Monday, February 11, 2008

कहाँ हो तुम...

कहाँ हो तुम
एक बार तो आ जाओ

तुम्हारा इंतज़ार करते करते
वक़्त वहीं रुक गया है
जहाँ तुम इसे छोड़ कर गयीं थीं
थक कर बैठ गया है दीवार से टेक लगाये
तुम आओ तो ये वक़्त भी चले....

याद है वो पूनम की रात
मैंने चांदनी भर भर कर
उलीची थी तुम पर
पूरी छत रंग गयी थी चांदनी से
वो रंग नहीं उतरा है आज तक
तुम आओ तो ये रंग उतरे....

कुछ वादों,कुछ शिकवों
कुछ लम्हों से बुना एक रिश्ता
तन्हाई की सर्द रातों से जमा हुआ
पड़ा है घर की ताक पर
तुम आओ तो ये रिश्ता पिघले...

बरसों से मेरी पलकों पर
ठहरा हुआ है एक आंसू का कतरा
थक चुकी हैं पलकें
इसका बोझ उठाते उठाते
तुम आओ तो ये बोझा उतरे..
.
कहाँ हो तुम
एक बार तो आ जाओ

6 comments:

avnish said...

बहुत अच्छा लिखा है आपने. ऐसा ही लिखती रहो धीरे धीरे लेखनी मैं और सुधार आयगा.

avnish said...

when pallavi start to anything she take it very casualy suddenly a storm of sincreity comes in her brain and create a miracle. i knew her from last 15 year that she can right but now she herself realise she can do.

avnish said...
This comment has been removed by a blog administrator.
avnish said...

when pallavi starts to anything she take it very casualy suddenly a storm of sincereity comes in her brain and create a miracle. i knew her from last 15 year that she can write but now she herself realise she can do.

Deepak said...

kaafi dard hai, nirasha hai kavitayon me... isse upar uthkar dard se, nirasha se bahar aakar bhi kuch likhna hoga.....
maine 2 - 3 kavitayen hi parhi hain.. ho sakta hai ki mere ye comments baad me badal jayen.....
vaise kaafi achcha likh leti ho... aapki is quality ke baare me to hame pata hi nahin tha...
Congrats....

kriti said...

yeh mujhe bahut pasand hai, khaas kar "tum aao to yeh waqt bhi chale" .