Wednesday, April 30, 2008

आत्मा की तेरहवीं


आज आत्मा से हमारा हमेशा के लिए पीछा छूट गया। बचपन से ही हमारा हमारी आत्मा के साथ संघर्ष चला आ रहा है। जाने कैसी आत्मा इशु की थी भगवान् ने हमारी काया को, हम जो भी काम करें इसे पसंद ही नहीं आता, जब देखो अपनी टांग फंसाती रहती थी। पूरे बचपन की वाट लगा दी इस आत्मा की बच्ची ने। जब कभी जेबखर्च के लिए पिता जी की पैंट से पैसे चुराने की सोचते, इस आत्मा की चोंच चलने लगती। जैसे-तैसे कठिन परिश्रम करके पिता जी की जेब हलकी करते, रात होते ही आत्मा के प्रवचन शुरू हो जाते। नन्ही उम्र थी हमारी सो ज्यादा बहस नहीं कर पाते। आत्मा की बातों में आ जाते और पैसे वापस जेब में रख आते। जब भी परीक्षा में नक़ल करने बैठते, कमीनी आत्मा झक सफ़ेद कपडों में सामने आकर खड़ी हो जाती, बगल वाले की कॉपी पर पर हाथ रख लेती! इन आत्मा मैडम ने कई दफा फेल करवाया।

१४-१५ साल की उम्र तक तो ऐसा हुआ कि हम आत्मा के मुकाबले थोड़ा कमज़ोर पड़ते रहे, लेकिन उसके बाद धीरे-धीरे हमारे अन्दर ताकत का संचार हुआ। हमने अपने जैसे आत्मा पीड़ितों का एक ग्रुप बना लिया था, जिसकी नियमित बैठकें होतीं और आत्मा से निजात पाने के तरीकों पर मंथन किया जाता, कभी कभी गेस्ट फेकलटी को बुलाकर आत्मा की आवाज़ दबाने के तरीकों पर लेक्चर भी करवाया जाता। इसका नतीजा ये निकला कि अब ७०% मामलों में हमारी जीत होती और ३०% मामलों में आत्मा की।

खैर,हम धीरे-धीरे बड़े होते गए। जुगाड़ लगाई तो क्लर्क बन गए और ईश्वर का कृपा से क्लर्की भी अच्छी चल निकली। पर ये धूर्त आत्मा को यह भी गवारा नहीं था। घूस ही तो खाते थे, इसके बाप का क्या लेते थे! जैसे ही रात होती तो हमें झिंझोड़ कर जगा देती और प्रवचन शुरू कर देती। हालाँकि अब तक हम मट्ठर पड़ने लग गए थे पर रात तो खराब हो ही जाती। एक दिन इस समस्या का भी समाधान हुआ। रोज़ की तरह आत्मा के उपदेश शुरू हुए तभी हमने देखा, ये सफ़ेद पेंट शर्ट वाली आत्मा के सामने बिलकुल वैसी ही भक काले पेंट शर्ट वाली आत्मा हमारे अन्दर से अवतरित हुई और आते ही कुलटा, कमीनी, मक्कार जैसी कई उच्च कोटि की गालियों से सफ़ेद आत्मा को नवाज़ दिया। अब हमें कुछ कहने का ज़रूरत नहीं थी, दोनों में आपस में मुंहवाद होता रहा। इसके बाद से तो वह वकीलनुमा आत्मा ही हमारी तरफ से बहस करती, हम आराम से सो जाते। सिलसिला चलता रहा, पर हाँ, अब हर बार सफ़ेद आत्मा ही हारती।

हाँ...तो हम आज के झगडे का बात कर रहे थे। वैसे भी रोज़-रोज़ का किटकिट से तंग आ गए थे हम। आज तो उसने हलकान ही करके रख दिया, पीछे ही पड़ गयी हमारे। इतना जोर से चिन्घाड़ी कि जीना दूभर हो गया। ऐसा भी क्या कर दिया था हमने, छोटी सी बात थी। हुआ यूं की एक ठेले वाला हमसे अपने जवान बेटे का मृत्यु प्रमाण पत्र लेने आया, हमने तो भैया आदत के मुताबिक ५०० रुपये मांगे। झूठा कहीं का, कहने लगा की पैसे नहीं हैं। उम्र हो गयी ठेला चलाते-चलाते, इतना पैसा भी नहीं कमाया होगा क्या? और फिर जब हम किसी का काम बिना पैसे के नहीं करते तो इसका कैसे कर देते, आखिर सिद्धांत भी तो कोई चीज़ है। खैर ठेले वाला तो चला गया रोते कलपते पर ये आत्मा की बच्ची बिफर गयी। बहुत जलील किया हमें। सो हमने भी आज अन्तिम फैसला कर डाला, अपनी काली आत्मा को बुलाकर सुपारी दे डाली। और उसने सफ़ेद आत्मा का गला हमेशा के लिए घोंट दिया।

हमें कोई ग़म नहीं उसकी मौत का। कोई गुनाह तो नहीं किया हमने, आखिर कानून में भी तो आत्मा के मर्डर के लिए कोई धारा नहीं बनी है। रोज़ ही तो लोग खुल्लम खुल्ला आत्मा का क़त्ल कर रहे हैं और हम भी इसी समाज का हिस्सा हैं।
बहरहाल, अगली ग्यारस को हमारी आत्मा की तेरहवीं है। पंडित ने बताया है की १०१ आत्माओं की आहूति देने से मरी आत्मा कभी वापस नहीं आती। सो सभी आत्मा पीडितों से अनुरोध है की अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर अपनी अपनी आत्माओं की आहूति दें और मृत्युभोज को सफल बनाएं!

16 comments:

अभिषेक ओझा said...

hamaari aatma haazir hai, baaki 100 ke jugaad mein lag jaaiye.. :-)

vijay gaur said...

अपने अधिनस्थों से कहें, उनके लिये ये कोइ संख्या ही नहीं. १०१ को १ गिनते हुए वे पीडितों की लाइन की लाइन लगा देंगें.
अपने महक्मे से आपका वास्ता कभी पडा नही शायद. किसी राह चल्ते से पूछिये.

Udan Tashtari said...

मट्ठर -एक घोर जबलपुरिया शब्द :) अच्छा लगा. आ तो नहीं पायेंगे. इस भव्य आयोजन की सफलता के लिये यहीं से शुभकामनाऐं दिये देते हैं. ओह्म शांति ओह्म!!! (गमगीन आँसू की दो बून्द उधार लिख लिजिये) :)

अनूप शुक्ल said...

सही है। लेकिन आत्मा कहती होगी अंतिम विजय हमारी ही होगी।

अरुण said...

भाड मे जाये ऐसी आतमा,तुरंत एक काल पात्र मे दफ़ना दीजीये ,कम से कम १०० मीटर नीचे , चाले तो लोहा ,और आत्मा लेकर आ जाईये,कल पात्र हम बनवा देगे जी ,वो भी मुफ़त,आखिर राष्ट्र की उन्न्ती का सवाल है जी :)

सुजाता said...

जब भी पहाड़ो पर घूमने जाते हैं , प्लान बनाते है कि आत्मा को ऊंचाई से धकिया दें । धकिया भी देते हैं , घर लौटो तो ससुरी दरवाजे पे कोहनी टिकाए मन्द मन्द मुस्कराती मिलती है - बच्चू जी ! आसानी से पिंड नहीं छोड़ूंगी "कोन्हो उपाय है का ?

rakhshanda said...

गहरी चोट करता हुआ लेख,

Parul said...

kya baat hai...bahut dino baad kuch bahut acchha...jhakjhorney jaisa..shubhkaamnaayen...likhti rahiye

Manish said...

बहुत अच्छा लिखा आपने !
हर व्यक्ति थोड़ा बहुत कुचल कर ही आत्मा को जीता है। पर ७०-३०% से ३०- ७०% में आने में जितना ज्यादा वक्त लगे उतना ही अच्छा।

DR.ANURAG ARYA said...

हम तो आज तक अपनी आत्मा को ढूंढ रहे है कभी एक आध दिन के लिए जिस्म मे आ जाती है फ़िर गायब.......

masoomshayer said...

bahut anand aya atma ka maraan shubh hota hai age warshon ke liye aur behe shubhkmanyen kabhee kabhee doabar jee uthtee hai atama ab ke aisa na ho yahee kamana hai

ANil

कारवॉं said...

आत्‍मा की तरहवीं में आपने जिस तरह आत्‍मा की बाट लगाई है वह बहुत अच्‍छा लगा , इस व्‍यंग्‍य को हमलोग अपनी त्रैमासिक पत्रिका मनोवेद में छापना चाहेंगे अगर आपको आपत्‍ती ना हो ,आपका सेंस ऑफ ह्यूमर जबरदस्‍त है मैं उसका कायल हो गया ...http://chitrahindi.blogspot.com/ पत्रिका के बारे में जानने के लिए उपरोक्‍त ब्‍लाग देख सकती हैं आप

संत शर्मा said...
This comment has been removed by the author.
संत शर्मा said...

विनोदपूर्ण अंदाज़ में बहुत कड़वी सच्चाई बया की है आपने, एक उम्दा लेख के लिए बधाई |

vichar said...

though your writing is always good may it be romantic or satire or comedy but this was simply classic

vichar said...

though your writing is always good may it be romantic or satire or comedy but this was simply classic