Tuesday, March 18, 2008

पूनम की रात आँगन में आया न करो
चांदनी को इस तरह लजाया न करो

मुझ जैसे लोग हो न जाये बदगुमा कही
बेवजह ही तुम यूं मुस्कुराया न करो


जो खुद ही बिखरा है,किसी को क्या देगा
टूटते तारे को यूं आजमाया न करो

माना कि तेरे दर्द ने कुछ शेर दे दिए
पर बहुत हुआ अब और सताया न करो

खाता पे मेरी मुझसे नाराज़ भी नहीं
अपने दीवाने को यूं पराया न करो

मैं संग हो गया तो कौन पूछेगा तुझे
ऐ खुदा मुझको इतना रुलाया न करो

टूटेंगी तो सीधे आँखों में चुभेंगी
ख्वाहिशों को सर पे चढाया न करो

1 comments:

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

yah ghazal anmol hai... sundar shabd iske aage nirthak hai... yah adwiteey hai...