Monday, March 10, 2008


तुझसे उल्फत की बात कर बैठे
हाय ये क्या गुनाह कर बैठे

पी के लिख बैठे वसीयत अपनी
अपना दिल तेरे नाम कर बैठे

यादों को तेरी रुख्सती देकर
दिल के घर को मकान कर बैठे

डाल के इक नज़र मोहब्बत की
हमको अपना गुलाम कर बैठे

मुझ दीवाने का हाल पूछते हो
तुम ये कैसा सवाल कर बैठे

बारी आई खुदा के सजदे की
हम तुम्हारा ख़याल कर बैठे

ओढ़ कर वो हया की चिलमन को
चेहरा अपना गुलाल कर बैठे

दर्दे दिल का सबब सुनो हमसे
इश्क हम बेपनाह कर बैठे


1 comments:

avnish said...

why dont you write some halka fulka.