" (मेरी गोद में बैठ जा)
मुझ अज्ञानी उस दिन पता चला कि गोदी को अंग्रेजी में "लेग" कहते हैं।
:)

sid said...

बधाई इतना अच्छा हास्य लिखने के लिए ... बचपन में शिशु मंदिर के दिन एवं अंग्रेजी से डर , दोनों याद आ गये
एक जगह आपने लिखा है "आचार्यजियों".... पढ़ कर बहुत दिल खोल के हँसा ...
नव वर्ष आपको मंगलमय हो

सागर said...

कभी कभी सारा दिन बोर होने के बाद शाम को गुज़रा हुआ दिन बनता है. गूगल पर कुछ खोज रहा था और जाने कैसे इसका लिंक मिला. अरसे बाद कुछ पढ़ कर इतनी हंसी आई है। अब जा के दिन सार्थक हुआ सा लग रहा है।

Fahmida Laboni Shorna said...

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