Tuesday, March 18, 2008

दो छोटी नज्मे ...

एक रोज़ ग़म ने मेरा दरवाजा खटखटाया
मैंने दरवाज़ा खोला ,पास बैठाया
ग़म ने अपना दर्द बताया
कभी किसी ने नहीं अपनाया
मैंने तरस खाकर कुछ देर पनाह क्या दी
बेशर्म.. आज तक रुका है
जाता ही नहीं....


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पिछले बरस जब वो आया था तो
धूप की एक गठरी थमा गया
बोला..जोडों के दर्द में सिकाई कर लेना
दवाओं के पैसे ही बचें

अब के बरस मैं गयी तो
एक इन्द्रधनुष टांग आई दीवार पर
दोस्त मेरा तस्वीरें बनाता है
रंगों के पैसे ही बचें...


3 comments:

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

both are perfect...

mehek said...

awesome

swapnil said...

Sari nazme..ghazlen behtareen hai...
Har ek ki tareef karun mumkin nahee...
Ya yun kah lai.n ki mai kar nahee sakta....

Mai khud ko turram kha.n samajhta tha...

Ek sher hai ghalib saab ka...k

bharam khul jaye zalim teri qamat ki daraazi ka,
agar us turra-e-purpench-o-kham ka pench-o-kham nikle...

Mera bhi bharam khul gaya....